गुरुवार, 15 सितंबर 2016

गणतंत्र का गुड़गोबर

गाय के नाम पर हो रही राजनीति से समाज की अखंडता पर संकट आ गया है. देश में दलित से लेकर मुसलमानों को गोरक्षा के नाम पर हो रही गुंडागर्दी का सामना करना पड़ रहा है. गोरक्षा के नाम पर उपद्रव इतना ज्यादा हो गया है कि इसे रोकने के लिए प्रधानमंत्री को अपील करनी पड़ रही है.

कृष्णकांत 

भोलेपन के पर्याय के रूप में मशहूर बेचारी गाय को पता भी नहीं होगा कि देश की सड़कों पर उसकी सुरक्षा के बहाने उपद्रव हो रहे हैं, तो भारतीय संसद में बहस में भी हुई. गाय को यह भी नहीं पता होगा कि उसका नाम अब सियासी गलियारे में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा जा चुका है. सियासत दो खेमों में बंट चुकी है. शहर-दर-शहर कचरा चबाती और गोशालाओं में हजारों की संख्या में मर चुकी गायों को यह भी नहीं मालूम होगा कि उनके नाम पर तमाम बेरोजगार राजनीतिक कार्यकर्ताओं की चांदी हो गई है. पार्टियों और संगठनों के थिंक टैंक गाय को अपने-अपने हिसाब से दुहने में लगे हैं तो ऐसे भी वैज्ञानिक अवतरित हो गए हैं जो गाय के मूत्र में सोना और गोबर में परमाणुरोधी तत्व खोज रहे हैं.

तमाम गुट, जिनको लगता है कि गाय की रक्षा करके वे हिंदू धर्म की रक्षा कर रहे हैं, उन्होंने चंदे और फंड जुटाकर गोशालाएं खोल ली हैं. कुछ तो गोरक्षा के लिए इतने बेचैन हैं कि रात भर जागकर सड़कों पर वाहनों की तलाशी लेते हैं और उनमें कोई मवेशी मिल जाएं तो ड्राइवर को पीटने से लेकर मार डालने तक की कार्रवाई को अंजाम दे सकते हैं. गोरक्षक स्वयंभू न्यायालय हैं. गोरक्षक आपको गोबर और गोमूत्र का पंचगव्य बनाकर खिला सकते हैं, जैसा उन्होंने फरीदाबाद में किया. वे आपको पीटकर मार सकते हैं, बांधकर कोड़े बरसा सकते हैं या पुलिस को सौंप सकते हैं.

गाय किसी खूंटे से हटने के बाद बूचड़खाने पहुंचेगी या शहरों-कस्बों की गलियों में पन्नियां चबाती फिरेगी, या रास्ते में उसके नाम पर दंगा हो जाएगा, यह समाज की आस्था पर निर्भर है. लेकिन भटकती गाय के नाम पर समाज को क्या दिशा मिलेगी, यह राजनीति तय करती है. अगर गाय कोई इंसानी प्रजाति होती, इंसान की तरह बोल सकती या सोच सकती तो नई सदी में सबसे प्रभावी आंदोलन गाय प्रजाति के लोग चलाते. बुद्धिजीवियों ने अब तक गाय-विमर्श पर लंबे-लंबे पर्चे लिखे होते. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है. शायद ही दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां किसी जानवर के नाम पर हत्याएं होती हों. भारत वह अनोखा देश तो है ही, जानवरों में गाय को वह मुकाम हासिल है जो पूरे समाज में उथल-पुथल मचा सकता है. उसके साथ पहले धार्मिक आस्था जुड़ी थी, जिसे अब सियासत का साथ मिल गया है. जिन्हें सुरक्षा चाहिए उनकी हालत यह है कि रोजगार की तलाश में गांव के तमाम निम्न-मध्यमवर्गीय युवक शहर आकर यहां की झुग्गियों में भर जाते हैं तो गाएं शहर आकर दालान में चारा खाने की जगह सड़कों पर पॉलीथिन खाती हुई पाई जाती हैं.

आॅनर किलिंग के लिए कुख्यात हरियाणा में तो सरकार ने बाकायदा 24 घंटे की गोरक्षा हेल्पलाइन भी लॉन्च कर दी है. हरियाणा सरकार गोरक्षा के लिए पुलिस की स्पेशल टीम भेजने, सड़कों पर गोरक्षा के लिए चेक पोस्ट लगाने जैसे उपायों की घोषणा कर चुकी है. जिस देश में बीस सालों में कर्ज, भूख और गरीबी के चलते तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और उन पर कोई सरकार चिंतित नहीं है, उसी देश में सत्ताधारी पार्टी के आनुषंगिक संगठन गाय की रक्षा के लिए अलग से मंत्रालय गठित करने की मांग कर रहे हैं. विश्व हिंदू परिषद की मांग है कि केंद्र सरकार गाय मंत्रालय का गठन करे. बताया जाता है कि इस मांग को संघ परिवार का समर्थन प्राप्त है.

अपने भाषणों में गांधी और बुद्ध के संदेशों के साथ ‘21वीं सदी में भारत को विश्वगुरु बनाने’ का सपना देखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैसा महसूस करते होंगे जब गोरक्षा के बहाने देश भर में दलितों की पिटाई की खबरें सुनते होंगे? क्या हमारी तरह वे भी सोचते होंगे कि विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बन चुके देश में अचानक ऐसा क्या हो गया कि समाज मध्ययुग में लौटकर मरे हुए पशुओं के लिए लड़ने लगा? मरी हुई गाय की खाल उतारकर बेचने के एवज में जिंदा आदमी की खाल उतारी जाने लगी है. जिनका यह पुश्तैनी पेशा रहा है, उस दलित समाज को अगर अपने इस पेशे के लिए भी पीटकर मारा जाने लगे तो भारतीय संविधान के आदर्शों का क्या होगा? एक ऐसा पेशा, जिसके लिए एक समुदाय को अछूत माना जाता रहा है, अब उसे वह अछूत काम करने पर भी जान का खतरा आ खड़ा हुआ है.

