शनिवार, 30 जुलाई 2016

नामवर सिंह का 'बूढ़ा बैल' हो जाना

ठाकुर नामवर सिंह वाला कार्यक्रम देखा. ठाकुर राजनाथ सिंह, महेश शर्मा और तमाम सत्ताधीश दिग्गजों की मौजूदगी
उन्होंने वादा किया है कि नामवर जी जैसे 'बूढ़े बैलों' का वे संरक्षण करेंगे. महेश शर्मा जी सही हैं. वे इंसानों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं. वे बूढ़ी जवान गायों और बैलों के संरक्षण के लिए ही प्रतिबद्ध हैं. नामवर जी वहां से संरक्षण पाने के आकांक्षी हैं तो उन्हें बूढ़ा बैल बनना पड़ेगा.
मुझे याद आया कि बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक अजित सरकार की हत्या के आरोप में सज़ा काट रहे कुख्यात बाहुबली पप्पू यादव जेल से छूटे तो जेल में लिखी गई अपनी जीवनी द्रोहकाल का पथिक का लोकार्पण कराया. किताब का विमोचन किया था वामपंथी पुरोधा नामवर सिंह ने. उन्होंने स़िर्फ किताब का विमोचन ही नहीं किया था, बल्कि पप्पू यादव की तारीफ़ में कसीदे भी प़ढे. नामवर सिंह ने पप्पू यादव को सरदार पटेल से भी बेहतर नेता बताते हुए कहा कि राजनीति में बहुत कम लोग पढ़ते-लिखते हैं. सरदार पटेल तक आत्मकथा नहीं लिख पाए. पप्पू यादव ने अपनी आत्मकथा में साहस का परिचय दिया है.
उस समय उदय प्रकाश जी ने टिप्पणी की थी कि ‘वक्त बदल गया है. खेत से हल और काग़ज़ से कलम की बेदख़ली और बंदूक के शासन का दौर है यह. जब एंटोनिन अर्ताउ ने कहा था कि अब बर्बरता के रंगमंच ने पुराने, शब्द और लेखक के ज़माने वाले शिथिल थिएटर को विस्थापित कर दिया है. शब्द और शब्दकार दोनों अब मर चुके हैं तो वह इसी बदलाव की ओर इशारा कर रहे थे. 1998 में अजित सरकार की हत्या या चंद्रशेखर की हत्या इस ‘थियेटर आफ़ क्रुएलिटी ’ के जन्म और आधिपत्य का संकेत था. जहां तक नामवर सिंह जी की बात है तो उनका एक ‘कोडेड फ़ार्मूला’ मैं आपको बताता हूं, जिसे जानते सब हैं लेकिन कोई कहता नहीं. रामबाण फ़ार्मूला यह है कि जब लेखक और प्रकाशक के बीच विवाद हो, तो प्रकाशक के साथ रहो. जब प्रशासन और स्टुडेंट के बीच विवाद हो, तो प्रशासन का साथ दो. जब अफ़सर और मातहत की बात हो, तो हमेशा अफ़सर के पक्ष में रहो. जब जातिवाद और उसके विरोध के बीच झगड़े हों, तो सवर्णवाद का साथ दो. जब उत्कृष्टता और मीडियॉकरी के बीच चुनना हो, तो दूसरे को ही चुनो. जब बंदूक और कलम के बीच बहस चले, तो बंदूक के साथ रहो. सामंतवाद और लोमड़ चतुराई यही सीख देते हैं.’
उम्र के अंतिम पड़ाव पर आकर अपने आत्मसम्मान को 'बूढ़ा बैल' बना देने नामवर सिंह जी जाने क्या सोच रहे होंगे, परंतु मैं तो यही चाहता हूं कि ऐसा स्खलन और ऐसी वैचारिकता निरीहता किसी को नसीब न हो.
पिछले साल एक पद लिखा था:
में मंत्रोच्चार के बीच ऐसा लगा जैसे हिंदी प्रगतिशीलता का पिंडदान हो रहा है. ये वही महेश शर्मा जी हैं जिनको गोमांस खाने के शक में पीटकर मारने वाले लोग 'मासूम बच्चे' दिखे थे. संस्कृति मंत्री जी ने बहुत अच्छा प्रवचन दिया. एकदम विराट हिंदू टाइप. उन्होंने नसीहत भी दी कि अभिव्यक्ति की आजादी को नियंत्रित नदी की तरह 'दो पाटों के बीच' ही बहना चाहिए तभी उसे प्रणाम किया जाएगा.
संतन को बचा सीकरी सो काम
आवत जात पनहिया चाटैं दीन्ह बिसारि अवाम
मसि कागद को झाड़ू सम लेकर घूमैं बदनाम
पूछत फिरत शाह की कोठरि कैसे पहुंचैं धाम
पूंछ हिलावत हैं ललचहिया मिलै छटाक छदाम
हत्याओं पर जश्न मनेगा खूब चलेंगे जाम
उस गिरोह से बाहर करियो इस निकृष्ट का नाम

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