शुक्रवार, 27 मई 2016

धर्मनिरपेक्ष भारत के नायक: जवाहरलाल नेहरू

मैं जवाहर लाल नेहरू के देहांत के 22 साल बाद पैदा हुआ. जाहिर तब तक उनका युग समाप्त हो चुका था. जब मैं बच्चा ​था, उस समय भारतीय राजनीति में मंडल के काउंटर में कमंडल आ गया था और भारतीय राजनीति खून—खराबा करते हुए मंदिर बनवाने दौड़ पड़ी थी. जब मैं पढ़ने लगा तब तब गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, भगत सिंह के बारे में जाना, उनका लिखा पढ़ा और उनके बारे में पढ़ा. अब सोचता हूं काश उस युग में मैं भी पैदा हुआ होता, जिनकी खींची लकीरें अबतक की सबसे बढ़ी लकीरें हैं. यह लेख दो साल पहले लिखा था.

 
भारतीय इतिहासकारों ने जवाहरलाल नेहरू का मूल्यांकन करते समय उन्हें आधुनिक भारत का शिल्पी कहा है. नेहरू की भूमिका को लेकर तमाम विवादों के बावजूद उनके बारे में यह कहना कहीं से भी अतिशयोक्ति नहीं है. वे बीसवीं सदी के भारत के अग्रणी जनवादी, मानवीय मूल्यों को तरजीह देने वाले और महान द्रष्टा थे. अपने समय में नेहरू नागरिक स्वतंत्रताओं के जबर्दस्त हिमायती थे और इसे उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे, जितना की आर्थिक समानता या समाजवाद को. हिंदुस्तान का निर्माण इस विचारधारा की बुनियाद पर टिका है कि आधुनिक हिंदुस्तान अनेक धर्मों, जातियों और संप्रदायों के बुनियादी अधिकार सुनिश्चित करता है, हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र नहीं हैं. नेहरू इस विचार के अग्रणी लोगों में से थे, जिनके प्रयास से हिंदुस्तान एक उदार और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में स्थापित हो सका. वे प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान, आत्मा की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, तार्किकता, मानवता आदि के न सिर्फ हिमायती थे, बल्कि इसके लिए संघर्ष भी किया. अपने व्यक्तित्व में नेहरू बेहद उदार दृष्टिकोण रखते थे, जिसे उन्होंने भारतीय जनमानस में उतारने की कोशिश की. 1954 में उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों को लिखा—'यदि भारत को सचमुच वैसा महान बनाना है जैसा कि हम सब लोग चाहते हैं तो उसे न तो अंदर से और न ही बाहर से अलग—थलग होना चाहिए. उसे उन सभी चीजों का त्याग करना पड़ेगा जो उनकी आत्मा का चिंतन या सामाजिक जीवन के विकास में बाधक बन सकती हैं.'
नेहरू के धुर आलोचक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे महान लोकतांत्रिक मूल्यों वाले नेता थे। नेहरू ने तमाम मुश्किलें उठाकर धर्मनिरपेक्ष ढांचे की नींव रखी और उसकी पूरी शक्ति से हिफाजत भी की। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने संसद में अपनी आलोचना करने वालों की भी वो पीठ थपथपाया करते थे। नेहरू एक समतावादी, न्यायोचित और जनवादी समाज—समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे. नागरिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता नेहरू के उच्च राजनीतिक मूल्यों में सर्वोपरि रहे. गांधी और मार्क्स के विचारों के उनपर व्यापक असर था और इन विचारों के अनुरूप उन्होंने एक समाजवादी राष्ट्र की स्थापना के लिए आजीवन कोशिश करते रहे.
नागरिक स्वतंत्रताओं के हिमायती नेहरू ने मार्च 1940 में लिखा—'प्रेस की आजादी का मतलब यह नहीं होता कि जो चीजें हम छपी हुई देखना चाहें, सिर्फ उन्हीं की अनुमति दें, इस तरह की आजादी से तो कोई अत्याचारी भी सहमत हो जाएगा. नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रेस की आजादी का मतलब है कि हम जो चीज न चाहें उनकी भी अनुमति दें, अपनी आलोचना बर्दाश्त करें.' नेहरू की ख्याति एक ऐसे नेता के रूप में है जो तीखी आलोचनाओं का भी सम्मान करने की हिमायत करते थे.
कराची कांग्रेस का 1931 में मौलिक अधिकारों पर पारित प्रस्ताव नेहरू ने ही तैयार किया था उसमें अभिव्यक्ति तथा प्रेस के द्वारा अपनी राय व्यक्त करने और संगठन बनाने के अधिकार सुनिश्चित किए गए.उन्हीं के प्रयासों से 1936 में इंडियन सिविल लिबर्टीज यूनियन की स्थापना हुई. यह एक गैर—दलीय असांप्रदायिक संगठन था जिसका मकसद नागरिक अधिकारों पर होने वाले हमलों के खिलाफ जनमत तैयार करना था. इस संगठन की स्थापना के अवसर पर नेहरू ने कहा था—'जब नागरिक अधिकारों का दमन होता है तो राष्ट्र की तेजस्विता समाप्त हो जाती है और वह कोई भी ठोस काम करने लायक नहीं रह जाता.' भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने धीरे—धीरे लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की एक ऐसी विचारधारा एवं संस्कृति विकसित करने में सफलता प्राप्त की.  असहमति के प्रति सम्मान भाव, अभिव्यक्ति की आजादी, बहुमत के शासन का सिद्धांत और अल्पसंख्यक मतों के बने रहने के अधिकार की मान्यता जिसका आधार बने. इसमें नेहरू का उल्लेखनीय योगदान रहा कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा वाले लोकतंत्र की सहमति बन सकी. गांधी जी भी नागरिकों के अधिकारों के प्रति पूर्णतया कटिबद्ध थे जो आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. गांधी जी ने 1922 के यंग इंडिया में लिखा था—'हम अपने लक्ष्य की तरफ एक कदम भी बढ़ सकें, इससे पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति ओर संगठन के अधिकार को हमें हासिल करना चाहिए. हमें इन अधिकारों की रक्षा जान देकर भी करनी चाहिए.' इन नायाब मूल्यों ने भारत को उदार लोकतंत्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका अदा की.
इतिहासकार विपिन चंद्र अपनी किताब 'भारत का स्वतंत्रता संघर्ष' में लिखते हैं कि 'समाजवादी भारत के विजन को लोकप्रिय बनाने में जवाहरलाल नेहरू ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.उनका कहना था कि राजनीतिक आजादी जनता की आर्थिक मुक्ति के बिना बेकार है. 1930 के पूरे दशक में वे तत्कालीन राष्ट्रवादी विचारधारा की अपर्याप्तता की ओर संकेत करते रहे और उसपर बुर्जुआ विचारों के वर्चस्व की आलोचना करते रहे. उनका जोर इस बात पर था राष्ट्रीय आंदोलन में एक नई, समाजवादी—बुनियादी रूप से मार्क्सवादी—विचारधारा को प्रमुख स्थान दिया जाए, ताकि लोग अपनी सामाजिक स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन कर सकें और कांग्रेस को समाजवादी विचारधारा का वाहक बना सकें. इस मामले में 30 का दशक काफी अनुकूल साबित हुआ.'
नेहरू जिस विचारधारा का नेतृत्व कर रहे थे वह जनवाद, कानून का शासन, व्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान, सामाजिक समता, बुद्धिपरकता और नैतिकता पर टिका हुआ था.  उन्होंने आजीवन एकीकृत धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के लिए संघर्ष किया, जहां पर हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का मूलभूत अधिकार प्राप्त हो. यह नेहरू ही थे, जिन्होंने हिंदुत्ववादी ताकतों को कभी सर नहीं उठाने दिया और धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्र के विचार को मजबूती से आगे बढ़ाया. कहते हैं कि एक बार वह दिल्ली में मुसलमानों के इलाके की ओर बढ़ते तलवार लपलपाते सिखों के एक जुलूस के आगे तनकर खड़े हो गए थे और उन्हें ऐसी डांट लगाई कि सभी ने हथियार फेंक दिए।
गांधीजी ने जो स्वराज, गांवों और आखिरी आदमी के विकास की बात की, नेहरू ने उसे आगे बढ़ाया। उन्होंने इस बात को समझा कि आम आदमी के बिना स्वाधीनता की बात अधूरी है। इसलिए उन्होंने भूमि सुधार, कामगारों, कलाकारों, किसानों की सुरक्षा की बात की। उन्होंने घोषणा की कि भारत को एक वैज्ञानिक नजरिए की जरूरत है, जबकि महात्मा गांधी पुराने को पुनजीर्वित करने की ओर झुके हुए थे, नेहरू भविष्यदृष्टा थे। वे भारत को वैज्ञानिक सोच वाला आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते थे.
इसके लिए उन्होंने जरूरी मूल्यों की न सिर्फ वकालत की बल्कि उसे अपने जीवन में भी उतारा. लेखक और विचारक पीसी जोशी ने एक बार एक संस्मरण सुनाया. '1945 की गमिर्यों की बात है. नेहरू जी अंतिम बार अल्मोड़ा जेल में कारावास में थे। जेल में दूध पहुंचाने वाला मेरा जानकार था। एक दिन उसने हमें बताया कि नेहरू जी आज रिहा होने वाले हैं। हम कुछ बच्चे कौतूहलवश उन्हें देखने जा पहुंचे। जेल के करीब पहुंचे तो देखा वह अकेले चले आ रहे हैं। तब तक शायद कांग्रेस के लोग उन्हें लेने नहीं पहुंच पाए थे। हम अभिभूत होकर उन्हें देख रहे थे। तभी वह हमारे पास आए और बोले- 'क्या देख रहे हो? वह सामने मंदिर देखो, कितना सुंदर है। बताओ किसने बनाया उसे, वह किस देवता का मंदिर है। नहीं जानते तुम? जानना चाहिए। देश यहीं से शुरू होता है।' फिर उनकी नजर सामने हिमालय की धवल चोटियों की ओर गई। वह फिर हमें कहने लगे- 'तुम लोग बहुत सौभाग्यशाली हो, हम तो कश्मीर में पैदा हुए, मगर वहां से कट गए। तुम कितनी सुंदर जगह रहते हो। लेकिन यहां लोग गरीब हैं। उनके लिए बड़े होकर कुछ करोगे या नहीं?'
नेहरू के पास हिंदुस्तान के लिए एक ग्लोबल विजन था। वे भारत को आधुनिक जगत से जोड़ना चाहते थे इसलिए हिंदुस्तान की वैश्विक भूमिका की वकालत की. जब दुनिया दो महाशक्तियों—अमेरिका और रूस— में बंटी हुई थी और ये दोनों शक्तियां अपना वर्चस्व बनाने पर लगी थीं, नेहरू ने हर वैश्विक दबाव का मुकाबला किया और नवस्वतंत्र भारत को विदेशी प्रभाव से मुक्त रखा. अमेरिका या रूस की ओर रुझान रखने की जगह उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुआई की. उन्होंने दुनिया के सामने प्राचीन भारत की छवि तोड़कर नए भारत की छवि रखी। गांधीजी नेहरू के बारे में कहा था- 'मेरे बाद तुम्हें मेरी आवाज नेहरू में सुनाई देगी।' आज जब राजनीतिक तौर पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर देश को हिंदू और मुसलमान में बांटने की कोशिश की जा रही है, नेहरू नई पीढ़ी के लिए 'विविधता में एकता' के विचार के लिए लड़ने वाले नायक की हैसियत से इतिहास पुरुष के रूप में अनुकरणीय हैं.