जब तक किसान गाय पालता था तब तक वह बस दूध देने वाला जानवर भर थी, जो हिंदू आस्था से भी जुड़ी है. लेकिन जबसे सरकारों ने गोशाला खोल ली है तबसे तमाम राजनीतिक बेरोजगारों की नई-नई दुकानें भी खुल गई हैं. अब गाय को लेकर नई तरह की उथल-पुथल देखने को मिल रही है. हाल ही में राजस्थान की हिंगोनिया गोशाला में पंद्रह दिन के भीतर एक हजार गायों के मरने की खबर आई. इसके बाद मचे सियासी हड़कंप के चलते मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने दो मंत्रियों को गोशाला निरीक्षण के लिए रवाना किया. एसीबी की टीम को गोशाला पहुंचाया गया, तो पता चला कि गोशाला में चार से पांच फुट का दलदल बन चुका है क्योंकि लंबे समय से वहां से गोबर नहीं उठाया गया है. अनुमान है कि इस दलदल में कम से कम 200 गायें दफन हो चुकी हैं. 20 बछड़े ऐसे पाए गए जिनकी मांओं का अता-पता नहीं था. सरकार इस गोशाला को 20 करोड़ रुपये सालाना देती है, लेकिन मजदूरों को कई महीने से तनख्वाह नहीं मिली थी, इसलिए वे हड़ताल पर चले गए.

दिल्ली के नजफगढ़ में ‘द पिंजरापोल सोसायटी गोशाला’ है. यह 119 साल पुरानी है जिसमें छह हजार गायें, बछड़े व सांड़ मौजूद हैं. इसके अध्यक्ष बलजीत सिंह डागर कहते हैं,  ‘गोरक्षा के नाम पर जो हो रहा है वह बिल्कुल ठीक नहीं है. गाय के नाम पर दंगा-फसाद पहले भी होता रहा है. हमारे यहां दलित जातियों के लोग पहले भी मरे हुए पशुओं की खाल उतारते थे. अब वही काम बड़े लोग कर रहे हैं. गरीबों को मारा जा रहा है लेकिन बड़ों को कोई कुछ बोल नहीं रहा है. इतने बड़े-बड़े कारखाने लगा दिए गए हैं, आजकल उन्हें बड़े लोग चलाते हैं. ये तो बेकार का झंझट कर रहे हैं. मरी हुई गाय से दलितों की रोजी-रोटी चलती थी. अब उसी के लिए उन पर अत्याचार हो रहा है. ये लोग सदियों से ये करते आए हैं.’

बलजीत सिंह बताते हैं, ‘हमारी गोशाला में जो गायें मर जाती हैं उन्हें एमसीडी वाले ले जाते हैं. गाजीपुर मंडी में बूचड़खाना है वहां ले जाकर उसकी खाल वगैरह उतारी जाती है. मसला ये है कि अब गोरक्षा के नाम पर यह होने लगा है कि कोई आदमी गाय लेकर जा रहा है तो उसे भी पीटा जा रहा है. हाल में कई हत्याएं हो गईं. उस पर भी मारपीट करते हैं. इसमें राजनीतिक पार्टियां और समाज के आवारा लोग भी शामिल हैं जो बेकार के झगड़े-फसाद करते रहते हैं. सरकार को पशु का चमड़ा उतारने का लाइसेंस देना चाहिए. दूसरे, जो आदमी गाय लेकर जा रहा है अगर उस पर शक भी है तो ढंग से जांच हो. कोई दूध पीने के लिए गाय लेकर जा रहा है तो उसकी पिटाई कर देना गलत है. कुछ लोग राजनीति करते हैं, वे चाहते हैं कि लोग आपस में लड़ें. इससे समाज में समस्या पैदा हो रही है.’

गुजरात के ऊना में 11 जुलाई को मरी हुई गाय की खाल उतारने पर सात दलित युवकों की बेरहमी से पिटाई
गई. ऊना के मोटा समाधियाला गांव में इन युवकों पर गोहत्या का आरोप लगाकर करीब 35 गोरक्षकों ने पहले उन्हें लोहे की रॉड से बुरी तरह पीटा, फिर ऊना शहर लाकर उनके हाथ बांधकर उन पर कोड़े बरसाए गए. सभी को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया. गोरक्षकों ने इस घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कराया. इस घटना से दलित समुदाय में जबरदस्त गुस्सा देखा गया. हजारों की तादाद में दलित सड़कों पर उतरे. राज्य में बंद आयोजित करके दोषियों को कड़ी सजा देने की मांग की गई. घटना के एक सप्ताह के भीतर विरोधस्वरूप करीब 30 युवकों ने आत्महत्या का प्रयास किया.

एक महीने बाद भी यह आंदोलन जारी है. दलित समुदाय में उपजे गुस्से ने गाय और गोरक्षा की राजनीति को मात देने के लिए कमर कस ली है. ऊना में 20 हजार दलितों ने एकत्र होकर कसम खाई कि वे भले ही भूख से मर जाएं लेकिन अब मरी गायों को उठाना और चमड़ी उतारना बंद कर देंगे. गुस्साए दलित समुदाय के लोगों ने मरी हुई गायों को जिला कलेक्ट्रेट पहुंचा दिया और कहा कि गाय जिसकी मां है वे स्वयं उसका अंतिम संस्कार करें. इस कार्रवाई से सियासी हलके में हड़कंप मच गया.

