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कैराना के मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है : हुकुम सिंह

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भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने कुछ दिन पहले 346 हिंदू परिवारों की सूची जारी करते हुए दावा किया कि कैराना से
हिंदुओं का पलायन हो रहा है और इसे कश्मीर बनाने की कोशिश की जा रही है. उनका दावा था कि यहां हिंदुओं को धमकाया जा रहा है, जिससे हिंदू परिवार बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं. हुकुम सिंह और भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए. हुकुम सिंह का कहना था कि उन्होंने कैराना से पलायन करने वाले हर घर का सत्यापन कराया है, जबकि बाद में मीडिया रिपोर्टों में उनकी सूची पर सवाल उठाए गए. हालांकि, इस मसले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी राज्य सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है. दूसरी तरफ भाजपा ने अपना जांच दल भी भेज दिया तो भाजपा नेता संगीत सोम ने भी निर्भय यात्रा आयोजित कर डाली. भाजपा इस मसले का चुनावी लाभ लेने की पूरी तैयारी में है, लेकिन अब हुकुम सिंह कह रहे हैं कि यह मसला सांप्रदायिक नहीं बल्कि राजनीतिक है. दूसरी ओर, जिला प्रशासन ने अपनी जांच में हुकुम सिंह और भाजपा पर गंभीर सवाल उठाए हैं. हुकुम सिंह से इस बारे में बातचीत.


आपने अपने क्षेत्र कैराना के बारे में यह मसला उठाया था कि …

कसाई की दुकान पर बकरा नहीं पाला जा सकता : मुनव्वर राना

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शायरी को महबूबा से मां की मुहब्बत तक ले आने वाले शायर मुनव्वर राना के तमाम परिजन बंटवारे के दौरान पाकिस्तान चले गए थे. उस बात का जिक्र आते ही वे भावुक हो जाते हैं. उनका ख्वाब है कि हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में कभी जंग न हो. जब उन पर हमले हों तो तीनों मिलकर लड़ें. वे तीनों देशों की एकता के हामी हैं, लेकिन तीनों देशों के एकीकरण को नामुमकिन मानते हैं. उनसे मेरी बातचीत का कुछ अंश-


भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश- तीनों मुल्कों के एकीकरण की बात बार-बार उठती है. एकीकरण पर आपका क्या नजरिया है?

देखिए, मुल्क भी घर की तरह होते हैं. जब घर में एक बार दीवारें उठ जाती हैं तो टूटती नहीं हैं. इसलिए ये नामुमकिन है कि तीनों मुल्क एक हो जाएंगे. यह बिल्कुल वैसा है कि तीनों भाई फिर से आकर एक घर में रहने लगें. अगर तीनों भाइयों में मोहब्बत बरकरार रहती है तो यह भी वैसे ही है जैसे तीनों एक जगह रहते हैं. तो ये ख्वाब देखने से कोई फायदा ही नहीं है क्योंकि रास्ते में इतनी अड़चनें हैं कि ये मुमकिन ही नहीं है. ये तो बिल्कुल वैसा ही है कि सूरज पूरब की जगह पश्चिम से निकल आए. लेकिन जरूरत इस बात की है कि जब ये …

मोदी जी के पीएम बनने के बाद संघ के लोगों को चर्बी चढ़ गई है : जिग्नेश मेवाणी

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गुजरात में मरी गाय की चमड़ी उतार रहे कुछ दलित युवकों की पिटाई के बाद हजारों की संख्या में दलित
समुदाय के लोग सड़कों पर उतरे. इस उभार के नेतृत्व के केंद्र में जो एक नाम उभर कर आया वह है जिग्नेश मेवाणी. युवकों पर हुए अत्याचार के बाद जिग्नेश सक्रिय हुए और दलित समुदाय के लोगों को इस बात की घोषणा के लिए राजी किया कि अब वे न तो मैला उठाएंगे, न ही मरे हुए पशुओं की चमड़ी उतारने का काम करेंगे. 1980 में मेहसाणा में जन्मे जिग्नेश के पिता क्लर्क थे. अंग्रेजी साहित्य से ग्रैजुएट जिग्नेश पत्रकार भी रह चुके हैं. वे विभिन्न मोर्चों पर सामाजिक कार्यों से जुड़े रहकर दलितों, मजदूरों व किसानों के मुद्दे उठाते रहे हैं. फिलहाल वे वकालत कर रहे हैं. वे गुजरात में आम आदमी पार्टी से भी जुड़े थे, लेकिन 21 अगस्त को उन्होंने इस्तीफा दे दिया. जिग्नेश एक तरफ तो कह रहे हैं कि उनका आंदोलन पूरी तरह सामाजिक है और वे पार्टी नहीं बनाएंगे, लेकिन वे यह भी बयान दे चुके हैं, ‘200 प्रतिशत मैं राजनीति में आऊंगा. लेकिन मैं आम आदमी पार्टी से इसलिए जुड़ा हूं ताकि दलित समुदाय के लिए जो करना चाहता हूं वह सब कर सकूं.’ दलित आंदोलन के…

