संदेश

November, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या आपको भी उन्मादी भीड़ में तब्दील होने की जल्दी है?

कृष्णकांत
मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना तड़प का न होना सब कुछ सहन कर जाना... -पाश
किसी समाज के लिए इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है कि लोग मुर्दा शांति से भर जाने के लिए बेकरार हों. समाज में सबकुछ सहन कर जाने लायक मुर्दनी छा जाना साधारण बात नहीं है. राममनोहर लोहिया कहते थे-'जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं किया करतीं.' लेकिन हमारा समय मनहूस समय है. यहां पर कौमों में ​जिंदा दिखने का कोई हौसला नजर नहीं आता. दुनिया भर में बदलाव हमेशा युवाओं के कंधे पर सवार होकर आता है. हमारे यहां का युवा अपने कंधे पर कुछ भी उठाने को तैयार नहीं है. उसने राजनीतिक मसलों को धार्मिक भावनाओं का मसला बना लिया है और आस्था में अंधे होकर अपनी रीढ़ की हड्डी गवां दी है. इसलिए जब आप सरकार के किसी फैसले या किसी कार्रवाई सवाल करते हैं तो अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े आपको गद्दार कहता है, दलाल कहता है, देशद्रोही कहता है या पाकिस्तान का एजेंट कहता है. भोपाल एनकाउंटर को लेकर सोशल मीडिया पर वही युद्ध …

सैकड़ों शहादतें कैसे रुकेंगी? मीडिया पर प्रतिबंध लगा दो

चित्र
सीमा पर आज फिर दो जवान शहीद हो गए. इस साल अब तक कुल 76 जवान शहीद हो चुके हैं. पिछले तीन महीनों में 42 भारतीय जवान शहीद हो चुके हैं. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कम से कम 100 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ है और 8 जवान शहीद हुए हैं.
1988 से सितंबर, 2016 तक कुल 6,250 भारतीय रक्षाकर्मी आतंकी वारदातों में शहीद हुए हैं. वहीं जवाबी कार्रवाई में कुल 23,084 आतंकियों को भारतीय जवानों ने मार गिराया. इन घटनाओं में करीब 15000 लोग मरे हैं.
56 इंची सीने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद दो साल के भीतर 156 जवान शहीद हुए हैं.
यदि ये आंकड़े सही हैं तो पिछले ढाई साल में करीब ढाई सौ जवान शहीद हो चुके हैं. सरकार को इस बारे में स्पष्ट आंकड़ा जारी करके बताना चाहिए कि अब तक कुछ कितने जवान शहीद हुए.
आतंकी वारदातों में मारे गए जवानों की सालाना औसत मृत्यु दर पर नजर डालें, तो यह आंकड़ा कांग्रेस की मनमोहन सरकार से जरा भी कम नहीं है.
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं में वृद्धि हुई है. कश्मीर में आतंकी वारदात की संख्या वाजयेपी और मनमोहन सर…

‘लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए राष्ट्रवाद पर नहीं’

चित्र
प्रश्न है राज्य की राजनीतिक हिंसा का, जो एक खास तरह की राजनीतिक भाषा में व्यक्त हो रही है. लेकिन पूरी संसद बैठ गई राष्ट्रवाद पर बहस करने, जैसे कि राष्ट्रवाद पर कोई सेमिनार हो रहा हो. बाहर हमले हो रहे हैं, संसद में अकादमिक सेमिनार हो रहा जैसे कि इस बहस से यह मसला निपट जाएगा


अपूर्वानंद

किसी से आप पूछेंगे कि वह किसको मानता है राष्ट्रवाद तो वह नहीं बता पाएगा. कुछ धुंधली-सी अवधारणा है लोगों के दिमाग में कि मुल्क हमेशा खतरे में रहता है, सैनिक उसकी रक्षा करते हैं, वे मारे जाते हैं, और इधर बुद्धिजीवी हैं जो तरह-तरह से सवाल उठाते रहते हैं, जबकि इत्मिनान से तनख्वाहें ले रहे हैं और जनता के पैसे पर शानदार जगहों में बैठकर पढ़ रहे हैं, जबकि हमारे सैनिक सियाचीन में बर्फ में दबकर मर जाते हैं.

अगर आप लोगों से पूछें तो कुल मिलाकर आपको जवाब यही मिलेगा जो आजकल मिल रहा है. अब आप इस अवधारणा को तोड़ेंगे कैसे? इसको तोड़ना बहुत ही मुश्किल है. लोगों को यह समझाना कि जो लोग विश्वविद्यालयों में बैठकर पढ़ रहे हैं, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, या जो सवाल कर रहे हैं, वह सवाल करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. यह समझाना भ…