संसद से लेकर सात समंदर पार तक गोरक्षकों ने इतनी कुख्याति बटोरी कि प्रधानमंत्री को इस पर बयान देना पड़ा. प्रधानमंत्री ने कहा, ‘अगर आप गोली मारना चाहते हैं तो मुझे मार दीजिए, लेकिन मेरे दलित भाइयों पर हमला बंद करो.’ उन्होंने कहा, ‘70-80 फीसदी गोरक्षक फर्जी हैं. मैं हर किसी से कहना चाहता हूं कि इन फर्जी गोरक्षकों से सावधान रहें. इन मुट्ठी भर गोरक्षकों का गाय संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि वे समाज में तनाव और टकराव पैदा करना चाहते हैं. गोरक्षा के नाम पर ये फर्जी गोभक्त देश की शांति और सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि असली गोरक्षक फर्जी गोरक्षकों का भंडाफोड़ करें. राज्य सरकारों को उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए… मुझे ऐसे असामाजिक तत्वों पर बड़ा क्रोध आता है जो रात में अपराध करते हैं और दिन में गोरक्षक होने का नाटक करते हैं.’ प्रधानमंत्री का यह भी कहना है कि दलितों की रक्षा करना और उनका सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए. तब सवाल उठा कि सिर्फ दलितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी क्यों? गायों के बहाने पिटते मुसलमानों की जिम्मेदारी कौन लेगा? कोई नागरिक, चाहे वह किसी जाति या धर्म से ताल्लुक रखता हो, अगर सरेआम उसे पीटा जाता है तो क्या भारतीय गणतंत्र की नागरिकता आहत नहीं होती? विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री के बयान को ‘राजनीतिक पाखंड’ बताया. उनका कहना है कि गोरक्षा के बहाने उपद्रव करने वाले लोग भाजपा के ‘वैचारिक हमसफर’ हैं.

गुजरात में दलित आंदोलन का नेतृत्व करने वालों में से एक जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘हम पदयात्रा लेकर निकले और 15 अगस्त को ऊना में सभा की. हमने नारा दिया है कि गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी जमीन दो. आप मरी गाय की चमड़ी उतारने पर हमारी चमड़ी उतार लेंगे? तो आप अपनी गाय से खेलते रहो. हमें न जिंदा गाय से मतलब है, न ही मरी गाय से. हमें जमीनों का आवंटन करो. हम रोजगार की ओर जाएंगे. जिस पेशे के लिए हमें अछूत घोषित किया गया, अब उसी के लिए हमारी चमड़ी उधेड़ रहे हो, यह कैसे चलेगा? हमारी यात्रा ऊना पहुंचेगी. हम वहां पर प्रदर्शन करेंगे और जब तक हमारी सारी मांगें मानी नहीं जातीं, हम यह आंदोलन बंद नहीं करेंगे. हमें भारत के अन्य राज्यों और विदेशों से भी समर्थन मिल रहा है. आने वाले दिनों में यह आंदोलन और फैलेगा.’

जिस तरह गोरक्षा का उपद्रव पूरे देश में फैला था, उसी तरह यह प्रतिरोध भी देश के अन्य हिस्सों में देखने को मिला. सबसे दिलचस्प यह कि यह प्रतिरोध उस गुजरात से उठा जिसे ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ कहा जाता रहा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि इस ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ ने ही नरेंद्रभाई मोदी को पंद्रह साल लगातार गुजरात की गद्दी पर बैठाए रखा और उन्होंने ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का तमगा हासिल किया.

प्रधानमंत्री मोदी के गोरक्षकों के खिलाफ बयान पर जिग्नेश मेवाणी प्रतिक्रिया देते हैं, ‘भाजपा और संघ परिवार के लोग गाय माता की दुम बहुत हिला रहे थे. लेकिन जिस तरह हजारों की संख्या में दलित शक्ति सड़कों पर उतर आई, जिस तरह से यह आंदोलन फैल रहा है, कहीं न कहीं मोदी साहेब और भाजपा को लग रहा है कि गाय की दुम अब उनके गले का फंदा न बन जाए, तब जाकर उन्होंने मुंह खोला है.’

वरिष्ठ साहित्यकार कंवल भारती कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री को हमेशा भावुक बयान देने की आदत है. वे बेवकूफी भरे होते हैं. जैसे कि मुझे गोली मार दो. आप इतनी सुरक्षा में चलते हैं, आपको कोई गोली कैसे मार सकता है? इसे रोकने के लिए आरएसएस से कहना चाहिए कि आज के बाद ऐसी घटना नहीं होनी चाहिए. यह काम जनता नहीं कर रही है. इसके लिए हिंदूवादी संगठनों को रोकना चाहिए. अगर उनको देश को बदलना है, दलितों से मोहब्बत है तो आरएसएस से कहें कि दंगों की राजनीति बंद करो. लेकिन वे ऐसा कभी नहीं कहेंगे.’

प्रधानमंत्री के बयान और संसद में गोरक्षकों के असामाजिक कृत्य की निंदा के बाद भी आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिले में मरी गाय की खाल उतार रहे दो दलितों की पिटाई की गई. गाय की करंट लगने से मौत हुई थी जिसके बाद गाय के मालिक ने खुद ही उसे दलितों को सौंप दिया था. वे गाय की खाल उतार रहे थे तभी वहां स्वयंभू गोरक्षक पहुंचे और दोनों की बुरी तरह पिटाई की. उनमें से एक को काफी गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया.

केंद्र में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से गोरक्षा का मुद्दा काफी गरमाया हुआ है. 17 अक्टूबर, 2015 को आईबीएन-7 चैनल ने एक रिपोर्ट की थी, जिसमें दिखाया गया कि कैसे स्वयंभू गोरक्षा दल के लोग गो-तस्करी में लोगों को पकड़ते हैं और खुद ही उन्हें सजा देते हैं. वे पकड़े हुए लोगों को मारकर अधमरा कर देते हैं. रिपोर्ट में दिखाया गया कि कैसे गोरक्षक कानून अपने हाथ में लेकर हथियार लहराते हैं. लाठी, डंडा, बंदूक, तलवारें और बुलेट प्रूफ जैकेट से लैस गोरक्षक बाकायदा अपने काम को सही ठहराते हैं. ऐसे गोरक्षा समूहों पर प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होने की स्थिति कानून व्यवस्था की स्थिति और राजनीतिक मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है.

