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चमचे

चमचे न हों अगर शाह के तो शाही बेजान
चमचागिरी चमक जाए तो गधा होत बलवान
चमचों ने मिलजुल कागज के महल खड़े करवाए
चमचों ने ही बड़े-बड़ों के तख्त ताज उड़वाए
चमचों से है भरा हुआ इस भारत का इतिहास
चमचे न हों अगर तो हर दिन कौन करे बकवास
चमचे कुशल, छुपा लेते हैं राजा की करतूतें
मौका पाएं तो चलवा दें गली-गली बंदूकें
राजा पहने सूट नौलखा रानी पहने हार
चमचों का जयकारा गूंजा, बहुत खूब सरकार
होड़ लगी चमचा बनने की, बड़े-बड़े टकसाल
घूम रहे हैं शाह गली में, धरे रूप विकराल
ले चटकारा बड़े चाव से, धर कांधे पर गमछा
चंदू चाचा चमक के बोले हम राजा कै चमचा
चमचों का आयोग बना चमचों का बना संगठन
चेहरा दिखता है आका का, आगे रक्खें दर्पन
भले सांच पर आंच लगे या बजर परे मिट जाए
कहां सांच की पैरोकारी, खोपड़ी कौन खपाए
चमचागिरी दिलाती है जब पद, पैसा, सम्मान
उच्च सुरक्षा भी मिलती है, बख्तरबंद जवान
राष्ट्रवाद की घुट्टी पीकर कलाकार मुस्काया
कला बेच कर राजभवन में ठुमका एक लगाया
कलमकार बोला अचार डालूं क्या आजादी का?
मुझे मुनाफा मिलता है गैरत की बर्बादी का!
पत्रकार ने पत्र बेचकर ले ली चकमक कार
पीठ ठोंक कर राजा बोला, पूंछ हिलाओ…

हिंदुओं के पलायन व हत्या की हुकूम सिंह की सूची फर्जी . रिहाई मंच

ढाई दशक पहले मारे गए लोगों को डाल दिया सूची मेंए हत्यारोपी अधिकतर हिंदू ही
भाजपा हिंदुओं पर उत्पीड़न का माहौल बनाकार कर रही है दंगे की तैयारी
शिवसेना के सांसदों की तरह यूपी पुलिस द्वारा रोजेदार का उत्पीड़न शर्मनाक . रिहाई मंच 

लखनऊ 11 जून 2016। रिहाई मंच ने भाजपा सांसद हुकुम सिंह द्वारा कैराना के 21 हिंदुओं की हत्याओं और 241 हिंदू परिवारों के पलायन की सूची को फर्जी करार देते हुए भगवा गिरोह द्वारा फिर से पश्चिमी यूपी को सांप्रदायिकता की आग में झोकने की साजिश करार दिया है। मंच ने गोरखपुर के रोजदार मुस्लिम व्यक्ति की पुलिस द्वारा बेरहमी से पिटाई व पेशाब पिलाने की धमकी को अखिलेश यादव की सांप्रदायिक पुलिस के चेहरे का ताजा उदाहरण बताया है।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के महासचिव राजीव यादव ने कहा कि मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी हुकुम सिंह ने जिन 21 हिंदुओं की हत्याओं की सूची जारी की है उनमें से एक भी सांप्रदायिक हिंसा या द्वेष के कारण नहीं मारे गए हैं और उनमें से कईयों की तो ढाई दशक पहले हत्याएं हुई थीं। उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी द्वारा इस सूची की की गई तथ्…

कैराना में फिर से हो रहा है षडयंत्र

मुजफ्फरनगर में जिस तरह एक वीडियो में हिंदू पीट कर मारे गए थे, बाद में जांच आयोग ने बताया कि वह वीडियो कराची का था. वो कारनामा संगीत सोम का था. उसी तरह संगीत सोम के राजनीतिक बिरादर हुकुम सिंह बता रहे हैं कि कैराना में हिंदू पलायन कर गए. कुछ विराट हिंदू लोग कह रहे हैं कि वहां कश्मीर बन गया है.
बताया जा रहा है कि दबंगों की दबंगई और उगाही के डर से लोग गांव छोड़ रहे हैं. अब यह कोई नहीं पूछ रहा है कि अगर इलाके में उगाही या रंगदारी हो रही है, जिसके डर से लोग पलायन कर रहे हैं तो प्रशासन क्या कर रहा है? गैंगेस्टर रंगदारी वसूल रहे हैं तो पुलिस और सांसद हुकुम सिंह क्या कर रहे हैं? गुंडों और रंगदारों के प्रति नरम कौन है? किसी सरकार और प्रशासन के रहते हुए रंगदार कैसे सक्रिय हैं? अगर इलाके में रंगदार और अपराधी सक्रिय हैं तो प्रशासन जवाबदेह है या मुस्लिम समुदाय जवाबदेह है? कितने रंगदार और अपराधी गिरफ्तार किए गए? यूपी में कोई सरकार है कि नहीं? कोई यूपी सरकार पर सवाल क्यों नहीं कर रहा है? सोशल मीडिया के वीर बालक लोग भी नहीं. यदि दिल्ली या मुंबई में कोई गैंगेस्टर लोगों को परेशान करता है तो उसके धार्मि…

पिछले 10-15 साल में एक तरह के अनवरत गुस्से से भरे, सतत रूप से क्रुद्ध समाज की रचना हुई है : पुरुषोत्तम अग्रवाल

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आलोचक के तौर पर ख्यात पुरुषोत्तम अग्रवाल कवि भी हैं और कथाकार भी. कबीर पर लिखी उनकी किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की’ आलोचना के क्षेत्र में मील का पत्थर है. वे लगातार कविताएं लिखते हैं पर कविरूप में बहुत कम ही सामने आते हैं. उनकी कई कहानियां समय-समय पर प्रकाशित हुई हैं. कुछ समय पहले उनकी लिखी एक कहानी ‘नाकोहस’ ने खासी चर्चा और प्रशंसा बटोरी. कहानी का दायरा इतना व्यापक था कि बाद में उन्होंने इसे उपन्यास का रूप दिया. पुरुषोत्तम अग्रवाल से बातचीत.
आपके उपन्यास नाकोहस (नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स) की खूब चर्चा हुई. मौजूदा परिवेश में बात कहते ही आहत होती भावनाओं से व्याप्त डर और अराजक माहौल के चलते उपन्यास शायद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आपका क्या अनुभव रहा? यह सही है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के चलते उपन्यास को उसी संदर्भ में पढ़ा गया, लेकिन उसमें और भी बहुत चीजें थीं जिस पर लोगों का ध्यान कम गया. उपन्यास में प्रेम है, जीवन है, अंतर्विरोध है तो दुख और भय भी है. 
उपन्यास बुद्धिजीवी समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं पर भी चुटकियां लेता है. बुद्धिजीवी वर्ग का अंतर्विरोध बार-बार उसमें सामने आया ह…