शुक्रवार, 27 मई 2016

धर्मनिरपेक्ष भारत के नायक: जवाहरलाल नेहरू

मैं जवाहर लाल नेहरू के देहांत के 22 साल बाद पैदा हुआ. जाहिर तब तक उनका युग समाप्त हो चुका था. जब मैं बच्चा ​था, उस समय भारतीय राजनीति में मंडल के काउंटर में कमंडल आ गया था और भारतीय राजनीति खून—खराबा करते हुए मंदिर बनवाने दौड़ पड़ी थी. जब मैं पढ़ने लगा तब तब गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, भगत सिंह के बारे में जाना, उनका लिखा पढ़ा और उनके बारे में पढ़ा. अब सोचता हूं काश उस युग में मैं भी पैदा हुआ होता, जिनकी खींची लकीरें अबतक की सबसे बढ़ी लकीरें हैं. यह लेख दो साल पहले लिखा था.

 
भारतीय इतिहासकारों ने जवाहरलाल नेहरू का मूल्यांकन करते समय उन्हें आधुनिक भारत का शिल्पी कहा है. नेहरू की भूमिका को लेकर तमाम विवादों के बावजूद उनके बारे में यह कहना कहीं से भी अतिशयोक्ति नहीं है. वे बीसवीं सदी के भारत के अग्रणी जनवादी, मानवीय मूल्यों को तरजीह देने वाले और महान द्रष्टा थे. अपने समय में नेहरू नागरिक स्वतंत्रताओं के जबर्दस्त हिमायती थे और इसे उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे, जितना की आर्थिक समानता या समाजवाद को. हिंदुस्तान का निर्माण इस विचारधारा की बुनियाद पर टिका है कि आधुनिक हिंदुस्तान अनेक धर्मों, जातियों और संप्रदायों के बुनियादी अधिकार सुनिश्चित करता है, हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र नहीं हैं. नेहरू इस विचार के अग्रणी लोगों में से थे, जिनके प्रयास से हिंदुस्तान एक उदार और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में स्थापित हो सका. वे प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान, आत्मा की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, तार्किकता, मानवता आदि के न सिर्फ हिमायती थे, बल्कि इसके लिए संघर्ष भी किया. अपने व्यक्तित्व में नेहरू बेहद उदार दृष्टिकोण रखते थे, जिसे उन्होंने भारतीय जनमानस में उतारने की कोशिश की. 1954 में उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों को लिखा—'यदि भारत को सचमुच वैसा महान बनाना है जैसा कि हम सब लोग चाहते हैं तो उसे न तो अंदर से और न ही बाहर से अलग—थलग होना चाहिए. उसे उन सभी चीजों का त्याग करना पड़ेगा जो उनकी आत्मा का चिंतन या सामाजिक जीवन के विकास में बाधक बन सकती हैं.'
नेहरू के धुर आलोचक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे महान लोकतांत्रिक मूल्यों वाले नेता थे। नेहरू ने तमाम मुश्किलें उठाकर धर्मनिरपेक्ष ढांचे की नींव रखी और उसकी पूरी शक्ति से हिफाजत भी की। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने संसद में अपनी आलोचना करने वालों की भी वो पीठ थपथपाया करते थे। नेहरू एक समतावादी, न्यायोचित और जनवादी समाज—समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे. नागरिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता नेहरू के उच्च राजनीतिक मूल्यों में सर्वोपरि रहे. गांधी और मार्क्स के विचारों के उनपर व्यापक असर था और इन विचारों के अनुरूप उन्होंने एक समाजवादी राष्ट्र की स्थापना के लिए आजीवन कोशिश करते रहे.
