सोमवार, 23 मार्च 2015

भारत कृषिप्रधान देश या किसानों की कब्रगाह?

सरकार ने 13 मार्च को संसद में जानकारी दी कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद डिवीजन में 2015 के शुरुआती 58 दिनों के भीतर 135 किसानों ने आत्महत्या कर ली। कृषि राज्यमंत्री मोहनभाई कुंडारिया ने बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 और 2013 में क्रमश: 13,754 और 11,772 किसानों ने आत्महत्या की। भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं।
1995 से लेकर अब तक 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसी साल एक जनवरी से अब तक 200 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
उरई में फसल बर्बाद होने के सदमे में नरेंद्र कुशवाहा (35) ने कल सोमवार को आत्महत्या कर ली। रविवार को मध्य प्रदेश के खंडवा में एक किसान ने आत्महत्या कर ली। पिछले हफ्ते हमीरपुर के कुनैठा गांव के किसान इंद्रपाल ने बढ़ते कर्ज और फसल की बर्बादी से परेशान होकर खेत में फांसी लगा ली। हमीरपुर के ही सुमेरपुर परहेटा के 68 वर्षीय किसान राजाभैया तिवारी को खेत में दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई। उन्नाव के पूराचांद निवासी विरेंद्र सिंह की दिल का दौरा पड़ने से खेत में ही मौत हो गई। 
लगातार 12वें साल महाराष्ट्र किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल है। यहां का सूखाग्रस्त विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह है। अकेले महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। बीती फरवरी में प्रधानमंत्री मोदी ने बारामती में शरद पवार के किसी ड्रीम प्रोजेक्ट कृषि विज्ञान केंद्र का उद्घाटन किया और दोनों नेताओं ने एक दूसरे को किसानों का हितैषी बताया। यह गौर करने की बात है कि 1995 से अब तक बीस साल में शरद पवार दस साल कृषि मंत्री रहे और सबसे ज्यादा किसान महाराष्ट्र में मरे। 
जब शरद पवार के कथित ड्रीम प्रोजेक्ट का उद्घाटन हो रहा था, तब किसानों की इन मौतों का तो कोई जिक्र नहीं हुआ पर कृषि को वैश्विक बाजार में तब्दील करने की घोषणा जरूर हुई। जबकि एक जनवरी से 45 दिन के भीतर महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में 93 किसानों ने आत्महत्या की थी। नई सरकार आने के बाद से अब तक एक बार भी किसानों को कोई सांत्वना नहीं दी है कि वे कर्ज और गरीबी के चलते आत्महत्या न करें, सरकार उनकी समस्याओं को सुलझाने के कुछ उपाय करेगी।
चुनाव प्रचार के दौरान मोदी हर सभा में कहा करते थे कि देश के संसाधनों पर पहला हक गरीबों और किसानों का है। लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनते ही अडाणी को छह हजार करोड़ का सरकारी कर्ज दिलवाना उनकी शुरुआती बड़ी घोषणाओं में से एक थी। तब से वे दुनिया भर में घूम-घूम कर पूंजीपतियों को भरोसा दे रहे हैं कि उनकी सरकार पूंजीपतियों को पूरी सुरक्षा देगी। 
अमेरिका से परमाणु समझौते के तहत आनन फानन में भारत सरकार ने अमेरिकी कंपनियों को दुर्घटना संबंधी जवाबदेही से मुक्त कर दिया और देश के खजाने से 1500 करोड़ का मुआवजा पूल गठित कर दिया। यदि पूंजीपतियों के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा सकता है तो क्या कर्ज से मरते किसानों की जान बचाने के लिए कुछ सौ करोड़ रुपए की योजनाएं नहीं शुरू की जा सकतीं?