बुधवार, 25 मई 2016

सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ हो रही अभद्रता पर आग़ाज़ सांस्कृतिक मंच का बयान

महिला अधिकार कार्यकर्ता कविता कृष्णन के एक बयान के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह का तूफ़ान मचा हुआ है वह हमारे पितृसत्तात्मक समाज की लाइलाज़ हो चली बीमारी का घिनौना आईना है.यह एक ऐसा समाज है जिसमें सेक्स एक तरफ़ टैबू है तो दूसरी तरफ़ बलात्कार धीरे-धीरे अपवाद से नियम सी बनती जा रही कार्यवाही. जहाँ एक तरफ़ लोग यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते कहते नहीं अघाते वहीँ दूसरी तरफ़ माँ-बहन की गालियाँ भाषा का अभिन्न हिस्सा हैं. दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों के बीच महिला अधिकारों की बात करने वाली, साम्प्रदायिकता का विरोध करने वाली और आधुनिक जीवन मूल्यों का समर्थन करने वाली महिलाओं के लिए यही गालियाँ हैं और बलात्कार की धमकी. चाहे वह कांग्रेसी प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी हों या फिर वाम कार्यकर्ता कविता कृष्णन, सोशल मीडिया पर उन्हें यह सब सुनना पडा है, बार-बार सुनना पड़ा है. सबसे पहले हम अपने मंच की ओर से इन बहादुर महिलाओं और ऐसी तमाम दूसरी महिलाओं को सलाम पेश करते हैं और उनके संघर्ष में बिरादराना भागीदारी का अहद करते हैं.