नागरिक स्वतंत्रताओं के हिमायती नेहरू ने मार्च 1940 में लिखा—'प्रेस की आजादी का मतलब यह नहीं होता कि जो चीजें हम छपी हुई देखना चाहें, सिर्फ उन्हीं की अनुमति दें, इस तरह की आजादी से तो कोई अत्याचारी भी सहमत हो जाएगा. नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रेस की आजादी का मतलब है कि हम जो चीज न चाहें उनकी भी अनुमति दें, अपनी आलोचना बर्दाश्त करें.' नेहरू की ख्याति एक ऐसे नेता के रूप में है जो तीखी आलोचनाओं का भी सम्मान करने की हिमायत करते थे.
कराची कांग्रेस का 1931 में मौलिक अधिकारों पर पारित प्रस्ताव नेहरू ने ही तैयार किया था उसमें अभिव्यक्ति तथा प्रेस के द्वारा अपनी राय व्यक्त करने और संगठन बनाने के अधिकार सुनिश्चित किए गए.उन्हीं के प्रयासों से 1936 में इंडियन सिविल लिबर्टीज यूनियन की स्थापना हुई. यह एक गैर—दलीय असांप्रदायिक संगठन था जिसका मकसद नागरिक अधिकारों पर होने वाले हमलों के खिलाफ जनमत तैयार करना था. इस संगठन की स्थापना के अवसर पर नेहरू ने कहा था—'जब नागरिक अधिकारों का दमन होता है तो राष्ट्र की तेजस्विता समाप्त हो जाती है और वह कोई भी ठोस काम करने लायक नहीं रह जाता.' भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने धीरे—धीरे लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की एक ऐसी विचारधारा एवं संस्कृति विकसित करने में सफलता प्राप्त की.  असहमति के प्रति सम्मान भाव, अभिव्यक्ति की आजादी, बहुमत के शासन का सिद्धांत और अल्पसंख्यक मतों के बने रहने के अधिकार की मान्यता जिसका आधार बने. इसमें नेहरू का उल्लेखनीय योगदान रहा कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा वाले लोकतंत्र की सहमति बन सकी. गांधी जी भी नागरिकों के अधिकारों के प्रति पूर्णतया कटिबद्ध थे जो आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. गांधी जी ने 1922 के यंग इंडिया में लिखा था—'हम अपने लक्ष्य की तरफ एक कदम भी बढ़ सकें, इससे पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति ओर संगठन के अधिकार को हमें हासिल करना चाहिए. हमें इन अधिकारों की रक्षा जान देकर भी करनी चाहिए.' इन नायाब मूल्यों ने भारत को उदार लोकतंत्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका अदा की.
इतिहासकार विपिन चंद्र अपनी किताब 'भारत का स्वतंत्रता संघर्ष' में लिखते हैं कि 'समाजवादी भारत के विजन को लोकप्रिय बनाने में जवाहरलाल नेहरू ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.उनका कहना था कि राजनीतिक आजादी जनता की आर्थिक मुक्ति के बिना बेकार है. 1930 के पूरे दशक में वे तत्कालीन राष्ट्रवादी विचारधारा की अपर्याप्तता की ओर संकेत करते रहे और उसपर बुर्जुआ विचारों के वर्चस्व की आलोचना करते रहे. उनका जोर इस बात पर था राष्ट्रीय आंदोलन में एक नई, समाजवादी—बुनियादी रूप से मार्क्सवादी—विचारधारा को प्रमुख स्थान दिया जाए, ताकि लोग अपनी सामाजिक स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन कर सकें और कांग्रेस को समाजवादी विचारधारा का वाहक बना सकें. इस मामले में 30 का दशक काफी अनुकूल साबित हुआ.'
