शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

भारतीय राजनीति की बकरी कथा

एक पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त हैं. वे बहुत दिनों तक लोगों को पाकिस्तान भेजने पर उतारू थे. लेकिन न कोई गया, न कोई जाने को तैयार हुआ. जिन लोगों को उनने धमकियाया था, उनको भेज भी नहीं पाए. तो फिर उन्होंने पाकिस्तान भेजने की धमकी देना बंद कर दिया. न कोई पाकिस्तान गया, न ले जाया गया. ठीक वैसे जैसे भव्य राम मंदिर बनना तो था, लेकिन न राम मंदिर बना, न बनाया गया. 25 साल तक उपद्रव जरूर मचाया गया.

कलयुग में समय जल्दी जल्दी बदलता है. अवतार भी जल्दी—जल्दी होते हैं. जितनी बार अपने गांव जाता हूं, किसी नये चौडगरे पर एक नये बाबा उग आते हैं. वे पिछले वाले से ताकतवर होते हैं. इसी तरह से अब सियासत में राम मंदिर से ताकतवर सियासी अवतार गाय का है. गांव के बाहर मुर्दहिया में अब डांगर छोड़ आना मौत को न्यौता देकर आना है. जहां कहीं गाय की टांगनुमा कोई आकृति दिखी, आस्था की विकृति फनफना उठती है. फिर जो आगे आया, वह अब मरा कि तब मरा.

एक दिन तो हद हो गई. मैं बस में था और फोन पर बतिया रहा था. मेरा दोस्त फोन की दूसरी तरफ था. उसने कहा, ससुरे तुम बहुत दुष्ट हो. हमने कहा, अच्छा! और तुम तो अल्ला मियां की गाय हो! मेरे भाई, मैं गाय, अल्ला, मोदी जी को दुख देने वाला पिल्ला और सारे मुहल्ला की कसम खाकर कहता हूं— मेरा किसी को आहत करने का कोई इरादा नहीं था. हमारे गांव में ऐसा बोल देते हैं, हमने भी बोल दिया. लेकिन मेरे मुंह से अल्ला मियां की गाय सुनते ही बगल खड़ा एक मुस्टंडा नाराज हो गया. कहने लगा— अबे देशद्रोही! तुझे पीटकर मार डालूंगा. मैंने पूछा— काहे भाई, हमने तुम्हारी भैंस खोल ली है क्या? और तुनक गया, बोला—पहले तो तुमने गाय को अल्ला से जोड़कर हिंदू द्रोह किया और अब मेरे घर से भैंस बरामद करने की बात कर रहे हो. तुम मेरा धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हो. तुमको छोडूंगा नहीं.
बगल में एक चचा बैठे थे. चचा अपने रौब और दाब से लखनवी प्रतीत होते थे. चचा ने मुस्टंडे की मंशा भांप ली और उसके हस्तास्त्र का आक्षेप प्रक्षेप होने से पहले हस्तक्षेप कर दिया— अरे बबुआ काहे नाराज होते हो, वह बेचारा दढ़ियल खाली पीली खीस ही निपोर रहा है. अपने किसी मित्र मित्राणी से बतिया रहा है. तुम दालभात में मूसलचंद कहां से आ गए?
चचा की मूूंछें रौबदार थीं, डरना बनता था. इसलिए मुस्टंडा कुछ सहम कर बोला— देखो अंकल, इन्होंने गाय को अल्ला से जोड़ दिया है, इन्होंने हमारी भावना को आहत कर दिया है...आप मत बोलिए, यह मेरी आस्था का मामला है...