फ्री सेक्स को लेकर कविता का बयान एकदम स्पष्ट था. उनकी माँ ने जिस बहादुरी से उस पर आई एक घटिया टिप्पणी का जवाब दिया, वह स्तुत्य है और महिला अधिकारों के संघर्ष की मज़बूत नींव की तरफ इशारा करता है जो चंद बददिमाग, बीमार और कुंठित लोगों के हमलों से झुकाने वाला नहीं. वहीँ इस पर ख़ुद को पत्रकार कहने वाले सुमंत भट्टाचार्य जैसे व्यक्ति का बयान उस कुत्सित पुरुषवादी सोच का परिचायक है जो सीधे मनु स्मृति से संचालित होता है. उस सोच का जो स्त्री को देह से इतर नहीं देखता, उस सोच का जो देवी और वैश्या की बाइनरी गढ़ता है. हम माननीय न्यायालय पर पूरा भरोसा करते हैं और हमें यक़ीन है कि कविता द्वारा दर्ज किये गए मुक़दमे के तहत इस व्यक्ति को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलेगी.

मुक्त स्त्री हमेशा से परम्परावादियों की आँखों में रेत की तरह चुभती है. वे इंद्र की पूजा करते हैं और अहिल्या को पत्थर बना देते हैं. उन्हें यह समझ नहीं आयेगा कि बलात्कारी इंद्र का छल से किया सेक्स किस तरह अन-फ्री सेक्स था. किस तरह राजाओं के हरम में क़ैद महिलाओं के साथ हुआ सेक्स 'अन-फ्री' सेक्स था. किस तरह धर्म के नाम पर हिन्दुस्तान से अरब तक में हुए बेमेल विवाहों के फलस्वरूप हुआ सेक्स 'अन फ्री' सेक्स था/है. स्त्री की योनि और कोख के नियंत्रण के लिए पितृसत्ता ने उसके साथ जो भयावह अत्याचार किये हैं, स्त्री मुक्ति आन्दोलन उसे हमेशा हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए वचनबद्ध है और हम एक वामपंथी के रूप में उसके इस संघर्ष में हमेशा साथ हैं, सहभागी हैं, कॉमरेड इन आर्म्स हैं. हम मानते हैं कि अपने लिए पार्टनर चुनने का अधिकार पुरुष ही नहीं स्त्री का भी मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार है. पूँजीवादी बाज़ार की अराजकता और उसकी कोख से पैदा हुआ सेक्स ट्रेड, पोर्न जिसका ज़रूरी हिस्सा है, फ्री सेक्स नहीं केवल सेक्स ट्रेड है, जहां देह बिकने और ख़रीदे जाने वाली कमोडिटी में तब्दील कर दी जाती है. मुक्त प्रेम केवल एक मुक्त समाज में संभव है, उसे समझने और उसका सम्मान करने के लिए सबसे मूलभूत ज़रुरत है - लोकतांत्रिक विचार. जहाँ विवाह दो व्यक्तियों के प्रेम और सहकार से सहजीवन आरम्भ करने की जगह दो परिवारों के धार्मिक-जातीय-आर्थिक संस्कारों के तहत किये गए अनुबंध हों और अपने होने के साथ हर हाल में जीवन भर चलते जाने के नियम से बंधे हों, वहां पुरुष और स्त्री के बीच बराबरी के सम्बन्ध असंभव हैं. इसलिए बराबरी की यह लड़ाई आज सभी धर्मों और धार्मिक संस्थाओं, मध्यकालीन नियमावलियों, पितृसत्तात्मक परम्पराओं और आर्थिक गैर बराबरी की लड़ाई है.

आग़ाज़ सांस्कृतिक मंच इस लड़ाई में भागीदार सभी संगठनों, फ़ोरमों और व्यक्तियों की आवाज़ में अपनी आवाज़ शामिल करता है.  

शनिवार, 21 मई 2016

मेरे देश की स्त्रियां

नारियों को पूजने वाले देश में
कैसी होती हैं स्त्रियां
मेरे महान देश की स्त्रियां
मेरे देश को कैसी लगती हैं
मैं झांकता हूं बारी-बारी
हर एक मन में, चाहता हूं देखना
पंद्रह बरस से अनशनरत एक स्त्री
नाक में नली, बिखरे बाल
आंखें भरीं, कातर निगाह
सालों से चीख रही है
मत करो अब मेरी बेटियों का बलात्कार
मत मारों मेरे बेटों को
मत बनाओ मेरी छाती पर हजारों गुमनाम कब्रें
मेरे देश को कैसी लगती है वह स्त्री?
कैसी लगती है वह स्त्री
जिसका शिकार खेलने गया पति कभी नहीं लौटा
घर से थाने, थाने से घर
दौड़ रही यंत्रवत, जैसे कोल्हू का बैल
पति को ढूंढते हुए एक दिन
रौंदा दिया गया उसका गर्भ सैनिक बूटों से
उस स्त्री की छत-विछत लाश
मेरे देश को कैसी लगती है?
भारत माता की झांकी निकाले युवकों को
कैसी लगती है वह स्त्री
थाने के बाहर बैठी पति की लाश लिए
चीखती है- न्याय दो
दुख के पहाड़ ढोने में भूल गई है
अपनी लुटी हुई अस्मिता पर चीखना
कैसी लगती होगी वह स्त्री
जो नुची हुई पड़ी है सड़क किनारे
या किसी पर रखी टंकी में
दिल्ली पहुंचकर उसकी चीख
बदल जाती है अश्लील सियासत में
कोई अगली स्त्री फिर गुजरती है उसी सड़क से
सड़कों से गुजरतीं सहमी स्त्रियां
मेरे देश को कैसी लगती हैं?
मैं पंद्रह बरस से अनशनरत स्त्री हूं
गुमनाम कब्र में दफन एक स्त्री का बेटा हूं
बलत्कृत हुई एक स्त्री का स्वत्व हूं
थाने के बाहर बैठी एक स्त्री के पति की लाश हूं
नोच दी गई एक स्त्री की मांसपेशी हूं
व्यस्त सड़क से गुजरती हुई सहमी स्त्री हूं
मैं स्त्रीरूप, मेरे देश को कैसा लगता हूं?

रविवार, 15 मई 2016

मुठभेड़ चाल

कभी कानून व्यवस्था के लिए खतरा बने कुख्यात अपराधियों से निपटने के लिए अंजाम दी जाने वाली मुठभेड़ की कार्रवाई गैर-कानूनी हत्याओं के एक ऐसे खेल में बदल गई है जो अधिकारियों के लिए पद, पैसा और प्रशंसा बटोरने का जरिया बन गई. क्या मुठभेड़ के नाम पर भारतीय कानून ऐसी हत्याओं की इजाजत देता है?


