शुक्रवार, 31 मई 2019

क्या नेहरू सरकार का पहला संविधान संशोधन प्रेस के खिलाफ था?

हमारे अजीज अरुण तिवारी ने तीन चार दिन पहले #नेहरूकीविरासत सीरीज में एक पोस्ट लिखी, एक पोस्ट लिखी कि 'भारत के गणतंत्र बन जाने के ठीक 18 महीने बाद पहला संविधान संशोधन प्रेस फ्रीडम को दबाने के लिए किया गया था. मद्रास की एक पत्रिका क्रॉस रोड्स नेहरू जी की नीतियों की आलोचना करती थी....सो उस समय की सरकार से बर्दाश्त नहीं हुआ. पत्रिका बैन कर दी गई थी. वामपंथी लेखक रोमेश थापर एडिटर हुआ करते थे.'

अगर ऐसा हुआ तो आजादी के तुरंत बाद ही बहुत बुरा हुआ था. लेकिन क्या सच में ऐसा ही हुआ था? आइए देखते हैं.

भीमा कोरेगांव की घटना के बाद, सितंबर, 2018 में पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई के संबंध में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘जिनकी गिरफ्तारी हुई है वे पहले भी गिरफ्तार हो चुके हैं. आरोप गंभीर हैं. किसी सरकार को गिराने की साजिश रचना, हिंसा को बढ़ावा देने के लिए अपनी विचारधारा का सहारा लेना और सबसे बड़ी बात किसी देश को तोड़ने के लिए साजिश रचना, मैं समझता हूं इससे बड़ा अपराध कुछ और नहीं हो सकता...प्रेशर कुकर को हम दबाने की कोशिश नहीं करेंगे. लोकतंत्र में सबको बोलने की आजादी है. सबको चलने की आजादी है. सब कुछ करने की आजादी है. लेकिन किसी को भी देश को तोड़ने की इजाजत नही दी जा सकती है. हिंसा को बढ़ावा देने की आजादी नही दी जा सकती है.’
संविधान की कॉपी पर हस्ताक्षर करते हुए संविधान सभा के सदस्य.


यह एक उदाहरण है जिसे ध्यान में रखते हुए यह कह सकते हैं कि प्रेस की स्वतंत्रता हमेशा सत्ता से टकराती रही है. राजनाथ सिंह ने जो भी कहा, वह इससे पहले भी कई बार कहा जा चुका है. बोलने की आजादी पर सारे प्रतिबंध इन्हीं तर्कों के सहारे थोपे गए.

आजाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ पहला डंडा नेहरू मंत्रिमंडल ने चलाया, जिसमें सरदार पटेल और डॉक्टर अंबेडकर शामिल थे. इस डंडे का शिकार बने जनसंघ नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी, क्रासरोड साप्ताहिक के संपादक रोमेश थापर और आर्गेनाइजर के संपादक केआर मल्कानी.

आजादी के बाद मई, 1950 में सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला आया. यह दो केसों से संबंधित था. रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य और बृजभूषण बनाम दिल्ली राज्य. रोमेश थापर जानेमाने वामपंथी थे जो बंबई से 'क्रासरोड' नामक साप्ताहिक निकालते थे. वे इसके संपादक और प्रकाशक थे. थापर, नेहरू और उनकी नीतियों के घोर आलोचक थे. यह वही समय था जब मद्रास और केरल में वामपंथ तेजी से बढ़ रहा था. मद्रास सरकार ने मेंटेनेंस आफ पब्लिक आर्डर एक्ट 1949 के तहत इस पत्र के छपने और प्रसारित होने पर पाबंदी लगा दी. रोमेश थापर सुप्रीम कोर्ट चले गए.

दूसरा मामला दिल्ली से छपने वाले संघ के मुखपत्र आर्गेनाइजर का था. केआर मल्कानी इसके संपादक और बृजभूषण इसके प्रकाशक थे. दिल्ली के कमिश्नर ने भड़काने वाली फोटो और सामग्री छापने के आरोप में पंजाब पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1949 के तहत इस पर पाबंदी लगा दी. ध्यान रहे कि बंगाल और दिल्ली पंजाब सबसे ज्यादा दंगा प्रभावित इलाकों में थे.

दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक ही दिन फैसला दिया और कहा कि अनुच्छेद 19(2) में 'पब्लिक आर्डर' और 'पब्लिक सेफ्टी' जैसे पदों का जिक्र नहीं है इसलिए ये फैसले असंवैधानिक हैं.

जब यह फैसला आया, उसी दौरान भारत सरकार ने पाकिस्तान सरकार से एक समझौता किया. नेहरू और लियाकत अली के बीच समझौता हुआ कि दोनों सरकारें अपने यहां के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करेंगी. इसे नेहरू—लियाकत पैक्ट नाम दिया गया. इसमें ऐसी हर गतिविधियों पर पाबंदी लगाने का समझौता था, जिसके तहत दोनों देशों में युद्ध की स्थिति बने. मार्च, 1950 में नेहरू ने पटेल को पत्र लिखा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी लगातार अखंड भारत की बात कर रहे हैं जिससे परेशानी खड़ी हो रही है. पटेल ने जवाब में लिखा कि अब हम संविधान से बंधे हैं जो बोलने की आजादी देता है. हम कोई एक्शन नहीं ले सकते. समझौता साइन होने के बाद मुखर्जी ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और दोनों देशों में खुलकर युद्ध की बात करने लगे. पाकिस्तान ने इसपर प्रतिक्रिया दी. थापर नेहरू की विदेश नीति पर लगातार हमले कर रहे थे तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपने अखंड भारत के लिए प्रचार कर रहे थे.

