गुरुवार, 15 सितंबर 2016

ऐसे होता है युवाओं का ‘टैलेंट हंट’

कृष्णकांत 
अपने गांव से 2003 में इलाहाबाद पहुंचा तो सोचा कि गाने और लिखने के अपने शौक को ही अपना पेशा बनाऊंगा. मेरे बड़े भाई पहले से वहां रहते थे. उनके सपोर्ट के बाद मैंने प्रयाग संगीत समिति में एडमिशन ले लिया और संगीत सीखने में लग गया. हालांकि, जब मेरे पिता जी को पता चला कि मैं संगीत सीख रहा हूं तो उनकी प्रतिक्रिया थी, ‘अब यही बचा है! पढ़ना-लिखना है नहीं, अब नाचना-गाना ही बचा है!’ इसके बावजूद मैंने संगीत सीखना जारी रखा.

लोगों की प्रतिक्रियाएं इतनी उत्साहजनक थीं कि मुझे लगता था कि मैं एक संपूर्ण कलाकार बन सकता हूं जो अच्छा संगीत रच सकता है, गाने लिख सकता है, साथ में गा भी सकता है. इस दौरान मैंने कई गाने लिखे और उनकी मौलिक धुन तैयार की. उन्हीं दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में एक सीनियर वसीम अकरम से मुलाकात हुई. एक दिन वसीम भाई ने अखबार में एक फिल्म बनाने वाली कंपनी का विज्ञापन देखा. उस विज्ञापन के मुताबिक कंपनी को स्क्रिप्ट राइटर, गीतकार, गायक, संगीतकार और एक्टर की बड़ी संख्या में जरूरत थी. कंपनी युवाओं को मौका देना चाहती थी. हम लोग उत्साहित हो गए. कंपनी ने इस ‘टैलेंट हंट’ के लिए प्रत्येक प्रतिभागी को 450 रुपये के साथ निश्चित तारीख को बुलाया था.

यह साल 2005 के दिसंबर की बात है जब इलाहाबाद में पढ़ने वाले छात्र को एक से डेढ़ हजार रुपये घर से मिलते थे. उन दिनों 450 रुपये की रकम बहुत बड़ी होती थी. सिविल लाइंस के एक होटल में प्रतिभागियों के चुनाव का कार्यक्रम रखा गया था. हम दोनों ने पैसे की जैसे-तैसे व्यवस्था की और वहां पहुंच गए. अपना रजिस्ट्रेशन कराया और अपनी बारी का इंतजार करने लगे.
करीब डेढ़ घंटे बाद मेरा नंबर आया. मुझे एक कमरे में ले जाया गया. कमरे की दीवार पर एक बड़ी-सी स्क्रीन लगी थी जिसमें चार चेहरे दिख रहे थे. स्क्रीन से आवाज आई, ‘आप क्या करेंगे?’ मैंने जवाब दिया, ‘मैं गाने लिखता हूं और गाता हूं.’ उन्होंने कहा, ‘अपना लिखा कोई गाना सुनाओ.’ मैंने अपना लिखा और कंपोज किया हुआ एक गाना उनको सुनाया. गाने का मुखड़ा और एक अंतरा खत्म होते ही स्क्रीन पर दिख रहे चार लोगों में से एक मोटा आदमी जोर से बोला, ‘ओके, वेलडन! हमने अपनी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी के लिए आपको गीतकार चुन लिया है. आप हमारे लिए गाने लिखेंगे.’ मैंने खुश होकर उन्हें थैंक यू बोला और उछलता हुआ बाहर आ गया. वसीम भाई को भी मेरी तरह गायक चुन लिया गया था. हमें बताया गया था कि वे हमें कॉल करेंगे. कुछ दिन तक हम दोनों के पांव जमीन पर नहीं थे.

असली खेला तो गुरु इसके बाद हुआ. एक महीना बीता लेकिन कॉल नहीं आई. अब हम लोग जमीन पर आने लगे थे. देखते-देखते दो महीने बीते. फिर तीन, चार, पांच महीने बीत गए. हम लोगों ने फोन पर संपर्क करना शुरू किया लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला. गर्मियों की छुट्टी में मैं इस ‘टैलेंट हंट’ कंपनी की खोज में लखनऊ गया. विज्ञापन में दिए पते पर पहुंचा तो पता चला कि कोई अरविंद गौड़ हैं जिन्होंने टैलेंट हंट के जरिए अपना सपना पूरा किया था. मैं अंतत: गौड़ साहब को खोजने में कामयाब हो गया. उन्होंने मुझे टाइम दिया और मिलने बुलाया. मिलते ही उन्होंने आश्वासन दिया कि काम चल रहा है. अभी हमने प्रेमचंद की कहानी पर एक फिल्म बनाई है. उसके बाद उस प्रोजेक्ट पर काम शुरू होगा. मेरी कल्पना ने फिर से उड़ान भरी और लगा कि अभी उम्मीद जिंदा है. उन्होंने मुझसे अपने कुछ और गाने वहां जमा करने को कहा जो कि मैंने कर दिए.

उसके बाद आज दस साल बीत गए हैं. उस तथाकथित कंपनी और उस  डायरेक्टर का कुछ अता-पता नहीं. वसीम भाई ने अपना गायक बनने का शौक एक भोजपुरी एलबम रिकॉर्ड करवाकर पूरा किया. हमने अपने गीत डायरी में बंद कर दिए, फिर अपनी पढ़ाई पूरी की और दोनों ही कलमघसीट पत्रकार बन गए. अगर उस कंपनी ने 500 उत्साहित बच्चों से 450 रुपये वसूले होंगे तो कुल मिलाकर सवा दो लाख का जुगाड़ हो गया होगा. पत्रकार बनने के बाद अब युवाओं को मूर्ख बनाने के इस तरह के तमाम किस्से हम सुनते रहते हैं और हर बार हमारे साथ हुई उस सिनेमाई ठगी पर हंसी भी आती है और गुस्सा भी.
(यह लेख तहलका हिंदी पत्रिका के सितंबर, 2016 के अंक में 'आपबीती' कॉलम में छप चुका है.)


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