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धर्मनिरपेक्ष भारत के नायक: जवाहरलाल नेहरू

मैं जवाहर लाल नेहरू के देहांत के 22 साल बाद पैदा हुआ. जाहिर तब तक उनका युग समाप्त हो चुका था. जब मैं बच्चा ​था, उस समय भारतीय राजनीति में मंडल के काउंटर में कमंडल आ गया था और भारतीय राजनीति खून—खराबा करते हुए मंदिर बनवाने दौड़ पड़ी थी. जब मैं पढ़ने लगा तब तब गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, भगत सिंह के बारे में जाना, उनका लिखा पढ़ा और उनके बारे में पढ़ा. अब सोचता हूं काश उस युग में मैं भी पैदा हुआ होता, जिनकी खींची लकीरें अबतक की सबसे बढ़ी लकीरें हैं. यह लेख दो साल पहले लिखा था.


भारतीय इतिहासकारों ने जवाहरलाल नेहरू का मूल्यांकन करते समय उन्हें आधुनिक भारत का शिल्पी कहा है. नेहरू की भूमिका को लेकर तमाम विवादों के बावजूद उनके बारे में यह कहना कहीं से भी अतिशयोक्ति नहीं है. वे बीसवीं सदी के भारत के अग्रणी जनवादी, मानवीय मूल्यों को तरजीह देने वाले और महान द्रष्टा थे. अपने समय में नेहरू नागरिक स्वतंत्रताओं के जबर्दस्त हिमायती थे और इसे उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे, जितना की आर्थिक समानता या समाजवाद को. हिंदुस्तान का निर्माण इस विचारधारा की बुनियाद पर टिका है कि आधुनिक हिंदुस्तान अनेक धर्मों, जाति…

सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ हो रही अभद्रता पर आग़ाज़ सांस्कृतिक मंच का बयान

महिला अधिकार कार्यकर्ता कविता कृष्णन के एक बयान के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह का तूफ़ान मचा हुआ है वह हमारे पितृसत्तात्मक समाज की लाइलाज़ हो चली बीमारी का घिनौना आईना है.यह एक ऐसा समाज है जिसमें सेक्स एक तरफ़ टैबू है तो दूसरी तरफ़ बलात्कार धीरे-धीरे अपवाद से नियम सी बनती जा रही कार्यवाही. जहाँ एक तरफ़ लोग यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते कहते नहीं अघाते वहीँ दूसरी तरफ़ माँ-बहन की गालियाँ भाषा का अभिन्न हिस्सा हैं. दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों के बीच महिला अधिकारों की बात करने वाली, साम्प्रदायिकता का विरोध करने वाली और आधुनिक जीवन मूल्यों का समर्थन करने वाली महिलाओं के लिए यही गालियाँ हैं और बलात्कार की धमकी. चाहे वह कांग्रेसी प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी हों या फिर वाम कार्यकर्ता कविता कृष्णन, सोशल मीडिया पर उन्हें यह सब सुनना पडा है, बार-बार सुनना पड़ा है. सबसे पहले हम अपने मंच की ओर से इन बहादुर महिलाओं और ऐसी तमाम दूसरी महिलाओं को सलाम पेश करते हैं और उनके संघर्ष में बिरादराना भागीदारी का अहद करते हैं.

फ्री सेक्स को लेकर कविता का बयान एकदम स्पष्ट था. उनकी माँ ने जिस बहादुरी से उस पर आई एक घ…

मेरे देश की स्त्रियां

नारियों को पूजने वाले देश में
कैसी होती हैं स्त्रियां
मेरे महान देश की स्त्रियां
मेरे देश को कैसी लगती हैं
मैं झांकता हूं बारी-बारी
हर एक मन में, चाहता हूं देखना
पंद्रह बरस से अनशनरत एक स्त्री
नाक में नली, बिखरे बाल
आंखें भरीं, कातर निगाह
सालों से चीख रही है
मत करो अब मेरी बेटियों का बलात्कार
मत मारों मेरे बेटों को
मत बनाओ मेरी छाती पर हजारों गुमनाम कब्रें
मेरे देश को कैसी लगती है वह स्त्री?
कैसी लगती है वह स्त्री
जिसका शिकार खेलने गया पति कभी नहीं लौटा
घर से थाने, थाने से घर
दौड़ रही यंत्रवत, जैसे कोल्हू का बैल
पति को ढूंढते हुए एक दिन
रौंदा दिया गया उसका गर्भ सैनिक बूटों से
उस स्त्री की छत-विछत लाश
मेरे देश को कैसी लगती है?
भारत माता की झांकी निकाले युवकों को
कैसी लगती है वह स्त्री
थाने के बाहर बैठी पति की लाश लिए
चीखती है- न्याय दो
दुख के पहाड़ ढोने में भूल गई है
अपनी लुटी हुई अस्मिता पर चीखना
कैसी लगती होगी वह स्त्री
जो नुची हुई पड़ी है सड़क किनारे
या किसी पर रखी टंकी में
दिल्ली पहुंचकर उसकी चीख
बदल जाती है अश्लील सियासत में
कोई अगली स्त्री फिर गुजरती है उसी सड़क से
सड़कों से गुज…

