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नामवर सिंह का 'बूढ़ा बैल' हो जाना

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ठाकुर नामवर सिंह वाला कार्यक्रम देखा. ठाकुर राजनाथ सिंह, महेश शर्मा और तमाम सत्ताधीश दिग्गजों की मौजूदगी
उन्होंने वादा किया है कि नामवर जी जैसे 'बूढ़े बैलों' का वे संरक्षण करेंगे. महेश शर्मा जी सही हैं. वे इंसानों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं. वे बूढ़ी जवान गायों और बैलों के संरक्षण के लिए ही प्रतिबद्ध हैं. नामवर जी वहां से संरक्षण पाने के आकांक्षी हैं तो उन्हें बूढ़ा बैल बनना पड़ेगा.
मुझे याद आया कि बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक अजित सरकार की हत्या के आरोप में सज़ा काट रहे कुख्यात बाहुबली पप्पू यादव जेल से छूटे तो जेल में लिखी गई अपनी जीवनी द्रोहकाल का पथिक का लोकार्पण कराया. किताब का विमोचन किया था वामपंथी पुरोधा नामवर सिंह ने. उन्होंने स़िर्फ किताब का विमोचन ही नहीं किया था, बल्कि पप्पू यादव की तारीफ़ में कसीदे भी प़ढे. नामवर सिंह ने पप्पू यादव को सरदार पटेल से भी बेहतर नेता बताते हुए कहा कि राजनीति में बहुत कम लोग पढ़ते-लिखते हैं. सरदार पटेल तक आत्मकथा नहीं लिख पाए. पप्पू यादव ने अपनी आत्मकथा में साहस का परिचय दिया है.
उस समय उदय प्रकाश जी ने टिप्पणी की थी कि…

सोशल मीडिया : यौन उत्पीड़न का नया अड्डा

कृष्णकांत
सोशल मीडिया उन महिलाओं के लिए भी बेहद डरावनी जगह है जो समाज में सशक्त मानी जाती हैं. अपनी बात रखने के एवज में उन्हें गंदी गालियों से नवाजा जाता है. साथ ही मार देने और बलात्कार कर देने तक की धमकियां दी जाती हैं.
सोशल मीडिया पर अक्सर किसी महिला पत्रकार या नेता को विरोधस्वरूप हजारों की संख्या में गालियां दी जाती हैं. बरखा दत्त, सागरिका घोष, राना अयूब, कविता कृष्णन, अलका लांबा, स्मृति ईरानी, अंगूरलता डेका, यशोदा बेन आदि महिलाएं इस अभद्रता की भुक्तभोगी हैं. जो लोग किसी की बात-विचार या व्यक्तित्व को नापसंद करते हैं तो वे लोग इसका विरोध गंदी गालियों या चरित्र-हनन के रूप में करते हैं. हाल ही में बरखा दत्त के नाम के साथ गाली जोड़कर ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड कराया गया और यह पहली बार नहीं था.
केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह के बयान से चर्चा में आया ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द का किसी भी महिला पत्रकार के लिए इस्तेमाल आम है. सागरिका घोष और उनकी बेटी का बलात्कार करने की धमकी दी गई. हाल ही में फेसबुक पर कविता कृष्णन ने कथित ‘फ्री सेक्स’ के बारे में विचार रखे तो उनके खिलाफ एक वरिष्ठ पत्रकार ने अभद्र ट…

दिल्ली का कश्मीर की जनता से कोई संवाद ही नहीं हो रहा: दिलीप पडगांवकर

कश्मीर में 2010 में जैसे हालात बने थे, अब परिस्थिति उससे ज्यादा कठिन और ज्यादा विकट हो गई है. ऐसा इसलिए हुआ है कि 2008-09 और 10 में जो घटनाएं हुई थीं, उससे न मनमोहन सरकार ने, न ही मोदी सरकार ने कोई सबक सीखा. सितंबर, 2010 में हमारी वार्ताकार समिति ने जब काम शुरू किया था, हमें एक साल के अंदर रिपोर्ट देनी थी. हम जम्मू और कश्मीर के हर जिले में गए थे. हम करीब 700 डेलीगेशन से मिलेे यानी छह हजार से ज्यादा लोग. सिर्फ हुर्रियत से हमारी बात नहीं हुई. जहां-जहां हम जाते थे, उसकी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को देते थे. पुलिस अफसरों और सीआरपीएफ के लोगों से भी हमारी बातचीत हुई थी.

इसके बाद हमने सबसे पहली जो रिपोर्ट दी थी, उसमें कहा था कि जन प्रदर्शन को रोकने के लिए न अधिकारियों की सुनवाई का तरीका सही है, न प्रदर्शन रोकने की उनकी कार्रवाई पर्याप्त है, इसके लिए कुछ कीजिए. उसके बाद थोड़ी-बहुत कार्रवाई हुई थी, लेकिन जिस तरह से अब (बुरहान वानी प्रकरण के बाद) लोग मारे गए हैं, मुझे नहीं लगता कि वहां उस सिफारिश पर अमल हुआ है. शुरुआत यहां से है कि कैसे आप जन प्रदर्शन को हैंडल करते हैं. दूसरे, जन प्रदर्शन में भी अब…