शनिवार, 21 मई 2016

मेरे देश की स्त्रियां

नारियों को पूजने वाले देश में
कैसी होती हैं स्त्रियां
मेरे महान देश की स्त्रियां
मेरे देश को कैसी लगती हैं
मैं झांकता हूं बारी-बारी
हर एक मन में, चाहता हूं देखना
पंद्रह बरस से अनशनरत एक स्त्री
नाक में नली, बिखरे बाल
आंखें भरीं, कातर निगाह
सालों से चीख रही है
मत करो अब मेरी बेटियों का बलात्कार
मत मारों मेरे बेटों को
मत बनाओ मेरी छाती पर हजारों गुमनाम कब्रें
मेरे देश को कैसी लगती है वह स्त्री?
कैसी लगती है वह स्त्री
जिसका शिकार खेलने गया पति कभी नहीं लौटा
घर से थाने, थाने से घर
दौड़ रही यंत्रवत, जैसे कोल्हू का बैल
पति को ढूंढते हुए एक दिन
रौंदा दिया गया उसका गर्भ सैनिक बूटों से
उस स्त्री की छत-विछत लाश
मेरे देश को कैसी लगती है?
भारत माता की झांकी निकाले युवकों को
कैसी लगती है वह स्त्री
थाने के बाहर बैठी पति की लाश लिए
चीखती है- न्याय दो
दुख के पहाड़ ढोने में भूल गई है
अपनी लुटी हुई अस्मिता पर चीखना
कैसी लगती होगी वह स्त्री
जो नुची हुई पड़ी है सड़क किनारे
या किसी पर रखी टंकी में
दिल्ली पहुंचकर उसकी चीख
बदल जाती है अश्लील सियासत में
कोई अगली स्त्री फिर गुजरती है उसी सड़क से
सड़कों से गुजरतीं सहमी स्त्रियां
मेरे देश को कैसी लगती हैं?
मैं पंद्रह बरस से अनशनरत स्त्री हूं
गुमनाम कब्र में दफन एक स्त्री का बेटा हूं
बलत्कृत हुई एक स्त्री का स्वत्व हूं
थाने के बाहर बैठी एक स्त्री के पति की लाश हूं
नोच दी गई एक स्त्री की मांसपेशी हूं
व्यस्त सड़क से गुजरती हुई सहमी स्त्री हूं
मैं स्त्रीरूप, मेरे देश को कैसा लगता हूं?

2 टिप्‍पणियां:

Akanksha Yadav ने कहा…

समकालीन समाज के विद्रूप सच को दर्शाती अच्छी रचना। साधुवाद !!

najmu sahar ने कहा…

एक विचलित सच