रविवार, 11 दिसंबर 2016

नोटबंदी के दौर में फकीरी के जलवे

मैं फकीरी के नाना रूपों के आकर्षण में आजकल त्रिशंकु हो गया हूं. एक तरफ संत कवि कबीर दूसरी तरफ विश्वगुरु बनते भारत के परधानसेवक जी. एक तरफ कबीर की फकीरी खींचती है, दूसरी तरफ परधानसेवक की. गालिब चचा ने ऐसे ही त्रिशंकु हुए मुझ जैसे आदमी के लिए लिखा होगा कि'ईमां मुझे रोके है जो खीचें है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे'.

इनमें से काबा और कलीसा यानी मस्जिद और मयखाना कौन है, यह तो पक्का पता नहीं है लेकिन यह पक्का पता है कि 'होता है शबो-रोज तमाशामेरे आगे.'

बात भटक रही है, इसे भटकने नहीं देना है. मैं मोदी जी को आदर्श फकीर मानकर उन पर कॉन्सन्ट्रेट करना चाह रहा हूं. लेकिन उनकी फकीरी काफीदिलचस्प है. 25 क्विंटल फूलों की महक वाली राजशी फकीरी अपन कबीर—फैन जुलाहों, गढ़रियों पर कहां फबेगी! मैं दोनों फकीरी के बीच मेंचकरायमान हो रहा हूं.

संत कवि कबीर का बड़ा मशहूर भजन है, 'मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में...' आजकल यह अप्रसांगिक हो गया है. न हम पर सूट कर रहा है, न हमारेदेशकाल पर. इस भजन की आगे की पंक्तियां मेरे लेख से निकलकर भागना चाहती हैं.

फकीर का भजन जैसे फूलों के आकर्षण में फंस गया है. वह बहराइच जाना चाहता है. आज बहराइच में मोदी जी की परिवर्तन महारैली है. परिवर्तनयह हुआ है कि देसी रैली में 25 क्विंटल विदेशी फूल आया है. थाईलैंड, दिल्ली, कलकत्ता और नवाबों के शहर लखनउ से.

यह फकीरी का ही प्रताप है कि जिस दिल्ली से चलकर नये नोट बहराइच, गोंडा, बस्ती, लखनउ, कलकत्ता, बेंगलूर नहीं पहुंच सके, उस दिल्ली केप्रशासक के लिए तमाम शहरों से महंगे फूल खुद ही चलकर बहराइच आ गए हैं. पूरे 25 क्विंटल फूल.

फूल क्या हैं! अमीरी का प्रदर्शन. अमीरी क्या है? विनाश का द्वार. फूलों की महक मनुष्य को साधना से विरत करती है! जब तक फूलों का शबाबबरकरार है, तब तक ही उसकी महक बरकरार है और तभी तक अमीरी. शबाब यानी जवानी क्षणभंगुर है, इसलिए महक भी क्षणभंगुर है. महकअमीरी का प्रतीक है. यानी अमीरी भी क्षणभंगुर है. यही साबित करने के लिए फकीर को 25 क्विंटल फूल जुटाने पड़े हैं. विदेश से फूल इसलिए आए हैंताकि किसी को यह भ्रम न रहे कि जम्बूदीप से बाहर कुछ शाश्वत है! उस फूल की महक भी क्षणभंगुर है. हमें फकीरी की साध्ना करनी है!

भारत आध्यात्म की ताकत पर टिका है. वह हर क्षणभंगुर तत्व को नकार देता है. उसने अमीरी को नकार दिया है. सारे लोगों की जेब से, खेत से,संदूक से, बंदूक से, तिजोरी से, छिछोरी से, नौकरी से, लॉटरी से जितना पैसा निकल सकता था, सब निकाल कर बैंकों में जमा करा दिया गया है.लोग फकीर बन—बनकर कतार में खड़े हो गए हैं एटीएम के सामने. एटीएम भी किस देवता से कम है! एटीएम देवता अगर किसी को दाम-दर्शन देरहे हैं तो समझिए कि उसे सशरीर वैकुंठ प्राप्त हुआ.

दूसरी तरफ सारे देश का धन बैंकों में एकत्र हो गया है. समझ लो कि लालची लोगों के लिए नरक का द्वार खुल गया है. लुटेरों और पापियों ने चोर इसेलूटना शुरू कर दिया. उन्हें पकड़कर सजाएं दी जा रही हैं. परधान जी ने कहा है कि आठ नवंबर के बाद सोर पापों का हिसाब होगा.

सारे पापी लंदन भेजे जाएंगे. विजय माल्या नामक पापी ने सैकड़ों करोड़ हड़पने का पाप किया था, वह  लंदन नामक नरक में सज़ा काट रहा है. इसीतरह सारे पापियों को सजा मिलेगी.

मगर फकीर कवि कबीर दास मेरा ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं-'जो सुख पावो राम भजन में, सो सुख नाही अमीरी में.' मैं कबीर दास कोभारत का बड़ा कवि मानते हुए भी उनमें संशोधन की गुस्ताखी करना चाह रहा हूं.

मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में...
जो सुख पावो नोटबंदी में,
सो सुख नाही करंसी में.
भला बुरा सब का सुन लीजै,
कर गुजरान इमरजेंसी में.
दिल्ली नगर में रहिनी हमारी,
रैली बहराइच झूंसी में.
दाल, भात से नरक मिलत है
मुक्ति मिलत है भूसी में.

इतिश्री फकीरी कथा.