यह भी दिलचस्प है कि 80 प्रतिशत गोरक्षकों को ‘फर्जी’ और ‘समरसता बिगाड़ने’ वाला तत्व बताने वाले नरेंद्र मोदी ही वह व्यक्ति हैं जो अपने चुनाव प्रचार के दौरान गोरक्षा पर जोर दे रहे थे. अप्रैल 2014 में बिहार और मध्य प्रदेश में अपनी रैलियों के दौरान उन्होंने कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की नीति पर सवाल उठाए थे कि केंद्र सरकार ‘पिंक रिवोल्यूशन’ लाना चाहती है जिसके तहत देश भर में गायों को काटा जा रहा है और गायों की तस्करी की जा रही है. भारत से निर्यात होने वाले मांस में ज्यादातर भैंस, बकरी, बैल और बछड़े का मांस होता है. लेकिन नरेंद्र मोदी उस समय सिर्फ गायों का जिक्र कर रहे थे कि बूचड़खानों में गोहत्या को बढ़ावा दिया जा रहा है. यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मांस निर्यात पर प्रतिबंध तो नहीं लगा, उल्टा भारत विश्व का अग्रणी बीफ निर्यातक बन गया.

इसी बीच एनिमल वेलफेयर बोर्ड आॅफ इंडिया के बोर्ड मेंबर एनजी जयसिम्हा ने मोदी सरकार पर गोरक्षा के मामले में दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि सरकार गाय की रक्षा करने और तस्करी रोकने के लिए पहले से दी जाने वाली ग्रांट लगातार कम करती जा रही है. यूपीए सरकार ने 2011-12 में 2177.58 करोड़ रुपये की ग्रांट दी थी. 2012-13 में यह राशि घटकर 1606.43 करोड़ रुपये कर दी गई. अगले साल 1299.8 करोड़ रुपये और 2014-15 में 1200.74 करोड़ रुपये बोर्ड को दिए गए. 2015-16 में यह ग्रांट घटाकर 784.85 करोड़ रुपये कर दी गई.

गोरक्षा के नाम पर बढ़ रही गुंडागर्दी और उपद्रव को लेकर चौतरफा आलोचना झेलने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने तल्खी दिखाई तो गोरक्षक उनके ही खिलाफ आग उगलने लगे. सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ गोरक्षकों ने भले ही गाय सिर्फ सोशल मीडिया पर देखी हो, लेकिन प्रधानमंत्री के बयान के बाद उन्होंने अपना गुस्सा जाहिर किया और प्रधानमंत्री पर सेकुलर होने का आरोप लगाया. राजस्थान गो सेवा समिति के प्रदेश अध्यक्ष दिनेश गिरी ने बयान दिया, ‘पीएम के इस बयान से गोरक्षकों का मनोबल टूट गया है और उनकी भावनाएं आहत हुई हैं. मोदी जी के बयान और हिंगोनिया गोशाला में गाय की मौत के बाद गोसेवा करने में भारी दिक्कतें हो रही हैं.’ उनके मुताबिक, यह समिति 22 अगस्त को बैठक करके आगे की रणनीति तय करेगी. अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दे डाली.

दूसरी ओर, गोरक्षा को प्रमुख एजेंडे में रखने वाले आरएसएस को भी गोरक्षकों के खिलाफ बयान जारी करना पड़ा. विशेषज्ञ इसे भाजपा और उसके मातृ संगठन आरएसएस की मजबूरी मान रहे हैं क्योंकि कुछ महीने पहले पार्टी और संगठन के कार्यकर्ताओं से लेकर नेता तक गोरक्षा के पक्ष में लामबंद थे. असहिष्णुता की बहस आगे बढ़कर ‘राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रद्रोह’ में परिवर्तित हुई तो केंद्रीय मंत्रीगण और वरिष्ठ नेता न्याय के लिए अदालत का मुंह देखने की जगह खुद ही मुंसिफ बन बैठे और भीड़ की कार्रवाई के पक्ष में भी स्पष्टीकरण देने लगे थे. लेकिन गुजरात में दलितों के सड़क पर उतरने और आंदोलन छेड़ देने का परिणाम यह हुआ कि सत्ताधारी दल और सरकार दोनों को आत्मरक्षात्मक मुद्रा अख्तियार करनी पड़ी. गोरक्षकों पर गुस्सा तब तक नहीं दिखाया गया जब तक वे गोहंता के रूप में मुसलमानों को चिह्नित करके उन पर हमला करते रहे. आरएसएस और भाजपा की प्रमुख चिंता दलितों या मुसलमानों पर हमले को लेकर है कि नहीं, यह रहस्य है, लेकिन उनकी यह चिंता जरूर होगी कि संघ परिवार जिस ‘विशाल हिंदू परिवार’ का सपना देखता है, दलितों पर हमलों के बाद वह बिखराव की ओर बढ़ने लगा है.