नेहरू जिस विचारधारा का नेतृत्व कर रहे थे वह जनवाद, कानून का शासन, व्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान, सामाजिक समता, बुद्धिपरकता और नैतिकता पर टिका हुआ था.  उन्होंने आजीवन एकीकृत धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के लिए संघर्ष किया, जहां पर हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का मूलभूत अधिकार प्राप्त हो. यह नेहरू ही थे, जिन्होंने हिंदुत्ववादी ताकतों को कभी सर नहीं उठाने दिया और धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्र के विचार को मजबूती से आगे बढ़ाया. कहते हैं कि एक बार वह दिल्ली में मुसलमानों के इलाके की ओर बढ़ते तलवार लपलपाते सिखों के एक जुलूस के आगे तनकर खड़े हो गए थे और उन्हें ऐसी डांट लगाई कि सभी ने हथियार फेंक दिए।
गांधीजी ने जो स्वराज, गांवों और आखिरी आदमी के विकास की बात की, नेहरू ने उसे आगे बढ़ाया। उन्होंने इस बात को समझा कि आम आदमी के बिना स्वाधीनता की बात अधूरी है। इसलिए उन्होंने भूमि सुधार, कामगारों, कलाकारों, किसानों की सुरक्षा की बात की। उन्होंने घोषणा की कि भारत को एक वैज्ञानिक नजरिए की जरूरत है, जबकि महात्मा गांधी पुराने को पुनजीर्वित करने की ओर झुके हुए थे, नेहरू भविष्यदृष्टा थे। वे भारत को वैज्ञानिक सोच वाला आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते थे.
इसके लिए उन्होंने जरूरी मूल्यों की न सिर्फ वकालत की बल्कि उसे अपने जीवन में भी उतारा. लेखक और विचारक पीसी जोशी ने एक बार एक संस्मरण सुनाया. '1945 की गमिर्यों की बात है. नेहरू जी अंतिम बार अल्मोड़ा जेल में कारावास में थे। जेल में दूध पहुंचाने वाला मेरा जानकार था। एक दिन उसने हमें बताया कि नेहरू जी आज रिहा होने वाले हैं। हम कुछ बच्चे कौतूहलवश उन्हें देखने जा पहुंचे। जेल के करीब पहुंचे तो देखा वह अकेले चले आ रहे हैं। तब तक शायद कांग्रेस के लोग उन्हें लेने नहीं पहुंच पाए थे। हम अभिभूत होकर उन्हें देख रहे थे। तभी वह हमारे पास आए और बोले- 'क्या देख रहे हो? वह सामने मंदिर देखो, कितना सुंदर है। बताओ किसने बनाया उसे, वह किस देवता का मंदिर है। नहीं जानते तुम? जानना चाहिए। देश यहीं से शुरू होता है।' फिर उनकी नजर सामने हिमालय की धवल चोटियों की ओर गई। वह फिर हमें कहने लगे- 'तुम लोग बहुत सौभाग्यशाली हो, हम तो कश्मीर में पैदा हुए, मगर वहां से कट गए। तुम कितनी सुंदर जगह रहते हो। लेकिन यहां लोग गरीब हैं। उनके लिए बड़े होकर कुछ करोगे या नहीं?'
नेहरू के पास हिंदुस्तान के लिए एक ग्लोबल विजन था। वे भारत को आधुनिक जगत से जोड़ना चाहते थे इसलिए हिंदुस्तान की वैश्विक भूमिका की वकालत की. जब दुनिया दो महाशक्तियों—अमेरिका और रूस— में बंटी हुई थी और ये दोनों शक्तियां अपना वर्चस्व बनाने पर लगी थीं, नेहरू ने हर वैश्विक दबाव का मुकाबला किया और नवस्वतंत्र भारत को विदेशी प्रभाव से मुक्त रखा. अमेरिका या रूस की ओर रुझान रखने की जगह उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुआई की. उन्होंने दुनिया के सामने प्राचीन भारत की छवि तोड़कर नए भारत की छवि रखी। गांधीजी नेहरू के बारे में कहा था- 'मेरे बाद तुम्हें मेरी आवाज नेहरू में सुनाई देगी।' आज जब राजनीतिक तौर पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर देश को हिंदू और मुसलमान में बांटने की कोशिश की जा रही है, नेहरू नई पीढ़ी के लिए 'विविधता में एकता' के विचार के लिए लड़ने वाले नायक की हैसियत से इतिहास पुरुष के रूप में अनुकरणीय हैं.

कोई टिप्पणी नहीं: