मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

भक्तों के नाम खत

प्रिय भक्तों!
आप लोगों से इतनी गालियां खा चुका हूं कि अब आप सब पर गुस्सा आना बंद हो गया है. गीता और महात्मा गांधी की प्रेरणा से मेरा हृदय परिवर्तन हो गया है. मैं स्थि​तप्रज्ञ हो गया हूं. ऐसा इसलिए क्योंकि आप क्रोध के नहीं, आप प्रेम और दया के पात्र हैं. दरअसल, हमको पढ़े लिखे युवा भारत से उम्मीदें ज्यादा थीं. जिस देश का नायक भगत सिंह जैसा 23 साल का युवा हो, जो अपने आदर्शों और अपनी जनता के लिए जानबूझ कर फांसी चढ़ गया, उस देश के युवाओं से यह उम्मीद ज्यादा नहीं है कि वह हमेशा मानवीय मूल्यों और मानवता के पक्ष में खड़ा हो. यह उम्मीद ज्यादा नहीं है कि आपने जो सरकार चुनी है, यदि वह आपकी उम्मीदों पर पानी फेरकर सिर्फ पोलिटिकल स्टंट करती हो तो आप उस पर सवाल उठाकर दबाव बनाएं.

लेकिन अब भरोसा हो गया है कि इस देश का युवा फिलहाल सवाल उठाने वाले को गरियाता है. उसकी नजर में लोकतंत्र, न्याय, समता, सौहार्द, स्वतंत्रता, सेक्युलरिज्म, मुलायम सिंह और ओवैसी पर्यायवाची हैं. वह इन सबको समान भाव से गरियाता है. इसके उलट योगी, साक्षी, संगीत सोम, साध्वी आदि के लिए वह रख सकता है. यह साइकिल एक्सीडेंट की शक्ल में सभ्यता का ध्वंस है कि जिन मूल्यों के लिए लाखों जानें गंवाकर भी हमारा देश टिका रहा था, वे सब हमारे लिए गाली हो गए हैं.

एक डेढ़ साल गाली खाने का अनुभव यह रहा कि जब गालियां देते समय आप हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी, अवधी कुछ भी ठीक से लिख नहीं पाते तो आप पर गुस्सा होना मूर्खता है. अब इसके आगे क्या बचता है! आपसे लोकतंत्र, न्याय, समानता, सेक्युलरिज्म आदि विषयों पर अच्छी समझ की उम्मीद करना संपोले में रीढ़ की हड्डी तलाशना है.

वैसे आपको दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि बहुत बड़ी जनसंख्या ऐसी भी है जो कहने को पढ़ी लिखी है लेकिन उसका आईक्यू आपसे भी कम है. कोई अमेरिका से पढ़कर लौटे और योगी आदित्यनाथ का समर्थक हो जाए तो उसका आईक्यू आदित्यनाथ से भी बदतर है, इसमें कोई शक नहीं. आपके नायक यदि आपसे भी घटिया हैं तो आपको बिना शर्माए अपने आदर्शों पर पुनर्विचार ​कर लेना चाहिए.

तो आपके साथ वे पढ़े लिखे साधू सधुआइन छाप लोग भी दुखी और क्षुब्ध लेखकों को गरिया रहे हैं. लेखकों का कोई बयान पढ़ने की बजाय, उनसे बात करने की बजाय, उनका लिखा पढ़ा कुछ देखने की बजाय, वे विषवमन पर आमादा हैं. आरोप भी कैसे कैसे? अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश सुर्खियां पाने के लिए ऐसा कर रहे हैं. आप ही कहते हैं कि इनको कौन जानता है, इनके ऐसा करने से क्या फर्क पड़ता है, तो उनके पुरस्कार लौटाने से चर्चा भी कौन करेगा? तब उनके बहिष्कार से आपके अखंड आततायी निजाम का क्या उखड़ने वाला है? खैर...

मामला यह है कि इस देश को गुलामी की आदत नहीं गई है. एक आदमी अगर यह एहसास करा दे कि मैं तुम पर जुल्म करता रह सकता हूं और तुम मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकते तो दंडवत हो जाना मोक्ष पा लेने जैसा है. असहमति के लिए विवेक और साहस चाहिए होता है. आपमें इनकी अनुपस्थिति आपकी शर्म का बायस नहीं है.

असली बात यही है कि आंख का पानी मर गया है और अब शर्म नहीं है. आपको तो एक भी लेखक नाम न मालूम होने की शर्म नहीं. उसने कब लिखना शुरू किया, क्या क्या लिखा, कब पुरस्कार मिला, आदि नहीं मालूम होने की भी शर्म नहीं. चौरासी हुआ था तो गुजरात और मुजफ्फरनगर भी होना चाहिए, ऐसे तर्क देने पर भी शर्म नहीं. हत्या और उन्माद की सियासत पर शर्म नहीं. धर्मांध होकर देश की विरासत पर गोबर कर देने पर भी शर्म नहीं. किसी को भी गरियाने पर भी शर्म नहीं. आपको ​किसी राजनीतिक हत्या पर शर्म नहीं. आपको हत्या के बाद हत्या को सरकारी ​तमगा मिलने की भी शर्म नहीं. और तो और, अपने मूर्ख होने पर भी शर्म नहीं.

आपको सिर्फ अपनी मूर्खता, अपने गोबरनुमा झूठ के पहाड़ और बर्बर नेतृत्व पर गर्व है. अच्छा है. ऐसी सोच का नेतृत्व आततायी ही हो सकता है. उसका असली प्रतिनिधि कोई धर्म और राजनीति के बीच लटका लंपट साधु संत ही हो सकता है. ऐसे देश का नेता कोई तड़ीपार ही हो सकता है. साठ साल के आजाद भारत के मुसलसल पतन पर आपको गर्व है, तो यह पतन और गर्व दोनों मुबारक! आपको सिर्फ कांग्रेस या भाजपा में से एक को श्रेष्ठ साबित करना है और उनकी निकृष्ट सियासी प्रतियोगिता में शामिल होने पर गर्व है तो आपको यह प्रतियोगिता मुबारक!

लेकिन मेरे भाई, कोई दुखी या क्षुब्द होना चाहता है तो उसे हो जाने दो. बड़ा एहसान होगा.

आपका
एक अदना सा अवसादग्रस्त

1 टिप्पणी:

अजय कुमार झा ने कहा…

एक अदना सा अवसादग्रस्त..........आपने सत्य लिखा मित्र ..हमें भी पढ़ कर यही महसूस हुआ