सीबीआई कोर्ट ने 25 साल पहले पीलीभीत में हुए 10 सिखों के फर्जी एनकाउंटर में 47 पुलिसकर्मियों को दोषी पाया है. फर्जी एनकाउंटर तो हमारे देश में आम बात है, लेकिन बहुत कम मामले ऐसे हैं जिनमें फर्जी एनकाउंटर करने वाले पुलिसकर्मियों या सैन्यकर्मियों को सजा हुई हो. हो सकता है कि एनकाउंटर कभी ऐसे अपराधियों को ठिकाने लगाने का हथियार रहा हो जो कानून-व्यवस्था और जनता के लिए खतरा बने, लेकिन साथ-साथ यह विरोधियों को ठिकाने लगाने और राजनीतिक बदला लेने या अंडरवर्ल्ड के इशारे पर किसी को निपटाने का भी जरिया बना. बीहड़ों के डकैत और अंडरवर्ल्ड के लोग, जो कानून व्यवस्था के लिए मुसीबत बने हुए थे, उनके खात्मे से शुरू हुई पुलिस मुठभेड़ की कार्रवाई बहुत जल्द ही पुलिस अधिकारियों के लिए  पद-पैसे में बढ़ोतरी और प्रशंसा बटोरने का खेल बन गई. पिछले दो-तीन दशकों में कई ऐसे एनकाउंटर के मामले चर्चित हुए जो पहले पुलिस के दावे से अलग फर्जी एनकाउंटर या कहें पुलिस द्वारा की गई गैर-कानूनी हत्या साबित हुए.
उत्तर प्रदेश फर्जी एनकाउंटर के मामले में सबसे अव्वल है. अगस्त 2009 में लखनऊ में ह्यूमन राइट्स वॉच ने ‘ब्रोकेन सिस्टम, डिस्फंक्शनल एब्यूज ऐंड इम्प्यूनिटी इन इंडियन पुलिस’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी. रिपोर्ट की शुरुआत में एक पुलिस अधिकारी का कबूलनामा था, ‘इस हफ्ते मुझे एक एनकाउंटर करने को कहा गया है. मैं उसकी तलाश कर रहा हूं. मैं उसे मार डालूंगा. हो सकता है कि मुझे जेल भेज दिया जाए लेकिन यदि मैं ऐसा नहीं करता तो मेरी नौकरी चली जाएगी.’ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 से 2015 के बीच देश में सबसे ज्यादा फर्जी एनकाउंटर उत्तर प्रदेश में हुए. इस दौरान यूपी में लगभग 782 फर्जी एनकाउंटर की शिकायतें दर्ज कराई गईं. वहीं, दूसरे नंबर पर आंध्र प्रदेश रहा, जहां सिर्फ 87 फर्जी एनकाउंटर की शिकायतें आईं. आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी के मुताबिक, इन 782 मामलों में से 160 मामलों में यूपी सरकार ने पीड़ित परिवार को लगभग 9.47 करोड़ रुपये मुआवजा भी दिया. वहीं, इस दौरान पूरे देश में कुल 314 शिकायतों में मुआवजे दिए गए. यूपी और आंध्र प्रदेश के बाद तीसरा नंबर बिहार और चौथा असम का रहा. जहां इस दौरान बिहार में 73 फर्जी एनकाउंटर के मामले आए तो असम में 66 मामले दर्ज हुए. इसके अलावा जुलाई 2014 में गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने बताया था कि साल 2011 से 2014 के बीच 185 फर्जी मुठभेड़ के केस पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज हुए थे. इनमें सबसे ज्यादा यूपी में 42 केस और इसके बाद झारखंड में 19 केस दर्ज हुए हैं. आंकड़ों के मुताबिक, 2006 में भारत में मुठभेड़ों में हुई कुल 122 मौतों में से 82 अकेले उत्तर प्रदेश में हुईं. 2007 में यह संख्या 48 थी जो देश में हुई 95 मौतों के 50 फीसदी से भी ज्यादा थी. 2008 में जब देश भर में 103 लोग पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए तो उत्तर प्रदेश में यह संख्या 41 थी. 2009 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 83 लोगों को मुठभेड़ों में मारकर अपने ही पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए.
उत्तर प्रदेश के भदोही में 2005 में हुई एक फर्जी मुठभेड़ के केस में 28 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ था. सीआईडी जांच में पाया गया कि 5000 रुपये के इनामी बदमाश विजय उर्फ लल्लू उर्फ बुद्धसेन को पुलिस ने मार गिराया था. पुलिस ने इसे मुठभेड़ दिखाया लेकिन बाद में इसे फर्जी पाया गया. जिन 28 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया, उनमें से पांच बाद में थाना प्रभारी भी बन गए.
पीलीभीत फर्जी एनकाउंटर मामले के पहले भी एनकाउंटर की कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जो फर्जी साबित हुईं. दिसंबर 2015 में सीबीआई की विशेष अदालत ने मेरठ के दौराला के एक जंगल में फर्जी मुठभेड़ मामले में तीन सेवानिवृत्त अधिकारियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इस घटना में मेरठ कॉलेज की एक 20 साल की छात्रा स्मिता भादुड़ी की 14 जनवरी, 2000 को मेरठ के सिवाया गांव के पास फर्जी मुठभेड़ में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अतिरिक्त जिला न्यायाधीश नवनीत कुमार ने सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक अरुण कौशिक, कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र कुमार को हत्या का दोषी पाया था.
जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के माछिल सेक्टर में अप्रैल 2010 में एक फर्जी मुठभेड़ का मामला सामने आया था. इस मामले में सेना ने 2015 में एक कर्नल रैंक अधिकारी समेत छह जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. कर्नल दिनेश पठानिया, कैप्टन उपेंद्र, हवलदार देवेंद्र कुमार, लांस नायक लखमी, लांस नायक अरुण कुमार और राइफल मैन अब्बास हुसैन ने तीन आतंकियों को मारने का दावा किया था. मरने वालों की तस्वीर सामने आने के बाद काफी विवाद हुआ. मरने वालों के परिजनों ने दावा किया कि वे तीनों सामान्य नागरिक थे, जिनको फर्जी मुठभेड़ में मारा गया. उनकी पहचान  बारामूला जिले के नदीहाल इलाके के रहने वाले मोहम्मद शाफी, शहजाद अहमद और रियाज अहमद के रूप में की गई. इस घटना के बाद पूरी कश्मीर घाटी में अशांति फैल गई. बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए जिसमें 123 लोग मारे गए थे. पुलिस जांच में साबित हुआ कि तीनों नागरिकों को नौकरी का झांसा देकर सीमा पर ले जाया गया जहां उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया. इस मुठभेड़ का मकसद इनाम और प्रमोशन पाना था. सेना ने जनरल कोर्ट मार्शल का आदेश दिया तो छह जवान दोषी पाए गए.