गणतंत्र का गुड़गोबर

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गाय के नाम पर हो रही राजनीति से समाज की अखंडता पर संकट आ गया है. देश में दलित से लेकर मुसलमानों को गोरक्षा के नाम पर हो रही गुंडागर्दी का सामना करना पड़ रहा है. गोरक्षा के नाम पर उपद्रव इतना ज्यादा हो गया है कि इसे रोकने के लिए प्रधानमंत्री को अपील करनी पड़ रही है.

कृष्णकांत 

भोलेपन के पर्याय के रूप में मशहूर बेचारी गाय को पता भी नहीं होगा कि देश की सड़कों पर उसकी सुरक्षा के बहाने उपद्रव हो रहे हैं, तो भारतीय संसद में बहस में भी हुई. गाय को यह भी नहीं पता होगा कि उसका नाम अब सियासी गलियारे में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा जा चुका है. सियासत दो खेमों में बंट चुकी है. शहर-दर-शहर कचरा चबाती और गोशालाओं में हजारों की संख्या में मर चुकी गायों को यह भी नहीं मालूम होगा कि उनके नाम पर तमाम बेरोजगार राजनीतिक कार्यकर्ताओं की चांदी हो गई है. पार्टियों और संगठनों के थिंक टैंक गाय को अपने-अपने हिसाब से दुहने में लगे हैं तो ऐसे भी वैज्ञानिक अवतरित हो गए हैं जो गाय के मूत्र में सोना और गोबर में परमाणुरोधी तत्व खोज रहे हैं.

तमाम गुट, जिनको लगता है कि गाय की रक्षा करके वे हिंदू धर्म की रक्षा कर रहे हैं, …

ऐसे होता है युवाओं का ‘टैलेंट हंट’

कृष्णकांत 
अपने गांव से 2003 में इलाहाबाद पहुंचा तो सोचा कि गाने और लिखने के अपने शौक को ही अपना पेशा बनाऊंगा. मेरे बड़े भाई पहले से वहां रहते थे. उनके सपोर्ट के बाद मैंने प्रयाग संगीत समिति में एडमिशन ले लिया और संगीत सीखने में लग गया. हालांकि, जब मेरे पिता जी को पता चला कि मैं संगीत सीख रहा हूं तो उनकी प्रतिक्रिया थी, ‘अब यही बचा है! पढ़ना-लिखना है नहीं, अब नाचना-गाना ही बचा है!’ इसके बावजूद मैंने संगीत सीखना जारी रखा.

लोगों की प्रतिक्रियाएं इतनी उत्साहजनक थीं कि मुझे लगता था कि मैं एक संपूर्ण कलाकार बन सकता हूं जो अच्छा संगीत रच सकता है, गाने लिख सकता है, साथ में गा भी सकता है. इस दौरान मैंने कई गाने लिखे और उनकी मौलिक धुन तैयार की. उन्हीं दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में एक सीनियर वसीम अकरम से मुलाकात हुई. एक दिन वसीम भाई ने अखबार में एक फिल्म बनाने वाली कंपनी का विज्ञापन देखा. उस विज्ञापन के मुताबिक कंपनी को स्क्रिप्ट राइटर, गीतकार, गायक, संगीतकार और एक्टर की बड़ी संख्या में जरूरत थी. कंपनी युवाओं को मौका देना चाहती थी. हम लोग उत्साहित हो गए. कंपनी ने इस ‘टैलेंट…