वरिष्ठ साहित्यकार व दलित मामलों के विशेषज्ञ कंवल भारती कहते हैं, ‘समस्या यह है कि निचली जातियों में जागरूकता के स्तर पर वह काम नहीं हो पा रहा है. इसलिए दलित-पिछड़ी जातियों और मुसलमानों को आपस में लड़ाना आसान है. वे सब गरीब लोग हैं, दिहाड़ी मजदूर हैं. वहीं दंगे के वक्त हिंदू-मुसलमान बन जाते हैं और दंगा करते हैं. एक तरफ दलित आबादी होती है, दूसरी तरफ मुसलमान होते हैं. लड़ाने वाले सुरक्षित दुर्ग में रहते हैं. वे कभी नहीं मारे जाते. दंगों का अपना अर्थशास्त्र है. आप देखिए कि जहां मुसलमान या दलित आर्थिक रूप से थोड़े संपन्न हुए वहां दंगा करवा दिया जाता है. उनकी कमर तोड़ दी जाती है. जैसे भागलपुर में हुआ, बनारस में हुआ. बुनकरों के घर सत्यानाश कर दिए. यही गुजरात में किया गया.’ इसी बात को आगे बढ़ाते हुए पत्रकार अरविंद शेष कहते हैं, ‘गाय कोई धार्मिकता का मामला है ही नहीं. यह देखना चाहिए कि मोदी सरकार के आने के बाद हिंदूवादी, यहां तक कि सरकार के स्तर पर, लोग गाय के चलते किसी को मारने को क्यों तैयार हो जा रहे हैं? ऊना में, हरियाणा में या दूसरी जगहों पर जो लोग हमले कर रहे हैं, वे सब के सब संघ से जुड़े नहीं हैं. एक आबोहवा बना दी गई है कि गाय हमारी माता है. अब वो किसी को भी मारेंगे. मुसलमान या हिंदू कोई भी हो. यह भस्मासुर पैदा करने जैसी स्थिति है.’

जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘आपको गुजरात की हालत बताता हूं कि साढ़े चार साल भाजपा वहां पर विकास के दावे करती है. लेकिन जब चुनाव आता है तो आरएसएस और उसके कैडर गाय का नारा लगाने लगते हैं और गाय से जुड़े वीडियो प्रसारित करने लगते हैं. मांस का लोथड़ा कहीं मिल जाए तो उसको सीधे गोमांस बता दिया जाता है और मुसलमानों पर आरोप लगा दिया जाता है. अब सवाल उठता है कि मांस का टुकड़ा बिना प्रयोगशाला में टेस्ट के कैसे पता चल जाता है कि किसका मांस है? गाय को पवित्र बनाने और उसके नाम पर उपद्रव करने की यह राजनीति लंबे समय से चल रही है, इसीलिए गोरक्षक इतना बेखौफ हैं. मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के पहले जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी गुजरात में यही होता रहा है. मुसलमानों को गौ माता के नाम पर बहुत प्रताड़ित किया गया है. वीडियो प्रसारित करके, पोस्टर लगाकर अभियान चलाए गए.’
अरविंद शेष कहते हैं, ‘यह बात ध्यान रखना चाहिए कि कोई दलित मरी हुई खाल उतारेगा, उसकी यह ड्यूटी भी ब्राह्मणवाद ने ही तय की. आज वह खाल उतारते हुए पाया जाता है तो उसकी हत्या भी आप ही करते हैं. अब जब उन्होंने खाल उतारने का काम करने से इनकार कर दिया है तब आपको चाहिए कि आप अपना इंतजाम करें.’

कंवल भारती भाजपा और संघ की राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘जब जब आरएसएस-भाजपा सत्ता में आते हैं, वे यही करते हैं. वाजपेयी की सरकार थी तब ओडिशा में हिंदूवादियों ने ईसाई धर्मगुरु ग्राहम को जिंदा जला दिया था. इनका काम यही है. कभी लव जिहाद, कभी मंदिर-मस्जिद, कभी गोरक्षा के नाम पर लोगों को आपस में लड़ाते रहो. यह गोरक्षा खाए, पिए अघाए लोगों के दिमाग का फितूर है. इन्हें रोजी-रोटी की समस्या होती तो यही लोग ऐसे मुद्दे कभी उठाते ही नहीं. कोई काम नहीं है तो चलो गाय बचा लो. गरीब आदमी की हालत यह है कि वह मरी हुई गाय की खाल उतारकर अपनी जीविका चलाता है. अमीर अपनी राजनीति के लिए उसे पीटता है. यह सत्ता समर्थित अभियान है जिसके तहत कभी मुसलमान निशाना बनते हैं तो कभी दलित. इसके लिए उन्हें पैसे भी मिलते हैं और राजनीतिक समर्थन भी. चाहे ऊना की घटना हो, झज्जर की घटना हो या फिर देश के दूसरे हिस्सों में, पुलिस-प्रशासन सबको धता बताकर यह काम किया जा रहा है. क्योंकि जो राजनीति इसे समर्थन दे रही है वह यही चाहती है कि लोग आपस में लड़ते रहें तो दूसरे मसले पर बात न हो.’

अरविंद शेष कहते हैं, ‘मेरा स्पष्ट मानना है कि गाय का पूरा मसला संघ-भाजपा के लिए सिर्फ एक पर्दा है. पिछले दो सालों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार योजनाओं के स्तर पर स्थितियां खराब होती जा रही हैं. लोग अपना रोजगार कर सकें, जीवन चला सकें, इसके लिए हालात को लगातार मुश्किल बनाया जा रहा है. अंबानी-अडाणी के लिए कैसे रास्ते खोले जा रहे हैं, उस पर कहीं बहस नहीं है. वे सब बड़े मसले गाय की बहस में छिप जा रहे हैं. सारे महत्वपूर्ण मुद्दे जो नीतिगत फैसलों से जुड़े हैं, विदेशों से क्या समझौते हो रहे हैं, अमेरिका, इजराइल, ऑस्ट्रेलिया यहां लाकर क्या कचरा फेंक रहा है, जनता को इसकी कोई जानकारी नहीं है. जनता को यह जानकारी मिल रही है कि कहां गाय के लिए दंगा हुआ, किसने किसको मार दिया, गाय हमारी माता है, यही सब देश भर में चल रहा है.’

कांग्रेस नेता पीएल पुनिया आरोप लगाते हैं कि भाजपा और आरएसएस दलितों, पिछड़ों और आम जनता के सवालों से ध्यान हटाने के लिए यह सब दंगा-फसाद करते हैं. इसी बात को दूसरे शब्दों में अरविंद शेष बयान करते हैं, ‘गाय दरअसल एक पर्दा है जो सरकार को सवालों से बचाती है. शिक्षा बजट में कटौती, बालश्रम का नया कानून, दलित आदिवासी छात्रवृत्तियों को बंद करना, एक से डेढ़ लाख स्कूलों का बंद होना, आरक्षण खत्म करने की कोशिश करने जैसे जो बड़े सवाल हैं, वे सब गाय के नाम पर उठ ही नहीं रहे हैं. अकेले छत्तीसगढ़ में 25 हजार से ज्यादा स्कूल बंद हो गए. राजस्थान में 20 हजार स्कूल बंद हो गए. कुल मिलाकर डेढ़ लाख से ज्यादा स्कूल बंद हो गए हैं. कहीं मर्जर के नाम पर तो कहीं पीपीपी के नाम पर. सरकारी स्कूल में कौन बच्चे जाते हैं. वे गरीबों, दलितों और पिछड़े समुदाय के बच्चे हैं. वे सब के सब शिक्षा व्यवस्था से अपने आप बाहर हो जाएंगे. सरकार में बैठे लोग अलग-अलग फ्रंट पर अपने लोगों के जरिए सामाजिक मनोविज्ञान की दिशा तय करने में लगे हुए हैं.’

पुनिया कहते हैं, ‘आरएसएस, भाजपा जानबूझ कर देश को ऐसे मसलों में फंसाए रहना चाहती हैं. फालतू के मसलों में फंसी हुई जनता उनसे सवाल नहीं पूछ सकेगी कि वे सत्ता में आने के बाद क्या कर पाए हैं. जितने वादे किए थे चुनाव में, वे सब अधूरे हैं. भाजपा जनता का विकास करने की जगह लोगों को आपस में लड़ा रही है. उन्होंने खुद गोरक्षा का मुद्दा उठाया था. ऐसे तत्वों को बढ़ावा दिया गया. अब जब जनता आपस में लड़ रही है तब वे डैमेज कंट्रोल करने के लिए ऐसा बयान दे रहे हैं. ऐसे बयान का कोई फायदा नहीं है क्योंकि हमले तो प्रधानमंत्री के बयान के बाद भी हो रहे हैं. दरअसल, भाजपा की नीति यही है कि जनता को आपस में लड़ाया जाए ताकि वह उसी में उलझी रहे. भाजपा शासित राज्यों में ही दलितों और पिछड़ों का आरक्षण खत्म किया जा रहा है. दूसरी तरफ उन पर अत्याचार किया जा रहा है.’

इतिहासकार रोमिला थापर कहती हैं, ‘लोगों को मारा जाना किसी भी हालत में जायज नहीं है. इसे तो स्वीकार नहीं किया जा सकता कि कोई भी विवाद ऐसा हो कि किसी इंसान की जान ले ली जाए. बाकी गोरक्षा का बहुत लंबा-चौड़ा इतिहास है. गोहत्या रोकने की बात तो इतिहास में पुरानी है, लेकिन गोरक्षा आंदोलन बाकायदा 19वीं सदी में शुरू हुआ. अब जिसकी राजनीतिक विचारधारा में यह आइडिया इस्तेमाल हो सकता है, वे इस्तेमाल करेंगे. हम लोग सिर्फ कह सकते हैं कि ऐसा मत कीजिए क्योंकि यह इंसानियत की बात है कि गोरक्षा का नाम लेकर आप किसी को जान से मार दें, यह ठीक नहीं है. लेकिन जिन्हें इस्तेमाल करना है वे करेंगे. इसका अंजाम क्या हो रहा है, यह आप देख ही रहे हैं. एक तरफ मिथ बढ़ाया जा रहा है कि गाय ये थी, गाय वो थी, दूसरी तरफ लोगों को मारने के लिए गाय का बहाना बनाया जा रहा है.’

अरविंद कहते हैं, ‘दलितों के इस आंदोलन का बहुत दूरगामी परिणाम होगा. यह बहुत अच्छा हुआ है. सामाजिक चेतना का विकास होगा. एक पूरा समुदाय जो मरे हुए जानवरों के निपटान के जरिए ही बहुत ही निम्न दर्जे की जिंदगी जीता था, अब उसी को उसने छोड़ दिया है. यह ऐसा काम है जिसे अब तक नहीं करने वाला समुदाय कभी नहीं करेगा. उस पेशे को उस समुदाय की सामाजिक हैसियत से जोड़ दिया गया था. गुजरात के दलितों द्वारा इस काम से इनकार करने का परिणाम एक सामाजिक बदलाव के रूप में सामने आएगा.’

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोधछात्र सुनील यादव कहते हैं, ‘वंदे मातरम, भारत माता की जय, गीता से होते हुए खतरनाक प्रतीकों की यह राजनीति गाय तक पहुंची है. गाय सबसे खतरनाक राजनीतिक प्रतीक थी जिससे मुस्लिम समाज के खिलाफ हिंदुओं की गोलबंदी हो सकती थी. इस दौर में दादरी का अखलाक इसी प्रतीकों की राजनीति का शिकार हुआ. ये हिंदुत्व और गाय के ठेकेदार कभी नहीं चाहते थे कि इन प्रतीकों की राजनीति में दलित शामिल हो जाएं. उन्हें तो हिंदुत्व के किसी भी प्रतीक के आधार पर मुस्लिमों का विरोध करना था जिससे नाराज और बिखरते हुए हिंदू समाज को एक साथ लाया जाए और अपना वर्चस्व कायम रहे. इसीलिए आप देखिए तत्काल रूप से हिंदुत्व के ठेकेदार ऊना के मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे और जब लगा कि पासा पलट गया है तो दलितों का हितैषी बनने की होड़-सी लग गई है. पर इस प्रसंग में मुस्लिमों को लेकर किसी का बयान नहीं आया. तो मामला साफ है इन तथाकथित हिंदुत्व के ठेकेदारों के लिए गाय एक राजनीतिक प्रतीक है न कि मां. इधर तमाम गोशालाओं में और गुजरात की सड़कों पर गायों की दुर्दशा देखकर इसे पुष्ट कर सकते हैं. सवाल सिर्फ एक है कि अपने वर्चस्व को बनाए रखने के इस खेल में उनके लिए सब हथियार हैं और सब शिकार भी.’

भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भी गोरक्षा और गाय के नाम पर सामाजिक व्यवहार और छुआछूत तय करने के रवैये से तंग आकर  बाबा साहब आंबेडकर ने अपने कई लेखों में धर्मग्रंथों के आधार पर यह साबित किया था कि प्राचीन काल में ब्राह्मण भी मांस, यहां तक कि गोमांस खाते थे. जब बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ, जिसकी सबसे बड़ी ताकत अहिंसा और जीव हत्या के निषेध में थी, तो उसके प्रतिकार में हिंदू धर्मगुरुओं और धर्मावलंबियों ने गोमांस का निषेध करके गाय को पवित्र जानवर घोषित किया.

कंवल भारती भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘प्राचीन काल में गाय का मांस खाना आम बात थी. तमाम ग्रंथों में गाय का मांस खाने की बात लिखी है. जब महात्मा बुद्ध ने यज्ञों और पशु बलियों का विरोध शुरू किया तो ब्राह्मणों ने पलटी मारी और खुद को अहिंसक बना लिया. यह बाबा साहेब ने बाकायदा अपनी किताब में लिखा है.’

‘राजनीति की बिसात पर गोमांस’ शीर्षक से अपने लेख में प्रो. राम पुनियानी लिखते हैं, ‘भाजपा और उसके संगी-साथियों के दावों के विपरीत स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में एक बड़ी सभा में भाषण देते हुए कहा था, ‘आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्राचीनकाल में विशेष समारोहों में जो गोमांस नहीं खाता था उसे अच्छा हिंदू नहीं माना जाता था. कई मौकों पर उसके लिए यह आवश्यक था कि वह बैल की बलि चढ़ाए और उसे खाए’(शेक्सपियर क्लब, पेसेडीना, कैलीर्फोनिया में 2 फरवरी, 1900 को ‘बौद्ध भारत’ विषय पर बोलते हुए) ‘ब्राह्मणों सहित सभी वैदिक आर्य, मछली, मांस और यहां तक कि गोमांस भी खाते थे. विशिष्ट अतिथियों को सम्मान देने के लिए भोजन में गोमांस परोसा जाता था. यद्यपि वैदिक आर्य गोमांस खाते थे तथापि दूध देने वाली गायों का वध नहीं किया जाता था. गाय को ‘अघन्य’ (जिसे मारा नहीं जाएगा) कहा जाता था परंतु अतिथि के लिए जो शब्द प्रयुक्त होता था वह था ‘गोघ्न’ (जिसके लिए गाय को मारा जाता है). केवल बैलों, दूध न देने वाली गायों और बछड़ों को मारा जाता था. (द कल्चरल हेरिटेज ऑफ इंडिया खंड-1, प्रकाशक रामकृष्ण मिशन, कलकत्ता, कुन्हन राजा का आलेख वैदिक कल्चर, पृष्ठ 217)

 जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘बाबा साहेब ने बाकायदा लिखा है कि गाय को पवित्र बनाने और अछूत समस्या का आपस में संबंध है. पूरे वैदिक काल में ब्राह्मण मांस खाते थे. गाय और घोड़े का मांस खाया जाता था. लेकिन आगे जाकर बौद्धों और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष हुआ तो ब्राह्मणों ने अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए गोमांस खाना बंद कर दिया. तब से लेकर यह गाय की राजनीति चली आ रही है.’

शोधछात्र सुनील कहते हैं, ‘हिंदू धर्म का मूल चरित्र ही दलित विरोधी है जैसा कि धर्मशास्त्र का इतिहास लिखते हुए तोकारेव ने कहा था कि ऊपर के तीन ही वर्णों के देवता थे और पूजा करने का अधिकार सिर्फ ऊपर के तीन वर्णों को ही था. शूद्रों को इससे बाहर रखा जाता था. हिंदू धर्म का पहला मुकाबला बौद्ध धर्म से हुआ. दमित और प्रताड़ित शूद्र बहुत तेजी से बुद्ध के पीछे होने लगे, तब ब्राह्मण धर्म अर्थात हिंदू धर्म ने अवतारों की कल्पना करते हुए धर्मशास्त्र के नियमों में ढील देते हुए अछूत जातियों को कुछ धार्मिक अधिकार दिए. लेकिन आज तक मंदिर प्रवेश या सामाजिक भेदभाव के तमाम मामलों में दलितों का भयानक अत्याचार जारी है. दलित का जीवन पशुओं से बदतर तब भी था और आज भी है.’

सुनील पूरे टकराव को वर्चस्व की राजनीति का नतीजा मानते हुए कहते हैं, ‘गाय का मामला पूरी तरह राजनीतिक है. वर्ण व्यवस्था के प्रकर्म में भयानक रूप से बंटे हिंदू समाज में दलित बहुत साजिश के साथ शामिल किए गए तो भी उन्हें हाशिये पर रख दिया गया. जब बार-बार हिंदू समुदाय के शोषित जातियों को लगता है कि हिंदू समाज में हमारा कोई अस्तित्व नहीं है तो वे अन्य धर्मों की तरफ ताक-झांक करने लगते हैं. तो सभी को हिंदू समाज में बनाए रखने के लिए सवर्ण हिंदुओं ने एक साजिश रची कि किसी तरह इस्लाम के प्रभुत्व का डर पैदा कर इन असंतुष्ट शोषित जातियों को अपने साथ बनाए रखा जाए. इसके बाद शुरू हुआ मुसलमानों के खिलाफ नफरत और जहर का दौर जिसमें उन प्रतीकों को चुना गया जिसके प्रयोग को लेकर मुस्लिम समाज में कुछ नाराजगी हो, विरोध हो.’