अप्रैल 2015 में आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सीमा पर तिरुपति के पास आंध्र प्रदेश के सेशाचलम के जंगल में एसटीएफ ने 20 लोगों को मार गिराया. एसटीएफ ने दावा किया कि ये सभी दुर्लभ लाल चंदन की लकड़ियों की तस्करी से जुड़े थे, लेकिन बाद में जो तस्वीरें और तथ्य सामने आए वे विरोधाभासी थे. मारे गए लोगों के परिजनों ने दावा किया कि वे सभी मजदूर थे जिनकी गलत तरीके से हत्या की गई. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इस एनकाउंटर पर सवाल उठाए थे. इसी दौरान अप्रैल 2015 में तेलंगाना के वारांगल जिले में पुलिस ने पांच ऐसे लोगों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया जो न्यायिक हिरासत में थे. पुलिस के मुताबिक वारंगल सेंट्रल जेल से हैदराबाद कोर्ट ले जाते समय कैदियों ने हथियार छीनने की कोशिश की और पुलिस कार्रवाई में मारे गए. इन पांचों पर एक स्थानीय आतंकी संगठन से जुड़े होने का आरोप था. जिस वक्त इन्हें मारा गया, सभी कैदियों के हाथ में हथकड़ियां लगी थीं. इस एनकाउंटर पर भी सवाल उठे थे.
भारत में पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा नक्सलियों, कुख्यात अपराधियों और बीहड़ के डकैतों को फर्जी मुठभेड़ों में मारे जाने का इतिहास काफी पुराना है. इसका चलन साठ के दशक में शुरू हुआ जब पुलिस ने बीहड़ों के डाकुओं के खिलाफ अभियान चलाए. सीधी मुठभेड़ में कुख्यात डाकुओं के मारे जाने के बाद आॅपरेशन को अंजाम देने वाले अधिकारी को राज्य सरकारों द्वारा पुरस्कार और पदोन्नति मिलती थी. बाद में सामने आया कि इन मुठभेड़ों में कुख्यात अपराधियों के अलावा कई निर्दोष लोग फर्जी तरीके से मारे गए. 20वीं सदी के आखिरी वर्षों में और नई सदी के पहले दशक में मानवाधिकार संगठनों ने इन मुठभेड़ों और गैर-कानूनी हत्याओं पर चिंताएं जाहिर करनी शुरू कीं. इसके पहले ये एनकाउंटर एक तरह से जायज माने जाते रहे. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का मानना है कि राज्यों में होने वाली फर्जी मुठभेड़ों में से ज्यादातर को पुलिस अंजाम देती है, सेना की ओर से ऐसी कार्रवाइयां कम सामने आती हैं.
मुंबई में 1990 के दशक में संगठित अपराध खत्म करने के लिए धड़ाधड़ एनकाउंटर हुए और ऐसे अधिकारियों को ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के तमगे से नवाजा गया. पुलिस का कहना था कि एनकाउंटर करके वह न्याय प्रक्रिया में तेजी ला रही है. जनवरी, 1982 में मान्या सुर्वे नामक कुख्यात गैंगस्टर को पुलिस ने वडाला इलाके में मार गिराया. इसे मुंबई पुलिस के पहले एनकाउंटर के रूप में दर्ज किया गया. इसके बाद 2003 तक मुंबई पुलिस ने करीब 1200 एनकाउंटर किए. मुंबई पुलिस के कई अधिकारी एनकाउंटर  स्पेशलिस्ट के तौर पर पहचाने गए. जैसे इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा के नाम 104 एनकाउंटर करने का तमगा है. उनका कहना था, ‘अपराधी गंदगी हैं और मैं सफाईकर्मी हूं.’ शर्मा को राम नारायण गुप्ता एनकाउंटर केस में 2009 में सस्पेंड किया गया था, बाद में 2013 में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया. इसी तरह सब इंस्पेक्टर दया नायक ने 83 एनकाउंटर किए, जिन पर ‘अब तक छप्पन’ फिल्म बनी थी. इंस्पेक्टर प्रफुल्ल भोंसले के नाम 77, इंस्पेक्टर रवींद्रनाथ अंग्रे के नाम 54, असिस्टेंट इंस्पेक्टर सचिन वाजे के नाम 63 और इंस्पेक्टर विजय सालस्कर के नाम 61 एनकाउंटर केस दर्ज हैं. इंस्पेक्टर विजय सालस्कर 2008 में मुंबई आतंकी हमले में मारे गए थे.
हालांकि बाद में न्याय की इस थ्योरी पर सवाल उठना शुरू हुआ. अदालतों ने इस पर नकारात्मक टिप्पणियां कीं. कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आईं कि पुलिसवालों ने अंडरवर्ल्ड से पैसे लेकर किसी व्यक्ति की फर्जी एनकाउंटर में हत्या की. एक मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ‘पुलिस अब जनता की रक्षक न होकर एक पेशेवर कातिल बन चुकी है.’ महाराष्ट्र में 2006 में हुए लखन भैया फर्जी मुठभेड़ मामले में 11 पुलिसकर्मियों को मुंबई सत्र अदालत ने जुलाई 2013 में दोषी करार दिया था.
हाल के वर्षों में रणवीर फर्जी एनकाउंटर मामला काफी चर्चित रहा था. जुलाई 2009 में गाजियाबाद का रणवीर, जो एमबीए का छात्र था, अपने अपने एक दोस्त के साथ नौकरी के लिए इंटरव्यू देने व घूमने के लिए देहरादून गया था. उत्तराखंड पुलिस ने उसे बदमाश बताकर देहरादून स्थित लाडपुर के जंगल में एनकाउंटर में मार गिराया. उत्तराखंड सरकार ने एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों को सम्मानित भी किया. रणवीर के शरीर में 29 गोलियों के निशान पाए गए, जिनमें से 17 गोलियां करीब से मारी गई थीं. बहुत हंगामे के बाद में राज्य सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपते हुए इसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया. सीबीआई जांच में पाया गया कि यह एनकाउंटर फर्जी था. जून 2014 में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 17 पुलिसकर्मियों को अपहरण, हत्या की साजिश और हत्या के जुर्म में उम्रकैद और एक पुलिसकर्मी को दो साल की सजा सुनाई.
