रविवार, 12 जून 2016

चमचे

चमचे न हों अगर शाह के तो शाही बेजान
चमचागिरी चमक जाए तो गधा होत बलवान
चमचों ने मिलजुल कागज के महल खड़े करवाए
चमचों ने ही बड़े-बड़ों के तख्त ताज उड़वाए
चमचों से है भरा हुआ इस भारत का इतिहास
चमचे न हों अगर तो हर दिन कौन करे बकवास
चमचे कुशल, छुपा लेते हैं राजा की करतूतें
मौका पाएं तो चलवा दें गली-गली बंदूकें
राजा पहने सूट नौलखा रानी पहने हार
चमचों का जयकारा गूंजा, बहुत खूब सरकार
होड़ लगी चमचा बनने की, बड़े-बड़े टकसाल
घूम रहे हैं शाह गली में, धरे रूप विकराल
ले चटकारा बड़े चाव से, धर कांधे पर गमछा
चंदू चाचा चमक के बोले हम राजा कै चमचा
चमचों का आयोग बना चमचों का बना संगठन
चेहरा दिखता है आका का, आगे रक्खें दर्पन
भले सांच पर आंच लगे या बजर परे मिट जाए
कहां सांच की पैरोकारी, खोपड़ी कौन खपाए
चमचागिरी दिलाती है जब पद, पैसा, सम्मान
उच्च सुरक्षा भी मिलती है, बख्तरबंद जवान
राष्ट्रवाद की घुट्टी पीकर कलाकार मुस्काया
कला बेच कर राजभवन में ठुमका एक लगाया
कलमकार बोला अचार डालूं क्या आजादी का?
मुझे मुनाफा मिलता है गैरत की बर्बादी का!
पत्रकार ने पत्र बेचकर ले ली चकमक कार
पीठ ठोंक कर राजा बोला, पूंछ हिलाओ यार
उसके बाद हुआ खेला, चहुं धरम करम गरमाये
चमचों ने, चंगू-मंगू ने, मिल दंगे करवाये
मंत्राणी को पत्र भेजकर कहिन वजीरे-आला
जहां-जहां अध्ययन होता हो, अब जड़वा दो ताला
कैम्पसों में बंद किताबें अपनी किस्मत रोएं
नेता और नेतानी मिलकर घर-घर नफरत बोएं
चमचों ने ताली मारी, मुंह बाया, भरा ठहाका
तुम भी आओ साथ हमारे, मजा करोगे काका

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