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क्या मध्य प्रदेश पुलिस का एनकाउंटर फर्जी है?

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मध्य प्रदेश में हुआ 8 लोगों का एनकाउंटर प्रथमदृष्टया फर्जी है. पुलिस की मुठभेड़ कहानी पर तमाम सवाल उठ रहे हैं.
जब कैदी जेल में थे, निहत्थे थे, सुरक्षा के अंदर थे, तब वे आराम से जेल में सेंध लगाते हैं और एकमात्र पुलिसकर्मी की हत्या करके भागने में सफल हो जाते हैं. पुलिस उन्हें भागने से नहीं रोक पाई, लेकिन एनकाउंटर तुरंत कर दिया, सफलतापूर्वक. वह भी सभी आठ कैदियों का.
ये वे कैदी हैं जो 2013 में खंडवा जेल से भी फरार हुए थे. दोबारा उन्हीं लोगों की सुरक्षा में सिर्फ एक गार्ड रखा गया था?
भागे हुए कैदियों के पास हथियार, जींस, टीशर्ट आदि चीजें कहां से आईं? सेंट्रल जेल में कैसी व्यवस्था थी कि कैदी सुरक्षाकर्मी को मारकर चलते बने और उन्हें रोकने वाला नहीं था?
कैदियों ने सेंध लगाई और सिर्फ सिमी के तथाकथित आतंकी भागे जो कि मुसलमान थे. बाकी सब कैदी  क्या वहां पर कल्पवास करने गए हैं? 8 लोग भाग रहे थे, सुरक्षाकर्मी मारा जा चुका था, लेकिन अन्य कैदियों ने भागने की क्यों नहीं सोची? क्या बाकी का हृदयपरिवर्तन हो गया था कि उन्होंने जेल में ही रहने का फैसला किया?
राज्य सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि सिमी के आ…

मुठभेड़ चाल

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कभी कानून व्यवस्था के लिए खतरा बने कुख्यात अपराधियों से निपटने के लिए अंजाम दी जाने वाली मुठभेड़ की कार्रवाई गैर-कानूनी हत्याओं के एक ऐसे खेल में बदल गई है जो अधिकारियों के लिए पद, पैसा और प्रशंसा बटोरने का जरिया बन गई. क्या मुठभेड़ के नाम पर भारतीय कानून ऐसी हत्याओं की इजाजत देता है?

कृष्णकांत 

सीबीआई कोर्ट ने 25 साल पहले पीलीभीत में हुए 10 सिखों के फर्जी एनकाउंटर में 47 पुलिसकर्मियों को दोषी पाया है. पच्चीस साल पहले पीलीभीत में पुलिस ने दस सिख युवकों को आतंकी बताकर मार डाला था. सीबीआई जांच हुई तो पता चला वे आतंकी नहीं, तीर्थयात्री थे जो सिख तीर्थस्थलों की यात्रा करके वापस घर लौट रहे थे. हाल ही में सीबीआई अदालत ने मुठभेड़ को फर्जी ठहराया और 47 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. अदालत के अनुसार पुलिस ने प्रमोशन के लालच में इस वारदात को अंजाम दिया था.

फर्जी एनकाउंटर तो हमारे देश में आम बात है, लेकिन बहुत कम मामले ऐसे हैं जिनमें फर्जी एनकाउंटर करने वाले पुलिसकर्मियों या सैन्यकर्मियों को सजा हुई हो. हो सकता है कि एनकाउंटर कभी ऐसे अपराधियों को ठिकाने लगाने का हथियार रहा हो जो कानून-व्य…

फर्जी एनकाउंटर का खेल जनता को स्वीकार नहीं करना चाहिए

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वीएन राय, पूर्व पुलिस ​अधिकारी 

सबसे बड़ी बात यह है कि भारतीय समाज में एनकाउंटर को स्वीकार्यता मिली हुई है. समाज इसे स्वीकार करता है. आप इसे एक उदाहरण से समझिए कि एक मशहूर कांड; भागलपुर का अंखफोड़वा कांड, जिस पर प्रकाश झा ने फिल्म भी बनाई थी वह बहुत ही जघन्य कांड था. बिहार की जनता आम तौर पर पुलिस विरोधी जनता है और जब भी कोई बात होती है तो सड़क पर निकल आती है. लेकिन उस कांड की जांच करने जब एक दल गया तो पूरा भागलपुर बंद हो गया. भागलपुर के प्रोफेसरों से लेकर रिक्शेवालों तक सबने हड़ताल की और सबने कहा कि नहीं बहुत सही हुआ था. तो सबसे बड़ी दिक्कत है कि सामाजिक रूप से जब आप ऐसी घटनाओं को इस तरह से स्वीकार करेंगे तो पुलिसवालों को भी लगता है कि अगर कानून-कायदा और अदालतें काम नहीं कर रही हैं तो यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह सब कुछ ठीक करे और अपराधी को मार दे क्योंकि अपराधी को अदालतें सजा नहीं दे पा रहीं.
यह बड़ा खतरनाक खेल है कि एक-दो अपराधी, जो सचमुच दुर्दांत होते हैं, जिनको अदालत सजा नहीं दे पाती वे मारे जाते हैं. फिर एक चलन बन जाता है और पैसा लेकर मारना शुरू हो जाता है. इसमें यह भी होता है कि …