राजस्थान पुलिस की एसओजी टीम ने अक्टूबर 2006 में एक संदिग्ध डकैत दारा सिंह को मार गिराया. पुलिस ने उस पर 25 हजार का इनाम रखा था. पुलिस ने दावा किया कि हत्या और स्मगलिंग के केस में बंद दारा सिंह ने हिरासत से भागने की कोशिश की तो एनकाउंटर में मारा गया. दारा सिंह की पत्नी सुशीला की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया. सीबीआई ने 2011 में जांच पूरी करके 16 लोगों के खिलाफ चार्जशीट तैयार की. इसमें तत्कालीन एडिशनल डीजीपी, एसपी, एडिशनल एसपी, सात सब इंस्पेक्टर और तीन कॉन्स्टेबल भी शामिल थे. इस केस की सुनवाई करते हुए जस्टिस मार्कंडेय काटजू और सीके प्रसाद की बेंच ने सभी आरोपियों की गिरफ्तारी का आदेश देते हुए कहा था, ‘पुलिस को कानून का संरक्षक माना जाता है और यह आशा की जाती है कि वह लोगों की जान की सुरक्षा करेगी, न कि उनकी जान ही ले लेगी. पुलिस द्वारा की जाने वाली फर्जी मुठभेड़ अमानवीय हत्या के अलावा कुछ नहीं है, जिसे रेयरेस्ट ऑफ द रेयर अपराध माना जाएगा. फर्जी मुठभेड़ों में संलिप्त पुलिसवालों को फांसी पर लटका देना चाहिए.’
गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान कई एनकाउंटर हुए जो विवादों में रहे. एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, 2002 से 2007 के बीच गुजरात में 31 फर्जी  एनकाउंटर हुए. फर्जी एनकाउंटर को लेकर गुजरात के कुल 32 पुलिस अधिकारी जेल गए, जिनमें से ज्यादातर अभी तक जेल में हैं. इन अधिकारियों में पांच आईपीएस अफसर भी शामिल हैं. हाल ही में गुजरात के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट, 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा नौ साल बाद गुजरात पहुंचे तो उनका भव्य स्वागत किया गया. वे 2007 में गिरफ्तार किए गए थे. 2015 में जमानत मिली, लेकिन सीबीआई कोर्ट ने उनके गुजरात में प्रवेश पर रोक लगा रखी थी. बाद में कोर्ट ने यह रोक हटा ली. वंजारा 2002 से 2005 तक अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस थे. इस दौरान राज्य में करीब बीस लोगों का एनकाउंटर हुआ. बाद में जब सीबीआई जांच हुई तो पता चला कि इनमें से कई एनकाउंटर फर्जी थे. वंजारा के बारे में कहा जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत करीबी थे. 2007 में गुजरात सीआईडी ने उन्हें गिरफ्तार किया और जेल भेजा. उन पर सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी, तुलसीराम प्रजापति, सादिक जमाल, इशरत जहां समेत आठ लोगों की हत्या का आरोप है. इन सभी एनकाउंटरों के बाद गुजरात क्राइम ब्रांच ने दावा किया था कि ये सभी पाकिस्तानी आतंकी थे और गुजरात के मुख्यमंत्री को मारना चाहते थे, लेकिन बाद में कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच में साबित हुआ कि ये सभी एनकाउंटर फर्जी थे.
इशरत जहां एनकाउंटर केस 15 जून, 2004 को अहमदाबाद में हुआ था. इसमें 19 वर्षीय इशरत के साथ जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लै, अमजद अली, अकबर अली राणा और जीशान जौहर मारे गए थे. इस मामले में पृथ्वीपाल पांडेय (पीपी पांडेय) व जीएल सिंघल समेत सात अधिकारियों को सीबीआई ने चार्जशीट में अभियुक्त बनाया था. बाद में जीएल सिंघल ने यह कहते हुए इस्तीफा भी दिया था कि सरकार उनका बचाव नहीं कर रही, जबकि उन्होंने क्राइम ब्रांच में रहते हुए जो भी किया, वह सब सरकार के दिशा-निर्देश पर किया.
पीपी पांडेय 1982 बैच के अधिकारी हैं जो 2003 में अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के मुखिया बने. उनकी अगुवाई में क्राइम ब्रांच ने 11 कथित आतंकियों को मुठभेड़ों में मार गिराया. इन मुठभेड़ों में कई के फर्जी होने के आरोप लगे. इनमें से इशरत जहां मुठभेड़ भी शामिल है. सीबीआई का दावा था कि पांडे ने इंटेलीजेंस ब्यूरो के अफसरों के साथ मिलकर इस कथित फर्जी मुठभेड़ की ‘साजिश’ रची. अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया. बाद में उन्होंने आत्मसमर्पण किया था. फरवरी 2016 में सीबीआई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद उन्हें फिर से बहाल करके अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) बनाया गया. अप्रैल में उन्हें गुजरात पुलिस का प्रभारी महानिदेशक बनाया गया.
हाल में पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई ने एक इंटरव्यू में कहा कि इशरत मामले में दूसरा हलफनामा गृह मंत्री पी चिदंबरम के कहने पर बदला गया था. इसी बीच गृह मंत्रालय के एक मौजूदा अधिकारी आरवीएस मणि ने आरोप लगाया कि इशरत मुठभेड़ के मामले में हलफनामा बदलवाने के लिए सतीश वर्मा ने उन पर दबाव बनाया और प्रताड़ित किया. गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी सतीश वर्मा इशरत जहां एनकाउंटर की जांच करने वाली कोर्ट की गठित उस एसआईटी के सदस्य थे. वर्मा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा, ‘ये पूरा आईबी नियंत्रित ऑपरेशन था. चार लोगों को पकड़ा गया. इनमें से दो के बारे में आईबी को जानकारी थी कि वे संभवत: लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य थे. इन सभी पर आईबी और गुजरात पुलिस की नजर थी और फिर ये लोग कथित मुठभेड़ में मार दिए गए. ये पूरा ऑपरेशन बड़ा कामयाब था. लेकिन साथ ही फर्जी भी था.’
26 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस हुआ. सोहराबुद्दीन शेख पर हत्या, उगाही करने और अवैध हथियारों का धंधा चलाने जैसे 60 आपराधिक मामले चल रहे थे. 23 नवंबर को वह अपनी बीवी कौसर बी के साथ हैदराबाद से महाराष्ट्र जा रहा था तभी गुजरात एटीएस ने दोनों को उठा लिया. तीन दिन बाद पुलिस हिरासत में ही सोहराबुद्दीन का एनकाउंटर कर दिया गया. आरोप है कि कौसर बी को भी मारकर अधिकारी डीजी वंजारा के गांव में दफना दिया गया. इस घटना के करीब एक साल बाद सोहराबुद्दीन के सहयोगी तुलसी प्रजापति का भी एनकाउंटर हो गया. इस एनकाउंटर को लेकर भाजपा नेता और गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह पर आरोप लगे कि यह एनकाउंटर उनके कहने पर किया गया है. अमित शाह को जेल भी जाना पड़ा था. इन मुठभेड़ों में जेल जाने वाले वंजारा ने भी दावा किया था कि ‘गृहमंत्री अमित शाह ने कई लोगों के एनकाउंटर का आदेश दिया था.’ 2014 में विशेष कोर्ट ने अमित शाह के खिलाफ आरोप खारिज कर दिए.
