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January, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संघ परिवार का सुभाष प्रेम

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इंडियन आर्मी जब भारत की ओर कूच करने वाली थी, उसके पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने रंगून में रेडियो पर भाषण दिया था. इस भाषण में उन्होंने गांधीजी को 'फादर ऑफ नेशन' यानी राष्ट्रपिता बताया था और आईएनए के सैनिकों से कहा था कि जब भी आप भारत की सीमा में दाखिल होंगे, आपका 'कमांडर इन चीफ' मैं नहीं रहूंगा, बल्कि गांधीजी रहेंगे.
गांधी और सुभाष 36 का आंकड़ा था. घनघोर विरोध के बावजूद नेताजी, गांधी जी को फादर आॅफ नेशन बोल रहे थे. आज आप सरकार आलोचना करने पर राष्ट्रद्रोही करार दिए जाते हैं और प्रताड़ना झेलते हैं.
संघ परिवार को सुभाष बाबू तो कभी मिले नहीं, लेकिन सर्वसुलभ गांधी मिले जिनकी उन्होंने हत्या कर दी. तिरंगे को नकार दिया. संविधान को नकार दिया. आजादी को नकार दिया. उन्होंने भगवा झंडा और हिंदू राष्ट्र मांगा. यह हुज्जत आजादी की लड़ाई में नाखून तक न कटवाने के बावजूद थी. जिन्ना की मुस्लिम लीग को मुस्लिम राष्ट्र चाहिए था, सावरकर और गोलवलकर के संघ को हिंदू राष्ट्र चाहिए था. नास्तिक जिन्ना ने मुसलमानों को मुस्लिम राष्ट्र के लिए बहकाया. नास्तिक सावरकर ने हिंदू राष्ट्र की थ्योरी दी. जिन्…

विरासत के विरुद्ध फूहड़ अभियान

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पिछले कुछ महीनों में राष्‍ट्रवादी फैक्‍ट्री के फूहड़ सिपाहियों ने जवाहर लाल नेहरू के कुछ पत्र जारी किए. हाल में सुभाष चंद्र बोस के बहाने नेहरू पर फिर अनाप शनाप कोशिश की गई. होता यह है कि भाई लोग फोटोशॉप पर एक पुराना पत्र तैयार करते हैं कि यह नेहरू का है. लेकिन हर बार पकड़े जाते हैं.
नेहरू बुरा प्रधानमंत्री हो सकता है, लेकिन वह भारत का निर्माता है. नेहरू नीतिगत गलतियां कर सकता है, भारत में संसदीय परंपरा की पहली ईंट रखने वाला व्‍यक्ति है. नेहरू को हम नापसंद कर सकते हैं, लेकिन वह योग्‍य अौर पढ़ा लिखा था. राजनीति के शीर्ष पर होकर भी उसने कई अमूल्‍य किताबें लिखीं. नेहरू की कोई एक किताब मूल्‍य के स्‍तर पर राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के नब्‍बे साल के साहित्‍य से श्रेष्‍ठ साबित होती हैं. क्‍योंकि विविधता, लोकतंत्र, उदारता, बराबरी आदि मूल्‍यों की वाहक हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने भी एक किताब लिखी है जिसमें वे कहते हैं कि मैला ढोने वालों को ऐसा करके आध्‍यात्मिक सुख मिलता है.
हो सकता है कि नेहरू मूर्ख भी रहे हों, लेकिन उन्‍होंने तक्षशिला को बिहार में कभी नहीं ला पटका, न ही पूरे देश को झूठ के समन्‍दर…

देशभक्ति की खूंखार कसौटी

कुछ दिन पहले किसी मूर्ख हिंदू नामधारी ने इस्‍लाम पर कुछ सिरफिरी टिप्‍पणी कर दी. चूंकि इस्‍लाम के अनुयायियों में मूर्खों की संख्‍या सर्वाधिक है, इसलिए उन्‍होंने आसमान सर पर उठा लिया. एक गुमनाम मूरख को चर्चा में ला दिया. उनका अल्‍लाह इतना कमजोर है कि किसी सिरफिरे की टिप्‍पणी पर आहत हो जाता है और पूरा इस्‍लाम खतरे में पड़ जाता है. दुख की बात है कि जितने धर्म जरा-जरा सी बात पर खतरे में आ जाते हैं, वे मिट नहीं रहे हैं. यह बड़े अफसोस की बात है.
तो उस टिप्‍पणी पर इस्‍लाम को खतरे में मानकर मुल्‍लों ने ऐतिहासिक रूप से भीड़ बटोरी और शहर-शहर प्रदर्शन किया. मालदा में आगजनी और तोड़फोड़ की. यह संघियों से मुसंघियों के गठबंधन का नतीजा है. ये दोनों आपस में एक हैं. एक-दूसरे को जहर उगलने का पूरा बहाना देते हैं. इस प्रदर्शन से संघियों को यह कहने का बहाना मिला कि उन बेचारों के साथ बड़ा भेदभाव होता है. प्रदर्शन या तोड़फोड़ करने वालों को फांसी दिए बगैर उनकी दंगाई हरकतों की आलोचना कैसे की जा सकती है?
अगर मालदा में तोड़फोड़ हुई और उसके लिए किसी को फांसी नहीं हुई, तो संघियों द्वारा सरकार प्रायोजित हत्‍याएं भ…