समान नागरिक संहिता : एक देश एक कानून

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संविधान सभा में काफी विचार-विमर्श के बाद संविधान के नीति निदेशक तत्वों में यह प्रावधान किया गया था कि राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लाने का प्रयास करेगा. समान नागरिक संहिता का मुद्दा हमेशा चर्चा में तो खूब रहा, चुनावी घोषणा पत्रों में भी शामिल हुआ, लेकिन इसका अब तक कोई प्रारूप तक मौजूद नहीं है. अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इस विषय पर लॉ कमीशन से रिपोर्ट सौंपने को कहा है, लेकिन क्या समान नागरिक संहिता के लिए देश तैयार है?



हाल ही में केंद्र सरकार ने विधि आयोग को पत्र लिखकर समान नागरिक संहिता (यूनीफाॅर्म/कॉमन सिविल कोड) यानी सभी के लिए एक जैसे कानून पर सुझाव मांगा है. अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से अपना रुख साफ करने को कहा था. इसके बाद सरकार ने पहली बार विधि आयोग को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर रिपोर्ट देने को कहा था. कुछ दिन पहले सरकार ने विधि आयोग को दोबारा पत्र लिखकर इस मसले की याद दिलाई जिसके बाद यह मसला चर्चा में है.

भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री का पद संभालने के बाद कहा, ‘समान नागरिक संहिता की दिशा में क…

भगत सिंह के नाम पर सियासी भगदड़

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भगत सिंह जब तक जीवित थे, उन्हें किसी राजनीतिक दल का साथ नहीं मिला. शहादत के बाद उन्हें पूरी तरह भुला दिया गया. लेकिन पिछले कुछ समय से राजनीतिक दलों को अचानक उनकी याद आने लगी है. अब सभी दलों का दावा है कि भगत सिंह उनके हीरो हैं.


कृष्णकांत


‘मां, मुझे कोई शंका नहीं है कि मेरा मुल्क एक दिन आजाद हो जाएगा, पर मुझे डर है कि गोरे साहब जिन कुर्सियों को छोड़कर जाएंगे, उन पर भूरे साहबों का कब्जा हो जाएगा.’ आजादी के तमाम नायकों में से एक शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह ने अपनी मां को लिखी चिट्ठी में यह बात कही थी. उन्हीं भगत सिंह ने शहीद होने से पहले अपनी जेल डायरी में लिखा था, ‘सरकार जेलों और राजमहलों, या कंगाली और शान-शौकत के बीच किसी समझौते के रूप में नहीं होती. यह इसलिए गठित नहीं की जाती कि जरूरतमंद से उसकी दमड़ी भी लूट ली जाए और खस्ताहालों की दुर्दशा और बढ़ा दी जाए.’ उसी डायरी में वे एक जगह लिखते हैं, ‘शासक के लिए यही उचित है कि उसके शासन में कोई भी आदमी ठंड और भूख से पीड़ित न रहे. आदमी के पास जब जीने के मामूली साधन भी नहीं रहते, तो वह अपने नैतिक स्तर को बनाए नहीं रख सकता.’ किसी के भूखे न रहने का …

ध​र्म और राजनीति का कॉकटेल

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सोनी सोरी पर रिसर्च करने गए शोध छात्र को गिरफ्तार कर लिया गया. क्या रिसर्च करना अपराध है या सोनी सोरी होना अपराध है?
14 अक्तूबर से शुरू होने वाले उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल शुरू होने से ठीक एक दिन पहले की शाम उसे रुकवाने की कोशिश की गई. बताया गया है कि यह संघ के दबाव में रुकवाया गया. बाद में आयोजन स्थल बदल कर आयोजन किया गया. इससे संघ को या सरकार को क्या खतरा था?
इंदौर में इप्टा की नेशनल कांफ्रेंस में भी गुंडों द्वारा व्यवधान पैदा किया गया. इसमें भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय की संलिप्तता बताई गई. इप्टा जैसे साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों से किसको खतरा है?
वृंदावन में कुछ नास्तिक ​मित्र मिलकर एक सम्मलेन करना चाह रहे थे. इसमें अखिलेश प्रशासन की मिलीभगत से साम्प्रदायिक गुंडों ने बवाल किया. नास्तिक दर्शन की परंपराओं वाले देश में नास्तिक और आस्तिकता गुंडे कबसे और क्यों तय करने लगे?
इन सभी कार्यक्रमों में कुछ ऐसा नहीं था जो सरकार विरोधी होता. ये कार्यक्रम किसी के भी विरोध में नहीं थे, लेकिन गुंडागर्दी के साथ उन्हें रोका गया.
स्कूल प्रिंसिपल ने मोदी और आरएसएस के खिलाफ पोस्ट लिख दी तो गिरफ्तार हो गया…