सितंबर 2008 में दिल्ली के बाटला हाउस में पुलिस ने दो संदिग्ध आतंकियों को मारने का दावा किया. दो आतंकी पकड़े गए थे और एक भागने में सफल रहा था. इस मुठभेड़ में एक इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा भी मारे गए. जामा मस्जिद के शाही इमाम समेत मानवाधिकार संगठनों से इस एनकाउंटर को फर्जी बताया और जांच की मांग की. हालांकि, जांच के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अाैर अदालत ने फर्जी एनकाउंटर के आरोप को खाारिज कर दिया.
हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ में कई ऐसे मामले सामने आए जब पुलिस-नक्सल मुठभेड़ को लेकर सवाल उठे. पुलिस का दावा है कि उसने नक्सली मारे लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पुलिस ग्रामीण आदिवासियों को नक्सली बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार रही है. कुछ दिनों पहले प्रदेश कांग्रेस ने जनाक्रोश रैली की जो इसी मसले पर थी. इस रैली में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने कहा, ‘चिड़िया मारने वाली बंदूक रखने वाले आदिवासियों को 5 से 10 लाख तक का इनामी नक्सली बताकर पुलिस झूठी मुठभेड़ में उन्हें मार रही है. पुलिस को नक्सलियों को मारना ही है तो पहले ऐसे आरोपियों के नाम और पहचान की सूची उजागर करे जो सभी थानों में सहज सुलभ हो. बस्तर में फर्जी मुठभेड़ का खेल खेलकर पुलिस झूठी वाहवाही ले रही है. बेकसूर आदिवासियों को या तो जेल में ठूंसा जा रहा है या मार दिया जाता है.’
उत्तर प्रदेश पुलिस में अतिरिक्त महानिदेशक रह चुके एसआर दारापुरी कहते हैं, ‘राजनीति में अपराधी तत्वों का बढ़ता प्रभाव कथित फर्जी मुठभेड़ों के पीछे एक बड़ा कारण है. जो राजनेता सत्ता में हैं, उनके लिए काम करने वाले अपराधियों को संरक्षण मिलता है जबकि उनके विरोधियों के लिए काम करने वाले अपराधियों को खत्म करने के लिए पुलिस को औजार बनाया जाता है. कई मामलों में पुलिस सत्तारूढ़ राजनेताओं को खुश करने के लिए, पदोन्नति और शौर्य पदकों के लिए भी ऐसी कार्रवाइयां करती है.’
जब अपराधियों को सजा देने के लिए पुलिस, कानून और अदालतें मौजूद हैं तो किसी को कानून से परे जाकर मारने की प्रक्रिया क्यों अपनाई जाती है, इसके जवाब में पूर्व अधिकारी प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘फर्जी एनकाउंटर के मामले इसलिए होते हैं कि सारा समाज चाहता है कि इस तरह के एनकाउंटर हों. आपको सुनकर अजीब लगेगा, लेकिन सारा समाज चाहता है. उसका कारण यह है कि समाज में कुछ ऐसे अराजक तत्व या जघन्य अपराधी हैं जिनको कानून नहीं पकड़ पाता है. अगर पकड़ता भी है तो जमानत हो जाती है. मुकदमे 20 साल चलते हैं. तब तक गवाह टूट जाते हैं. लोग कहते हैं कि इनको मारो और खत्म करो. नेता चुपचाप पुलिस के कान में कहता है कि मारो और खत्म करो. जनता भी कहती है कि वाह-वाह, जान छूटी. ऐसे बदमाश से छुट्टी मिली. मुख्य कारण तो यह है कि लोग चाहते हैं और खुलकर कोई नहीं कहता है. दूसरे, हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम इतना विलंब से काम करता है, कछुए की चाल चलता है कि इस तरह की कार्रवाई को सामाजिक मान्यता मिली हुई है. अब आप कह रहे हैं कि इसकी वजह से कई निर्दोष लोग मारे जाते हैं, यह भी सही है. जब आप इस तरह की छूट दीजिएगा तो जाहिर है कि पुलिस इसका दुरुपयोग करेगी और करती भी है.’
रिहाई मंच संगठन से जुड़े वकील मोहम्मद शोएब कहते हैं, ‘कानून फर्जी एनकाउंटर की इजाजत बिल्कुल नहीं देता है. पुलिस एनकाउंटर के मसले में किसी भी तरह से नियमों का पालन नहीं करती है. पुलिस को ऐसा कोई अधिकार ही नहीं है. हां, पुलिस को अगर अपनी जान का खतरा है तो वह किसी को मार सकती है. लेकिन जानबूझकर किसी को मारा जाए, तो यह कानूनन गलत है. जिस व्यक्ति से उनको जान का खतरा नहीं है, उसे भी मार देना गलत है. ज्यादातर एनकाउंटर में पुलिस लोगों को पहले से पकड़ती है, बाद में मार देती है और उसे दिखाती है कि यह एनकाउंटर में मारा गया. एनकाउंटर के बाद उस मसले की जांच तभी होती है जब कोई शिकायत आती है, वरना तो पुलिस के दावे को ही मान लिया जाता है. पुलिस कहती है कि फलां आदमी मुठभेड़ में मारा गया, और इसे ही सच मान लिया जाता है. फर्जी एनकाउंटर के बाद भी अगर कोई इस मसले को उठाता है तो उसे इतना डरा दिया जाता है कि वह चुपचाप बैठ जाए.’
प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘इसका एक ही उपाय है कि आपका क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम इतना प्रभावशाली हो कि जघन्य अपराध में भी एक आदमी को दो साल में सजा हो जाए. 20 साल न चले मुकदमा, इसका और कोई उपाय नहीं है. इसके लिए पुलिस सुधार चाहिए. न्यायिक व्यवस्था में सुधार चाहिए. जमानत के प्रावधानों में सुधार चाहिए. मामलों का जल्दी से निस्तारण हो. चार्जशीट 60 दिन में फाइल हो जाती है. दो साल में मामले का निस्तारण हो जाना चाहिए. अभी तो लोगों को सिस्टम में विश्वास ही नहीं है कि आदमी पकड़ा तो गया, लेकिन उसको सजा कहां होगी. शहाबुद्दीन ज्वलंत उदाहरण हैं. उन्होंने जेएनयू के प्रेसिडेंट चंद्रशेखर की हत्या करवा दी. अभी तक उन्हें कोई दंड नहीं मिला, उल्टा वे पार्टी की नेशनल एक्जिक्यूटिव के सदस्य हो गए. इसका मतलब उनको राजनीतिक संरक्षण हासिल है. न्यायिक तंत्र से सजा भी नहीं हो पाती है. ऐसे लोगों के लिए क्या उपाय है. हर कोई यही चाहेगा कि ऐसे लोग न रहें तो अच्छा है. समाज के पाप और व्यवस्था के निकम्मेपन की गठरी पुलिस अपने सर पर ढोती है.’
(तहलका, 30 अप्रैल, 2016 के अंक में प्रकाशित)