चचा ने बात काट दी और जोर से डपट कर बोले— अमां डरेबर, गाड़ी रोक. रोक... रोक... रोक...
सुन बचवा, तेरी भावना और आस्था को समेट और निकल इधर से. अब हमारी भावना आहत हो गई, तू बस पर चढ़ा क्यों? चल भाग जंगल निकल. तू यहां दिल्ली में मत रहा कर. लखनऊ तो दिखाई मत पड़ना...
लड़के ने अपने पांव प्रेम से अपने सर पर रखे और रफू हो गया.
चचा मुस्कराए— बौउचट पता नहीं कहां से आ गया... ई जीवधारी जंतु है. हमारे मुहल्ला पहुंच जाए तो खून खराबा करा दे. अरे ई सब तो हम लोग भी बोलते हैं! लखनऊ के हो न बच्चे! हम लोग अइसै बोलते चालते हैं तुम्हारे जइसा ही, अब ई ससुरा भावना और आस्था लेकर आ गया का जाने कहां से.
इतने में हमारा स्टैंड आ गया और हमने राहत की सांस ली, चचा को एक लखनवी मुस्कराहट पास की और उतर गया.
यह उस समय की बात है जब जम्बूदीप में आस्थाएं राजनीति की रखैल हो चुकी थीं. आस्थाओं को कोई धर्म का दलाल अपने तरीके से इस्तेमाल करके जा सकता था. समोसा चटनी, कपडे का रंग, गाय—गोरू, गोबर—मूत्र आदि इस दोहन के हथियार थे. देश में इस बात पर बहस गर्म थी कि किसकी रसोईं में क्या पकना चाहिए.

इस चलन के बाद एक दिन पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त् की घरवापसी हुई और उन्होंने फिर से मुंह खोला तो खोल ही दिया. उन्होंने गाय और बकरी की मांस का सैंपल लिया, उस पर कलात्मक ढंग से आस्था और संस्कार को आरोपित किया और फिर उस पर बहन और पत्नी को आरोपित कर दिया. बवाल मच गया— गाय मां थी तो बहन कैसे हुई? गाय मां भी कैसे हो सकती है? मां गाय कैसे हो सकती है? गाय और बकरी दोनों जानवर हैं तो मां, बहन और पत्नी तीनों में से कोई भी बकरी या गाय क्यों हो जाएगी? जानवर को इज्जत देते देते मनुष्य को जानवर कैसे बनाया जा सकता है?
भक्तों ने कहा, नहीं, यह हो सकता है. यही होता है. जिस तरह आप बहन से संबंध नहीं बनाते है, लेकिन पत्नी से बनाते हैंं, उसी तरह आप बकरी को काट कर खा सकते हैं, लेकिन गाय को नहीं? नारीवादी बहनों ने पूछा— तो भैया, का हम गाय हैं? हमार लाइफ कौनों लाइफ नहीं है का? भक्तों ने कहा, मेरा वो मतलब नहीं था. मेरा मतलब आस्था से था. आप बुरा मत मानिए.
एक बहन मुंहजोर थी, अपने भगत हो चुके तर्क—मुब्तिला भाई को चप्पल लेकर दौड़ा लिया— 'भाग दाढ़ीजार यहां से, एक पे रहता नहीं है. कभी भावना पर आता है तो कभी आस्था पर. कमीना अपनी नौटंकी के चक्कर में हमको गाय बोल गया. दोबारा दिखा इधर तो हलाल करके छोडूंगी.' भक्त भागा तो भाग ही गया.
एक दूसरा भगत भाई भागा—भागा घर पहुंचा. पत्नी झाड़ू लगा रही थी. टीवी पर न्यूज देख कर आई थी. उसका बकरी बना दिया जाना उसे नागवार गुजरा था. भगत को देखा तो उधर मुंह कर लिया. सोचा कि झाड़ू से मारने पर दोष होता है. तब तक भाई बोला— आज फिर बवाल हो गया.
इतना सुनते ही पत्नी ने आव देखा न ताव, लेकर झाड़ू पिल पड़ी. भगत सनाका खा गया. बोला— यह क्या है? कोई संस्कार सीख कर नहीं आई बाप के घर से, पति पर हाथ छोड़ती है.
पत्नी जोर से चिल्लाई— तू बड़ा संस्कारी है, हमको टीवी पर बकरी बना के आया है. जा अपनी मां को गाय बना ले और बैल को बाप. हमको बकरी सकरी बोला तो कर दूंगी मुकदमा. अपने अम्मा के साथ जेल की रोटी तोड़ना. करमजला! मुंहझौंसा!
भगत भाई भागकर घर से बाहर आए और चारपाई पर गिरते हुए सोचा— साला बुरे फंसे. उधर टीवी पर वामियों ने धोया, इधर घर आकर कामिनी ने धोया. अब नहीं जाऊंगा.
आगे की बकरी कथा अभी जारी है.

1 टिप्पणी:

Shraddhanshu Shekhar ने कहा…

बहुत अच्छा लेख । :)