शनिवार, 21 नवंबर 2015

वंशवाद: भारतीय राजनीति का डीएनए

बिहार में लालू यादव के दो पुत्रों का विधानसभा में प्लेसमेंट हुआ तो सोशल मीडिया पर अभूतपूर्व शोर मच गया. खासकर भाजपा और उसके समर्थकों की ओर से कहा गया कि अब बिहार बर्बाद हो जाएगा. यह चिंता आज की नहीं है और बिल्कुल जायज है. बरसों से विशेषज्ञों द्वारा यह चिंता जताई जा रही है कि भारतीय राजनीति कुछ परिवारों की गिरवी हुई जा रही है. कांग्रेस पार्टी मूलत: वंशवाद की वाहक है, जहां आज भी राहुल से आगे उस पार्टी में कुछ दिखाई नहीं देता. वंशवाद के मसले पर भाजपा कांग्रेस पर सबसे ज्यादा हमले करती है तो यह देखना चाहिए कि क्या भाजपा वंशवाद से मुक्त है?

भाजपा के लोग अपने बारे में दावा करते हैं कि उनकी पा​र्टी में परिवारवाद नहीं है और वे बेहद लोकतांत्रिक हैं. उनकी पार्टी में रहते हुए कोई भी व्यक्ति सामान्य कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री पद तक जा सकता है. लोकसभा चुनाव में मोदी ने कांग्रेस की वंशवाद की कमजोर नस पकड़ी और इस मसले पर कांग्रेस पर खूब जमकर हमले किए. लेकिन बिहार चुनाव में वंशवाद चुनावी मुद्दा नहीं रहा, जबकि पूरा चुनाव लालू बनाम मोदी लड़ा गया. क्या ऐसा इसलिए था कि राजग गठबंधन में कई चेहरे ऐसे थे जो परिवारिक पृष्ठभूमि के कारण चुनाव लड़ रहे थे?

लालू यादव के दो बेटों के मंत्रिमंडल में दाखिल होने के जितना हल्ला मचा तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सिर्फ लालू यादव के परिवार की शिक्षा या परिवारवादी राजनीति पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? किसी और नेता के बेटों के राजनीति में दाखिल होने पर इतने ही सवाल क्यों नहीं उठे?

भाजपा के वंशवाद का विरोध करने की जमीनी हकीकत यह है कि वह खुद भी वंशवाद की गिरफ्त में है और बाकी दलों को पीछे छोड़ती ऩजर आ रही है. मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी उसी कांग्रेसी परिवारवाद से निकले हैं, जिससे कांग्रेस के राहुल गांधी निकले हैं. यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा, कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह, राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, विजयाराजे सिंधिया की बेटियां वसुंधरा और यशोधरा, वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत, रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह, प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर, मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हैं.

कांग्रेसी नेता भगवत झा आज़ाद के पुत्र कीर्ति आज़ाद भाजपा में ही हैं. लालू के बेटे तेजस्वी यादव की तरह वे भी क्रिकेटर से नेता बने. भाजपा के दिवंगत नेताओं के पुत्र-पुत्रियों को भी उनके रहते या बाद में राजनीति में उतारा गया है. मध्य प्रदेश में दिलीप सिंह भूरिया की पु​त्री निर्मला भूरिया, महाराष्ट्र में दिवंगत प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन, गोपीनाथ मुण्डे की पुत्रियां पंकजा मुण्डे और प्रीतम मुंडे को सक्रिय राजनीति में भागीदारी और पद मिले हैं. दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा के सुपुत्र प्रवेश वर्मा भी सांसद हैं. भाजपा की ओर से दिवंगत नेताओं की पत्नियों को भी बिना किसी राजनीतिक अनुभव या योग्यता के चुनाव लड़ाया जा रहा है. सरदार सदाशिव राव महादिक की ​बेटी गायत्री राजे महादिक, जो दिवंगत तुकोजीराव की पत्नी हैं, इसका ताजा उदाहरण है.

जिस बिहार में लालू को परिवारवाद के लिए कोसा जा रहा है, उसी बिहार में भाजपा के तीन सांसद पुत्रों को टिकट दिया. डॉ. सी. पी. ठाकुर के पुत्र विवेक ठाकुर, अश्विनी चौबे के पुत्र अर्जित शाश्वत और हुकुमदेव नारायण यादव के पुत्र अशोक कुमार यादव  को बिहार विधानसभा में चुनाव में उतारा गया. चारा घोटाले में दोषी ठहराए जा चुके जगन्नाथ मिश्र के बेटे नितीश मिश्र भी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े.

भाजपा की सहयोगी पार्टी हम के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी के पुत्र राजेश चौधरी खगड़िया से चुनाव लड़े और 25 हजार मतों से हार गए. हम के मुखिया जीतनराम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन कुटुंबा सुरक्षित सीट से चुनावी मैदान में थे, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राजेश कुमार ने उन्हें पराजित कर दिया. हम के कद्दावर नेता नरेंद्र सिंह के पुत्र अजय प्रताप को भाजपा ने जमुई से प्रत्याशी बनाया था, वे चुनाव हार गए. उनके दूसरे पुत्र सुमित कुमार को चिराग पासवान के विरोध के कारण जमुई से टिकट नहीं मिला तो सुमित ने चकाई से निर्दलीय चुनाव लड़ा और वे भी हार गए. भाजपा की सहयोगी पार्टी लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के सुपुत्र चिराग पासवान सांसद हैं.