पत्रकारों की स्वामिभक्ति और उनकी हत्याएं

मीडिया में अब संपादक नहीं हैं. कुछ एक संस्थानों को छोड़ दें तो संपादक का पद ही खत्म हो गया है. मैं अपने सात साल के कॅरियर में दो-एक ही ऐसे लोगों को जानता हूं जो संपादकीय कुर्सी पर बैठकर अपने सहकर्मियों का साथ देते हैं. ज्यादातर मीडिया घरानों में सीईओ नाम का कॉरपोरेट दलाल बैठा है. पत्रकार फील्ड में रिपोर्टिंग करते हुए कहीं फंस जाए तो ये उसका साथ देने की जगह कह देते हैं कि यह हमारा नहीं है. पत्रकार अपना खून पसीना बहाए अखबार के लिए और उसके मरने पर अखबार या चैनल उसे अपना कहने से इनकार कर देते हैं. इसके बावजूद पत्रकार कभी संस्थानों पर सवाल नहीं उठाते क्योंकि उन्हें किसी भी सूरत में नौकरी प्रिय है.
छत्तीसगढ़ में सबसे बुरे हालात हैं. जीन्यूज, प्रभात खबर, नवभारत, भास्कर और दूसरे संस्थान अपने पत्रकारों को फंसने पर या तो पहचानने से इनकार कर चुके हैं, या फिर उनको नौकरी से हटा चुके हैं. छत्तीसगढ़ सरकार ने दर्जनों पत्रकारों पर फर्जी मुकदमें दर्ज कर चुकी है. चार पत्रकार जेल के अंदर हैं. छह फरार हैं. 2012 से अब तक वहां छह पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. वहां जो भी पत्रकार कॉरपोरेट या सरकार पर सवाल करता है, उसे पुलिस अधिकारी धमकाते हैं, फर्जी मामले बनाकर जेल में ठूंस देते हैं.
हाल में बिहार, झारखंड, यूपी में पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. सरकारें चाहती हैं कि पत्रकार उनके पीआर के रूप में काम करे. नेता चाहते हैं कि पत्रकार उनके गुर्गे के रूप में काम करे. हर पार्टी अपना सुधीर चौधरी चाहती है. पत्रकारों ने पार्टियों को ऐसा करने दिया है. एक दो अपवाद छोड़कर कोई मीडिया संस्थान अपने पत्रकार को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने देना चाहता. पत्रकार यूनियन बनाने से कतराते हैं. वे वैसे ही काम करते हैं जैसा उनका मालिक चाहता है. उनकी स्वामिभक्ति उनकी मौतों में तब्दील हो रही है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. पत्रकार संगठित नहीं होते. वे खुद अपने साथियों की जड़ें खोदने में लगे रहते हैं.
पत्रकारों को यह नहीं दिखता कि देश भर में वकीलों या डॉक्टरों के साथ शोषण या अन्याय की संस्थानिक हरकतें संभव नहीं है. एक वकील या डॉक्टर को कोई छू दे तो उनका बार काउंसिल और मेडिकल काउंसिल खटिया खड़ी कर देता है. पत्रकार अपनी स्वानवृत्ति के कारण लात खा रहे हैं. मार्केंडेय काटजू ने कहा, मीडिया का रेग्युलेशन होना चाहिए, इससे सुरक्षा और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित होती, पर पत्रकारों ने ही मालिकों की तरफ से उनका मुंह नोच लिया था. यह कहने के लिए मुझे माफ करें कि आप मर रहे हैं क्योंकि आप पहले से ही मुर्दा हैं.
यहां की जनता भी अनोखी है. आप देखिए कि नागरिक स्वतंत्रताओं पर सरकारें कितने भी हमले करें, जनता को परेशानी नहीं होती. जनता सरकार की तरफ से गाली गलौज करती है, वह सरकार पर सवाल नहीं उठाती. गुलामी का यह चरम दौर है. एक पत्रकार बिहार में मारा गया, तो लोग कहते हैं कि वहां जंगलराज आ गया. झारखंड के बारे लोग ऐसा नहीं कह रहे. यूपी में एक पत्रकार को जिंदा जला दिया गया था. छत्तीसगढ़ में 6 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है, चार जेल में बंद हैं. दर्जनों पर या तो मुकदमा है. उसे कोई जंगलराज क्यों नहीं कहता? लोग हर एक घटना के बाद यह साबित करने में लग जाते हैं कि बिहार में जंगलराज है. यह सही है कि बिहार सबसे बेहतर प्रशासन वाला प्रदेश नहीं है. लेकिन अगर छत्तीसगढ़ में कोई जंगलराज नहीं मानता, अगर झारखंड में कोई जंगलराज नहीं मानता, तो बिहार में हर घटना के बाद जंगलराज कैसे आ जाता है? अगर हजारों करोड़ के तीन घोटाले और करीब 60 हत्या करवाने वाले मध्यप्रदेश में जंगलराज नहीं है तो बिहार में कैसे जंगलराज हो गया? क्या अपराध के मामले में बिहार सर्वोच्च पायदान पर है? क्या जंगलराज की बात इसलिए कही जाती है कि बिहार की सत्ता में लालू हैं और जंगलराज का जुमला उनसे चिपका हुआ है? बिहार की यह प्रोफाइलिंग किस आधार पर की जाती है?
जनता अब जनता नहीं है. वह राजनीतिक दलों की कार्यकर्ता भर है. यहां किसी की भी मौत का सिर्फ राजनीतिक महत्व है.