इस मसले पर नेहरू और पटेल ने के पत्राचार में नेहरू ने लिखा कि मुख्य अभियुक्त श्यामा प्रसाद मुखर्जी और हिंदू महासभा हैं जो इस समझौते के क्रियान्वयन में बाधा बन रहे हैं. इस पर पटेल ने कहा कि दो मामलों में कोर्ट के निर्णय ने हमारे सभी संवैधानिक उपायों को हिलाकर रख दिया है. हमें जल्दी ही संविधान में संशोधन करना पड़ेगा.

जून, 1951 में संविधान में पहला संशोधन हुआ. तीन संशोधनों में से एक प्रेस और फ्री स्पीच को लेकर था. अनुच्छेद 19(2) जोड़कर अभिव्यक्ति की आजादी पर 'युक्तियुक्त निर्बंधन' यानी reasonable restrictions की बात जोड़ी गई. नेहरू का कहना था कि इससे मामला कोर्ट के पाले में चला जाएगा, लेकिन अंबेडकर ने कहा कि हमें बोलने की आजादी भी देनी है और सुरक्षा भी जरूरी है. इसलिए पाबंदी भी तार्किक होनी चाहिए. इसमें मोटा मोटी मानहानि, अभद्रता, कोर्ट की अवमानना, और राष्ट्र की सुरक्षा जैसे मसलों पर बोलने पर उचित पाबंदी की बात कही गई.

इस संशोधन के पक्ष में नेहरू ने कहा, किसी को बोलने की ऐसी आजादी नहीं दी जा सकती कि उसके बोलने के पश्चात दो देशों में युद्ध छिड़े और बर्बादी हो. हालांकि, मुखर्जी का कहना था कि देश का बंटवारा एक गलती थी. इसे बलप्रयोग से सुधार लेना चाहिए.

जस्टिस एपी शाह ने एमएन राय मेमोरियल लेक्चर में 2017 में कहा था, ''संविधान असेंबली के वाद-विवाद के दौरान दो बार इस बात का प्रयास किया गया कि अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाने के लिए देशद्रोह को एक आधार बनाया जाए. परंतु असेंबली के अन्य सदस्यों के विरोध और उनको डर था कि देशद्रोह को फिर राजनीतिक असहमति को कुचलने के लिए प्रयोग किया जा सकता है, इसको संविधान के अनुच्छेद 19(2) से हटा दिया गया. वर्ष 1950 में संविधान बनाने वालों के इन एक्शन को खुद सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया. यह बातें सुप्रीम कोर्ट ने बृज भूषण एंड रोमेश थापर के केस में कही थी. इस फैसले के कारण ही संविधान में पहले संशोधन को बढ़ावा मिला और अनुच्छेद 19(2) को संशोधित किया गया. जिसके तहत 'अंडरमाईनिंग दाॅ सिक्योरटी आफ दाॅ स्टेट’ की जगह  'इन दाॅ इंटरेस्ट आफ पब्लिक आर्डर’ को शामिल किया गया. हालांकि संसद में बोलते समय नेहरू ने साफ किया कि जहां तक भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए की बात है तो मेरा मानना है कि यह धारा काफी आपत्तिजनक है और न तो इसका प्रैक्टिकल व न ही ऐतिहासिक तौर पर कोई स्थान होना चाहिए. अगर आप पसंद करे तो हम इस संबंध में निर्णय ले सकते हैं. जितना जल्दी हम इससे छुटकारा पा लेंगे, उतना अच्छा होगा.''

देशद्रोह की धारा अब तक बरकरार है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने समय समय पर उसकी व्याख्या की है.
खैर, क्या पहले संविधान संशोधन में बोलने की आजादी पर जो 'युक्तियुक्त निर्बंधन' जोड़ा गया, वह प्रेस पर हमला था? बेशक, सुप्रीम कोर्ट का रोमेश थापर और बृजभूषण केस का निर्णय नजीर बना और आज भी उसे अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में कोट किया जाता है. लेकिन संशोधन के साथ जोड़े गए युक्तियुक्त ​निर्बंधन को कोर्ट ने अपनी व्याख्या में गलत नहीं ठहराया, न ही कानूनविदों ने इसे गलत ठहराया. कानून में वैयक्तिक आजादी का महत्व है, लेकिन यह दुनिया भर में बहस का विषय बन चुका है कि क्या आजादी आत्यांतिक हो सकती है? या इस पर देश और समाज के हित में कुछ पाबंदियां जरूरी हैं? संशोधन के वक्त नेहरू, पटेल, अंबेडकर आदि सब सहमत थे कि राज्य के लिए समस्या उत्पन्न करने वाली आजादी से आजादी को ही खतरा है.
जैसे आज कश्मीर में अलगाववाद या नक्सलवाद के प्रसार को अभिव्यक्ति के नाम पर छूट नहीं मिल सकती, उसी तरह उस समय क्रासरोड और आरगेनाइजर के मामले में समझा गया.

यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारी आजादी, हमारा संविधान और हमारी व्यवस्था को 1947 से लेकर लंबे समय तक नकारने वाले यही दोनो थे, दक्षिणपंथी और वामपंथी. इन दोनों ने आजादी को झूठा कहकर उस पर हर संभव हमले किए और अब दोनों इस व्यवस्था के हिस्से हैं. ​एक पंक्ति में कोई बात कह देने मात्र से भ्रम फैलता है कि 'प्रेस पर पहली पाबंदी नेहरू ने लगाई थी'.

सूचना स्रोत: द हिंदू और स्क्रॉल के लेखों में कानूनविद अभिनव चंद्रचूड, लाइव लॉ में जस्टिस एपी शाह, एनडीटीवी, सीआईएस इंडिया में कानूनविद गौतम भाटिया, मीडिया चिंतन में माखनलाल चतुर्वेदी के कुलपति जगदीश उपासने.  

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