भाजपा की दूसरी सहयोगी पार्टी लोजपा की हालत से कौन परिचित नहीं है. राम विलास पासवान के भाई पशुपति कुमार पारस इसी चुनाव में अलौली से चुनाव लड़े और हारे. लोजपा सांसद रामचंद्र पासवान के पुत्र प्रिंस राज कल्याणपुर सीट से पहली बार चुनावी मैदान में थे, हालांकि जनता ने उन्हें भी नकार दिया. लोजपा ने खगड़िया से सांसद चौधरी महबूब अली कैसर के पुत्र मुहम्मद यूसुफ सलाउद्दीन को मैदान में उतारा और वे 37 हजार मतों के अंतर से चुनाव हार गए. जदयू के शिवानंद तिवारी के बेटे राहुल तिवारी शाहपुर से चुनाव लड़े और जीते.

हाल ही में मोदी के भाई के साले को गुजरात नगरीय निकाय चुनाव में टिकट दिया गया जिस पर काफी घमासान मचा था. इसी चुनाव में तमाम भाजपाई नेताओं के परिजनों को टिकट मिले थे, जिसे अन्य दलों ने चुनावी मुद्दा बनाया था.

मोदी जी ने लोकसभा चुनाव के बाद राज्यों के चुनाव में भी परिवारवाद को मुद्दा बनाया, लेकिन महाराष्ट्र और कश्मीर में भाजपा उसी परिवारवाद की नाव पर सवार होकर सत्ता के समंदर में सैर कर रही है. कश्मीर में मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती की पार्टी उनकी सहयोगी है तो महाराष्ट्र में तीन पीढ़ियों वाली शिवसेना उनकी सहयोगी है.

पंजाब में भाजपा की सहयोगी पार्टी है अकादी दल, जिसके प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री हैं, बेटे को उन्होंने उपमुख्यमंत्री बना रखा है, उनकी बहु केंद्र में मंत्री हैं, दामाद को भी उन्होंने राज्यमंत्री बना रखा है और बेटे के साले को मंत्री पद नवा़जा है. देश में इतने मंत्री पद वाला दूसरा परिवार फिलहाल नहीं है, भले ही लालू पर हल्ला ज्यादा मचा हो.

भाजपा के पितामह अटल बिहारी वाजपेयी भी के दत्तक दमाद रंजन भट्टाचार्य का उनके कार्यकाल में पीएमओ में जो जलवा रह चुका है, वह किसे नहीं याद होगा. रंजन भट्टाचार्य अटल बिहारी वाजपेयी की मित्र राजकुमारी कौल के दामाद थे. अटल जी के समय में कहा जाता था कि राजग सरकार में असल सत्ता उन्हीं के हाथ में थी. लेकिन राजग सरकार के जाते ही वे भी गायब हो गए. बाद में उनका नाम नीरा राडिया टेप कांड में उछला. टेप में वे कहते सुने गए कि 'मुकेश भाई (मुकेश अंबानी) ने मुझसे कहा, कांग्रेस तो अपनी दुकान है.' ये बातचीत यूपीए-2 की सरकार में मंत्री तय करने के मामले में थी जिसमें वे नीरा राडिया को आश्वस्त कर रहे थे कि कांग्रेस में अपनी पैठ के चलते दयानिधि मारन को टेलीकॉम मंत्री नहीं बनने देंगे. सियासी गलियारे में उनकी हनक वंशवाद के बदौलत ही संभव हुई.

लोकतंत्र में राजनीति को कुछ परिवारों की पुश्तैनी धरोहर नहीं होना चाहिए. लेकिन इससे मुक्त होने की शुरुआत कौन करेगा? यूपी में मुलायम के परिवार 18 सदस्य हैं जो सांसद, मंत्री, विधायक अथवा अन्य पदों पर काबिज हैं. लालू इससे अलग नहीं हैं. अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाकर और अब अपने बेटो—​बेटियों को लाकर उन्होंने भी यह साबित किया. दिलचस्प है कि लालू—मुलायम आपस में समधी भी हैं.

वंशवाद भारतीय राजनीति में घुन की तरह लगा है. यह सवाल बेहद जरूरी है लेकिन यह सवाल अगर सबसे नहीं किए जाएंगे तो उस चुनिंदा शोर पर भी सवाल उठने चाहिए.

देश में कौन सी पार्टी है जिस पर आप संतोष जता सकते हैं? कम्युनिष्ट पार्टियों को छोड़ कर सभी पर्टियां व्यक्ति या परिवार केंद्रित हैं. भाजपा का मतलब आज सिर्फ नरेंद्र मोदी रह गया है और कांग्रेस का मतलब है सिर्फ गांधी परिवार. बाकी पार्टियों पर गौर करें—  राजद (लालू परिवार), सपा (मुलायम परिवार), अकाली दल (बादल परिवार) नेशनल काँफ्रेंस (अब्दुल्ला परिवार), लोकदल (चौटाला परिवार), एनसीपी (पवार परिवार), डीएमके (करुणानिधि परिवार), बसपा (मायावती) आम आदमी पार्टी (केजरीवाल), जेडी-यू (नीतीश कुमार), शिव सेना (उद्धव ठाकरे), एमएनएस (राज ठाकरे), एआईडीएमके (जयललिता) बीजू जनता दल (नवीन पटनायक) तेलगुदेशम (चन्द्र बाबू नाइडू) एआईएमएम (ओवैसी) टीसीआर (आरसी राव) तृणमूल काँग्रेस (ममता बनर्जी). इनमें से आप किसके परिवारवाद या व्यक्तिवाद के समर्थन में खड़े होंगे और क्यों? बाकी भाजपा जब वंशवाद का विरोध करती है तो बड़ा ही अश्लील लगता है.