इतिहासकार प्रो. डीएन झा कहते हैं, ‘गोरक्षा अभियान 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ. दयानंद सरस्वती ने गोरक्षा समिति की स्थापना की थी. तबसे गाय को राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. धीरे-धीरे यह बढ़ता गया है. गाय को लेकर बीच-बीच में समस्या होती रही है. 1966 में विनोबा भावे के नेतृत्व में संसद का घेराव हुआ था, जिसपर बहुत बवाल हुआ था. बाद में यह अभियान कम हो गया. इधर कुछ दिनों से इसने फिर जोर पकड़ा है. सवाल ये है कि गाय को बचाइएगा तो दूसरे मवेशियों को क्याें छोड़ दीजिएगा? दूसरे, गाय के मरने के बाद उसे उठाने का काम या उसके निपटान का काम कौन करेगा? क्या तोगड़िया जी हटाएंगे? उसके लिए अब इन्हाेंने लोगों को मारना शुरू किया है. चलिए आप गाय को बचा लीजिए. लेकिन उसके मरने के बाद उसका क्या होगा?’                          

मंदिर में प्रवेश न देने, मरी गाय उठाने के लिए दलितों को अछूत घोषित कर देने या उसी काम के लिए उन्हें ‘सजा’ देने का क्रम अपनी ऐतिहासिकता में बेहद भयानक रहा है. प्रसिद्ध साहित्यकार और चिंतक प्रो. तुलसीराम ने अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में दलित जीवन का यथार्थ जिस तरह लिखते हैं, उसे पढ़कर समझा जा सकता है कि भारतीय समाज में दलितों की क्या हालत रही है. वे लिखते हैं, ‘उस समय एक परंपरा के अनुसार गांव का कोई भी हरवाहा अपने मालिक जमींदार के मरे पशु की खाल निकालकर उसे बेचने से बचे धन को अपने पास रख लेता था. ऐसे चमड़ों की कीमत प्रायः बीस रुपये होती थी… जब हमारे घर की कलोरी गाय मरी तो छह आदमी काड़ी पर ढोते हुए मुर्दहिया पर ले गए थे. मुन्नर चाचा कहने लगे थे कि उस छुट्टी में मैं चमड़ा छुड़ाना धीरे-धीरे सीख जाऊं ताकि भविष्य में इस चर्मकला में पारंगत हो सकूं… मैंने वैसा ही किया. इसके बाद मैं अनेकों बार इस तरह की चामछुड़ाई के अवसाद से पीड़ित रहा…’

दलित बस्ती की कारुणिक कथाओं के क्रम में वे आगे लिखते हैं, ‘इन्हीं गिद्ध प्रकरणों के दौरान गांव के जोखू पांडे का एक बैल मर गया. मुर्दहिया पर सारे कर्मकांड संपन्न हुए. जोखू के हरवाहे द्वारा चमड़ा छुड़ाए जाने के बाद उसी के घर की एक रमौती नामक महिला जो मुर्दहिया पर घास छील रही थी, उससे नहीं रहा गया.

वह डांगर के लालचवश खुर्पा लेकर गिद्धों से भिड़ गई और मरे हुए बैल का कलेजा काटकर घास से भरी टोकरी में छिपाकर ले आई. मेरे साथ अनेक दलित बच्चे यह नजारा देख रहे थे. सभी चिल्लाने लगे: ‘रमौती घरे डांगर ले जाति हौ.’ यह खबर चाचा चौधरी तक पहुंच गई. दो दिन बाद पंचायत बुलाई गई. रमौती के परिवार को कुजाति घोषित कर दिया गया और उसका सामाजिक बहिष्कार हो गया. यह बड़ा प्रचंड बहिष्कार था. बिरादरी में शामिल होने के लिए उन्हें सूअर-भात की दावत देनी पड़ी जिससे रमौती का परिवार भारी कर्ज में डूब गया.’

प्राचीन भारतीय समाज में पशुधन लोगों की प्रमुख संपत्ति रहा है. भूमिहीन और मजदूर तबके के लिए यह जीविका और पोषण का एकमात्र साधन रहा है. मरे हुए जानवरों जैसे गाय, भैंसें और अन्य पालतू जानवरों से भी लोग आपना पेट पालते थे. भारतीय समाज की आर्थिकी में भी गाय और गोवंश की अहम भूमिका रही है. गाय के पवित्र घोषित हो जाने का फायदा जिसे भी हुआ हो, लेकिन इससे उन लोगों के पोषण और जीविका पर प्रहार हुआ जिनके लिए पेट भरने का एकमात्र साधन जानवर था. मरे हुए मवेशियों को उठाकर अपनी जीविका चलाने वाला दलित समाज अपने उसी पेशे के लिए अछूत घोषित हुआ और अब उसी के लिए उसे प्रताड़ित किया जाना न सिर्फ मानवाधिकार का मसला है, बल्कि एक बड़े समुदाय की पहचान और गरिमापूर्ण जीवन पर प्रहार है. अब सवाल है कि क्या दलितों का आंदोलन उनके लिए भारतीय समाज में नए कपाट खोलेगा?
(यह लेख तहलका हिंदी पत्रिका के सितंबर, 2016 के अंक में 'आपबीती' कॉलम में छप चुका है.)

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