मंगलवार, 9 जून 2015

अपराधमुक्त संसद का सपना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान जगह—जगह अपनी सभाओं में वादा किया था कि वे संसद को अपराध मुक्त बनाएंगे. हमारे देश की संसद आपराधिक गतिविधियों में लिप्त नेताओं से मुक्त हो, यह लोकतंत्र के लिहाज से एक सुंदर सपना था, जिसे उन्होंने पूरा करने का भरोसा दिलाया था, लेकिन सरकार बनने के बाद स्थिति एकदम उलट ठहरी. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अनुसार, मौजूदा केंद्रीय मंत्रिमंडल में दागी सांसदों की संख्या बीते दो दशकों में दोगुनी से ज्यादा हो गई है. मंत्रिमंडल में 66 सदस्य हैं जिनमें से करीब 31 फीसदी मंत्रियों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं. संसद को दागियों से मुक्त करने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री की कैबिनेट में ही करीब एक तिहाई अपराधी हैं. कुल 20 मंत्रियों ने अपने हलफनामों में स्वीकार किया है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. 17 फीसदी यानी 11 मंत्रियों पर गंभीर अपराध के आरोप हैं। यह मामले हत्या की कोशिश, राज्य के खिलाफ युद्ध, आपराधिक धमकी और धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े हैं. इस तरह मोदी कैबिनेट ने दागियों की संख्या के मामले में यूपीए सरकार को पीछे छोड़ दिया है.
मोदी कैबिनेट में कम से कम पांच मंत्रियों के खिलाफ बलात्कार और सांप्रदायिक हिंसा जैसे गंभीर मामले पेंडिंग हैं. मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डा. रामशंकर कठेरिया पर 23 आपराधिक मामले हैं. एडीआर का कहना है कि वे 21 मामलों में नामजद हैं. कठेरिया फर्जी मार्कशीट लगाकर प्रोफेसर बन जाने को लेकर चर्चा में रहे. उनके मंत्री बनते ही तमाम आलोचना होने के बाद भी मोदी सरकार की ओर से उनके अपराधी होने की बात को नकार दिया गया. इसी तरह नए रसायन और उर्वरक राज्य मंत्री हंसराज अहिर पर 20 से ज्यादा मामले चल रहे हैं, जिनमें राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने, धमकाने और विद्रोह को उकसाने जैसे गंभीर मामले भी हैं. 
मोदी के विरोधियों को पाकिस्तान भेजने वाले गिरिराज सिंह पर चुनाव के दौरान धांधली का मामला चल रहा है. बाकी उनके घर से चोरों की मार्फत सामने आए डेढ़ करोड़ का अब तक कोई हिसाब नहीं मिल पाया है कि वह काला था या सफेद. गंगा की सफाई की जिम्मेदारी निभाने में लगी केंद्रीय मंत्री उमा भारती 13 मामलों में आरोपी हैं जिनमें से हत्या के प्रयास समेत सात गंभीर अपराध के आरोप हैं. नितिन गडकरी पर चार और उपेंद्र कुशवाहा पर अपराध के चार मामले चल रहे हैं। विज्ञान एवं प्रद्योगिकी मंत्री वाईएस चौधरी पर बैंक में कई देनदारियां बाकी हैं. चौधरी की कंपनी सुजाता टावर्स लिमिटेड का एक बैंक का एनपीए 317 करोड़ 61 लाख रुपए है। वैसे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ भी फर्जी एनकाउंटर का केस चल रहा है और वे एक बार गिरफ्तार भी किए जा चुके हैं. 
अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने दागी सांसदों, विधायकों को कैबिनेट में शामिल करने का फैसला प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के विवेक पर छोड़ते हुए कहा था कि पीएम और सीएम को दागियों को केबिनेट में नहीं रखना चाहिए।
संसद को दागीमुक्त बनाने की बात छोड़िए, यह हाल केंद्रीय मंत्रिमंडल का है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस मसले पर कहा कि मंत्रिमंडल में कोई अपराधी नहीं है. 'ये मामले आरोप आधारित हैं, अपराध आधारित नहीं.' उन्होंने इन सभी मामलों को राजनीति से प्रेरित बताया. याद कीजिए, दागियों के मसले पर यही तर्क कांग्रेस के भी थे. हम मान सकते हैं कि नेताओं पर ऐसे मामले राजनीतिक विरोधियों की ओर से दुर्भावनावश दर्ज कराए जाते हैं, लेकिन आंकड़ों के उलट हम अपने सांसदों या विधायकों का सार्वजनिक जीवन, उनकी छवि, उनकी दबंगई आदि के साक्षी बनते हैं. हम अपने क्षेत्र के सांसद या विधायक का जिस रूप में दिन—ब—दिन सामना करते हैं, वह किसी राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित नहीं है. यह तथ्य है कि राजनीति में आने के लिए आदमी का संगीन किस्म का अपराधी होना जरूरी है. 
मंत्रिमंडल के पहले विस्तार के बाद जब आपराधिक छवि के नेताओं के मसले पर कांग्रेस ने भाजपा पर हमला किया तो अरुण जेटली का तर्क था कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहते हुए अपने फैसले खुद नहीं कर सकते थे, वे सोनिया गांधी के फैसले को ही मानने के लिए बाध्य थे, लेकिन नरेंद्र मोदी अपने फैसले खुद लेते हैं. उन्होंने सोच समझ कर निर्णय लिया है. इस पर कोई पूछ सकता है कि मोदी के ताकतवर प्रधानमंत्री बनने का जनता को या देश को क्या लाभ मिला? संसद में दागी सदस्यों की हालत तो जस की तस है, बल्कि केंद्रीय कैबिनेट में दागी छवि के नेताओं की संख्या बढ़ी ही. 
गौर करने की बात है कि जब यूपीए सरकार में दागी मंत्रियों का मामला सामने आया था तो बीजेपी ने संसद में उनका बहिष्कार किया था। जब दागी सांसद बोलने के लिए खड़े होते तो बीजेपी के सांसद बाहर चले जाते थे। सत्ता में रहकर कांग्रेस जो कर रही थी, तब बीजेपी उसकी आलोचना करती थी. अब वही काम बीजेपी कर रही है और कांग्रेस उसकी आलोचना कर रही है. संसद में दागी छवि के नेता पहली बार नहीं आए हैं, लेकिन यह ध्यान रखना होगा इस बार के लोकसभा चुनाव परिणाम ऐतिहासिक रहा और यह बदलाव जनता की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है. पिछले दस सालों में एक लुंजपुंज नेतृत्व वाली भ्रष्ट सरकार थी, जिससे जनता उकताई हुई थी. नरेंद्र मोदी और भाजपा के तमाम वादों पर उसने भरोसा करके जनादेश दिया. चुनाव में किए गए वादों पर आंशिक रूप से भी अमल न करना जनता की उन आकांक्षाओं के साथ विश्वासघात करना है. यदि सरकार के नीतिगत रवैये और कामकाज के लिहाज देखा जाए तो हालत जस के तस हैं. अपराधियों से मुक्त संसद का सपना फिलहाल एक सपना ही है. फिर भी अगर किसी को लगता है कि भ्रष्ट छवि वाली यूपीए की सरकार जाने के बाद कुछ बदला है तो हां, चेहरे जरूर बदल गए हैं.

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