मुठभेड़ चाल

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कभी कानून व्यवस्था के लिए खतरा बने कुख्यात अपराधियों से निपटने के लिए अंजाम दी जाने वाली मुठभेड़ की कार्रवाई गैर-कानूनी हत्याओं के एक ऐसे खेल में बदल गई है जो अधिकारियों के लिए पद, पैसा और प्रशंसा बटोरने का जरिया बन गई. क्या मुठभेड़ के नाम पर भारतीय कानून ऐसी हत्याओं की इजाजत देता है?


सीबीआई कोर्ट ने 25 साल पहले पीलीभीत में हुए 10 सिखों के फर्जी एनकाउंटर में 47 पुलिसकर्मियों को दोषी पाया है. फर्जी एनकाउंटर तो हमारे देश में आम बात है, लेकिन बहुत कम मामले ऐसे हैं जिनमें फर्जी एनकाउंटर करने वाले पुलिसकर्मियों या सैन्यकर्मियों को सजा हुई हो. हो सकता है कि एनकाउंटर कभी ऐसे अपराधियों को ठिकाने लगाने का हथियार रहा हो जो कानून-व्यवस्था और जनता के लिए खतरा बने, लेकिन साथ-साथ यह विरोधियों को ठिकाने लगाने और राजनीतिक बदला लेने या अंडरवर्ल्ड के इशारे पर किसी को निपटाने का भी जरिया बना. बीहड़ों के डकैत और अंडरवर्ल्ड के लोग, जो कानून व्यवस्था के लिए मुसीबत बने हुए थे, उनके खात्मे से शुरू हुई पुलिस मुठभेड़ की कार्रवाई बहुत जल्द ही पुलिस अधिकारियों के लिए  पद-पैसे में बढ़ोतरी और प्रशंसा बटोरने का खेल…

पत्रकारों की स्वामिभक्ति और उनकी हत्याएं

मीडिया में अब संपादक नहीं हैं. कुछ एक संस्थानों को छोड़ दें तो संपादक का पद ही खत्म हो गया है. मैं अपने सात साल के कॅरियर में दो-एक ही ऐसे लोगों को जानता हूं जो संपादकीय कुर्सी पर बैठकर अपने सहकर्मियों का साथ देते हैं. ज्यादातर मीडिया घरानों में सीईओ नाम का कॉरपोरेट दलाल बैठा है. पत्रकार फील्ड में रिपोर्टिंग करते हुए कहीं फंस जाए तो ये उसका साथ देने की जगह कह देते हैं कि यह हमारा नहीं है. पत्रकार अपना खून पसीना बहाए अखबार के लिए और उसके मरने पर अखबार या चैनल उसे अपना कहने से इनकार कर देते हैं. इसके बावजूद पत्रकार कभी संस्थानों पर सवाल नहीं उठाते क्योंकि उन्हें किसी भी सूरत में नौकरी प्रिय है.
छत्तीसगढ़ में सबसे बुरे हालात हैं. जीन्यूज, प्रभात खबर, नवभारत, भास्कर और दूसरे संस्थान अपने पत्रकारों को फंसने पर या तो पहचानने से इनकार कर चुके हैं, या फिर उनको नौकरी से हटा चुके हैं. छत्तीसगढ़ सरकार ने दर्जनों पत्रकारों पर फर्जी मुकदमें दर्ज कर चुकी है. चार पत्रकार जेल के अंदर हैं. छह फरार हैं. 2012 से अब तक वहां छह पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. वहां जो भी पत्रकार कॉरपोरेट या सरकार पर सवाल क…