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September, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इस सिस्टम में बोलना मना है

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महाराष्ट्र और पश्‍चिम बंगाल के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर आने वाली नागरिक टिप्पणियों से घबरा गई है. यह फिजूल की घबराहट ऐसी बौखलाहट में बदल गई कि एक दलित चिंतक कंवल भारती को सरकार की आलोचना में पोस्ट डालने पर गिरफ्तार कर लिया गया और अब उन पर रासुका लगाने तक की धमकी दी जा रही है. लेखक ने ऐसा क्या कह दिया कि गिरफ्तारी की नौबत आ गई, यह जानने के बाद कोई भी सिर्फ हैरान हो सकता है, क्योंकि लेखक को जिस-जिस टिप्पणी के लिए गिरफ्तार किया गया, उसमें सरकार की मात्र आलोचना भर थी. इस तरह की कार्रवाई का यह पहला मामला नहीं है. इसके पहले पश्‍चिम बंगाल में ममता बनर्जी का कार्टून बनाकर मित्र को ईमेल भेजने वाले जाधवपुर विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र और उनके मित्र को जेल भेज दिया गया था. शिवसेना के पूर्व प्रमुख बाल ठाकरे की मौत के बाद मुंबई ठप हो जाने को लेकर एक युवती ने फेसबुक पर टिप्पणी की, तो उसे और उस पोस्ट को लाइक करने वाली एक अन्य युवती को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. इसी तरह युवा कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को उनके कार्टूनों के आधार पर देशद्रोह के आरोप में …

मीडिया और भारतीय मानस की संवेदनाएं

शीना बोरा मर्डर केस में मीडिया ने करीब पखवाड़ा भर खबर चलाई. लेकिन अच्छे दिनों की लहर में कितने हजार किसान मरे, इस पर मीडिया ने कोई चर्चा प्रसारित की, न कोई रिपोर्ट दिखाई. जब यह साल पूरा हो जाएगा तो सरकार आंकड़े जारी कर देगी कि इस साल इतने किसानों ने आत्महत्या कर ली. उसके बाद मामला खत्म हो जाएगा और क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो अगले साल के लिए आंकड़े जुटाएगा.
एक शीना बोरा, एक इंद्राणी मखुर्जी और सवा तीन लाख किसानों की आत्महत्या में आपकी हमारी दिलचस्पी से ही हमारा चरित्र तय होता है. हम हत्याओं से विचलित नहीं होते. हम प्यार, सेक्स और धोखा की कहानियों में मगन रहते हैं. इसलिए एक शीना बोरा एक महीने तक खबर बनती है लेकिन सवा तीन लाख किसानों की सरकारी हत्या पर एक दिन भी हंगामा नहीं होता. देश के नेतृत्व का चरित्र हमारा चरित्र है. उसे देखिए गौर से. हम सब सामूहिक रूप बिल्कुल वैसे ही हैं.
शीना बोहरा या इंद्राणी मामले से तीन लाख किसानों की आत्महत्या की तुलना कीजिए. सोचिए, अगर 20 साल में सवा तीन लाख किसानों की जगह सवा तीन लाख अमीर लोग मर जाएं तो क्या होगा? टेलीविजन पर आपने किसानों की आत्महत्या पर कितने दिन…

क्या हम हिंदू तालिबान बनेंगे?

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प्रसिद्ध तर्कवादी और कन्नड़ साहित्यकार एमएम कलबुर्गी की हत्या कर दी गई. साहित्य अकादमी प्राप्त 77 वर्षीय कलबुर्गी हम्पी विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके थे. वे धार्मिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और सामाजिक अन्याय के आलोचक थे. उनके लेखों और बयानों पर पिछले महीनों कुछ विवाद भी हुए थे. यह हत्या धार्मिंक अंधविश्वास पर अभियान चलाने वाले नरेंद्र दभोलकर और गोविंद पानसरे की हत्याओं की अगली कड़ी है. हाल ही में हिंदू अतिवादियों के हमलों से परेशान होकर तमिल साहित्यकार पेरुमल मुरुगन ने अपनी मौत की घोषणा की थी कि 'लेखक पेरुमल मुरुगन आज से मर गया'.
तीन प्रसिद्ध तर्कवादी विद्वानों की इन हत्याओं से कुछ गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. हाल में ऐसे ही चार मामले बांग्लादेश में सामने आए हैं. वहां पर नास्तिक धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में लिखने वाले चार ब्लॉगरों की अतिवादियों ने हत्या कर दी. ठीक उसी तर्ज पर भारत में तीन लेखकों की हत्या की गई. क्या भारतीय लोकतंत्र पाकिस्तान और बांग्लादेश की राह पर है? क्या अब सही—गलत कहने के लिए साहित्यकारों की हत्याएं की जाएंगी? क्या हिंदुस्तान एक उदार, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र नही…

