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नोटबंदी के दौर में फकीरी के जलवे

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मैं फकीरी के नाना रूपों के आकर्षण में आजकल त्रिशंकु हो गया हूं. एक तरफ संत कवि कबीर दूसरी तरफ विश्वगुरु बनते भारत के परधानसेवक जी. एक तरफ कबीर की फकीरी खींचती है, दूसरी तरफ परधानसेवक की. गालिब चचा ने ऐसे ही त्रिशंकु हुए मुझ जैसे आदमी के लिए लिखा होगा कि'ईमां मुझे रोके है जो खीचें है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे'.

इनमें से काबा और कलीसा यानी मस्जिद और मयखाना कौन है, यह तो पक्का पता नहीं है लेकिन यह पक्का पता है कि 'होता है शबो-रोज तमाशामेरे आगे.'

बात भटक रही है, इसे भटकने नहीं देना है. मैं मोदी जी को आदर्श फकीर मानकर उन पर कॉन्सन्ट्रेट करना चाह रहा हूं. लेकिन उनकी फकीरी काफीदिलचस्प है. 25 क्विंटल फूलों की महक वाली राजशी फकीरी अपन कबीर—फैन जुलाहों, गढ़रियों पर कहां फबेगी! मैं दोनों फकीरी के बीच मेंचकरायमान हो रहा हूं.

संत कवि कबीर का बड़ा मशहूर भजन है, 'मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में...' आजकल यह अप्रसांगिक हो गया है. न हम पर सूट कर रहा है, न हमारेदेशकाल पर. इस भजन की आगे की पंक्तियां मेरे लेख से निकलकर भागना चाहती हैं.

फकीर का भजन जैसे फूलों के आकर…