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एक था चंदू

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कन्हैया कुमार जेएनयू छात्रसंघ से निकले पहले नेता नहीं हैं, जिनमें कुछ लोग बेहतर राजनीतिक संभावनाएं देख रहे हैं. उनसे पहले इसी छात्रसंघ ने चंद्रशेखर जैसा युवा पैदा किया था, जिसे देश की अापराधिक राजनीति लील गई.




दुनिया में वामपंथ का सबसे मजबूत किला ढह चुका था. दुनिया तेजी से पूंजीवाद की ओर बढ़ रही थी.
उदारीकरण भारत की दहलीज लांघकर अपने को स्थापित कर चुका था. तमाम धुर वामपंथी आवाजें मार्क्सवाद के खात्मे की बात कह रही थीं. उसी दौर की बात है, जब जेएनयू कैंपस में एक युवा छात्रनेता अपने साथियाें से कह रहा था, ‘हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी जिनको बचाने की बात हम सड़कों पर करते हैं. अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की महत्वाकांक्षा होगी, न कि जेएनयू से इलेक्शन में गांठ जोड़कर चुनाव जीतने और हारने की महत्वाकांक्षा होगी.’ दबी हुई आवाजों को बचाने की अलख जगाने वाले इस युवक का नाम था चंद्रशेखर, जिसे उसके दोस्त प्यार से कॉमरेड चंदू कहा करते थे. जो लोग चंदू को नहीं जानते, उनके मन में सवाल उठेगा कि वे आजकल कहां हैं? जवाब है कि वे भगत सिं…