अच्छे दिनों में किसान

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तेलंगाना के एक किसान ने बीते नौ सितंबर को हैदराबाद जाकर फांसी लगा ली. मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के गृहनगर मेडक में ही कुल 34 किसानों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए जा चुके हैं. इनमें से पांच तेलंगाना के बनने के बाद हुईं हैं.
महाराष्ट्र के सिर्फ मराठवाड़ा क्षेत्र में इस साल 628 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. बीते अगस्त में ही यहां फसल बर्बादी के चलते 105 किसानों ने आत्महत्या कर ली. विदर्भ में किसान आत्महत्याओं की दर मराठवाड़ा से भी ज्यादा है. मराठवाड़ा में 2014 में 574 किसानों ने आत्महत्या की थी. यह वही महाराष्ट्र है जहां के नेता शरद पवार दस साल से ज्यादा कृषि मंत्री रहे और अब मोदी जी उनके सपनों का कृषि विज्ञान केंद्र बनवा रहे हैं. फरवरी में बारामती में बने इस केंद्र का उद्घादन प्रधानमंत्री मोदी ने किया था. पवार और मोदी ने एक—दूसरे को किसानों का हितैषी बताया था, लेकिन ताबड़तोड़ किसान आत्महत्याओं पर दोनों ने कुछ नहीं कहा था. चुनाव प्रचार में मोदी के लिए एनसीपी ‘स्वाभाविक रूप से भ्रष्ट पार्टी’ थी. बाद में उन्होंने कहा कि 'कोई ऐसा दिन नहीं है जब मेरी और पवार की फोन पर बात न होती हो.…

प्रधानमंत्री के नाम खुला खत

आदरणीय प्रधानमंत्री जी
नमस्कार!
कुछ दिन से बहुत परेशान हूं. दिमाग की नसें फटने लगी हैं. चुनाव से पहले आप कहते थे कि अच्छे दिन आने वाले हैं, लेकिन जबसे मैंने होश संभाला है, ऐसे दुर्दिन पहली बार देख रहा हूं. मुझे बहुत डर लगता है. आप कहेंगे क्यों? हाल में तीन बड़े लेखकों की हत्या कर दी गई. अभी अभी कन्नड़ लेखक कलबर्गी की हत्या के बाद केएस भगवान को दो बार धमकी मिली. अब ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त भालचंद नेमाडे को भी जान से मारने की धमकी मिली है. आपने जिस विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन किया, उसमें पूंजीपति थे, हमारे प्रतिष्ठित साहित्यकार नहीं थे लेकिन यह कोई मसला नहीं. हैरत यह है कि आप लगातार इन हत्याओं और धमकियों पर चुप हैं, आपकी सरकार भी, पार्टी भी और आपका संरक्षक संगठन आरएसएस भी. क्या अब हम आइएसआइएस के दौर में पहुंचेंगे? हत्याएं, खून—खराबा आदि तो पहले भी होता रहा है लेकिन इतना भयावह समय नहीं था कि बड़े बड़े लेखकों को सरेआम धमकी देकर मारा जाए. हमारी पीढ़ी जिस भारत में पैदा हुई, वह इतना भयावह नहीं था.
दूसरी डराने वाली बात तो सनातन है. आपके विकास के दावे की बात पीछे छूट गई है. अब पूरे देश मे…