किसानों और गरीबों के लिए क्या मूक मनमोहन, क्या वाचाल मोदी! कोई अंतर नहीं आया। जैसे मनमोहन की चुप्पी किसानों को लील रही थी, ठीक वैसे ही मोदी के भाषणों का शोर किसानों को लील रहा है।
जब संसद में सरकार किसान के आत्महत्या की जानकारी दे रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्रा पर जा चुके थे। उन्होंने जाफना में श्रीलंकाई तमिलों को भारत की मदद से बने 27 हजार मकान सौंपे और इस परियोजना के दूसरे चरण में भारत के सहयोग से और 45 हजार मकान बनाए जाने की घोषणा की। 
मॉरीशस को इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए 50 करोड़ डॉलर का रियायती कर्ज देने की पेशकश की। इसी तरह अनुदान और कर्ज के रूप में सेशेल्स को भी 7.50 करोड़ डालर की राशि दी गई। काश प्रधानमंत्री अपने देश में मर रहे किसानों पर कुछ करते नहीं तो कोई घोषणा ही करते।
मोदी एक ऐसे देश के प्रधानमंत्री हैं जहां पांच करोड़ लोग बेघर हैं। इन बेघर लोगों के लिए मोदी सरकार ने कोई पहल की हो, ऐसा अभी सुनने में नहीं आया है। सरकार भूमि अधिग्रहण बिल के लिए जरूर पूरा जोर लगा चुकी है जिसके तहत किसानों की सहमति के बिना उनकी जमीनें लेकर कॉरपोरेट को सस्ते दाम में देने की योजना है।
यह वही देश है जो स्मार्ट सिटी बनाने और बुलेट ट्रेन चलाने की बात करता है, लेकिन इस पर कोई बात नहीं करता कि पहले से चल रही खटारा ट्रेनों में पानी नहीं होते। इस पर बात नहीं होती कि ज्यादातर जनसंख्या को पीने के लिए शुद्ध पानी तक नहीं है। यहां इस पर कोई बात नहीं होती कि हर साल करीब साढ़े तेरह लाख बच्चे पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले मर जाते हैं। इसका कारण डायरिया और निमोनिया जैसी साधारण बीमारियां हैं। हम इन शर्मनाक आंकड़ों पर कभी शर्मिंदा नहीं होते।
हम आप जब तक मनुष्य रहेंगे, तब तक कार या बुलेट ट्रेन का डिब्बा नहीं खाएंगे, न यूरेनियम खाएंगे। न मेक इन इंडिया के तहत बने कल पुर्जे खाएंगे। हम आप रोटी ही खाएंगे जो किसान उगाते हैं। यह सामान्य बात नहीं है कि उदारीकरण लागू होने के बाद से देश के सरकारी रिकॉर्ड में करीब तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की। इन आंकड़ों के साथ भी राज्य सरकारें बाजीगरी करती हैं, यह बात पी साईनाथ साबित करते रहे हैं। किसान कर्ज से मरता है तो सरकारें उसे बीमारी से हुई मौत साबित करने का प्रयास करतीं हैं। 
आप याद कर सकते हैं कि विजय माल्या जैसे उद्योगपति खुद को दिवालिया घोषित करते हैं तो भारत सरकार अरबों देकर उन्हें उबार लेती है। पर संसद में बदजबानी करने वालों में से कोई एक नेता नहीं है जो पूरे दम से कह सके कि मेरे देश के किसानों, अब फांसी लगाना और फिनायल पीना बंद करो। तुम्हारी फसलें बर्बाद हो जाएंगी तब भी तुम्हारे बच्चों को मरने नहीं देंगे।
चुनाव से पहले भाजपा ने वादा किया था कि किसानों को उनकी लागत में 50 फ़ीसदी मुनाफ़ा जोड़कर फ़सलों का दाम दिलाया जाएगा। लेकिन सरकार बनाने के बाद मोदी एंड टीम का पूरा जोर कॉरपोरेट और मैन्यूफैक्चरिंग पर है। उनकी प्राथमिकता में कृषि और किसान कहीं नहीं हैं। सरकार मेक इन इंडिया के लिए तो मशक्कत कर रही है लेकिन कृषि के लिए उसके पास कोई योजना या सोच नहीं है। देश की करीब 60 प्रतशित जनसंख्या की आजीविका का आधार कृषि क्षेत्र है। लेकिन इस क्षेत्र को लेकर सरकार ने अब तक किसी बड़े नीतिगत बदलाव या घोषणा से परहेज ही किया है। जबकि कृषि पर गंभीर संकट मंडरा रहे हैं। चालू वित्त वर्ष (2014-15) में कृषि विकास दर सिर्फ़ 1.1 फ़ीसदी रहने का अनुमान है।
कृषि की दयनीय हालत के बावजूद अपने पहले बजट में मोदी सरकार ने कृषि आय की बात तो की, लेकिन कृषि बजट में कटौती कर दी। बजट में किसानों के लिए कुछ खास नहीं रहा। सरकार द्वारा जिस कृषि लोन की बात की जाती है, उसका फायदा किसानों से ज्यादा कृषि उद्योग से जुड़े लोगों को होता है। हालिया बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ऐलान किया कि कॉरपोरेट टैक्स को अगले चार सालों में 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी किया जाएगा।
मोदी सरकार की अब तक की नीतियों और केंद्रीय बजट का साफ संदेश है कि किसानों को वह सांत्वना मात्र देने को तैयार नहीं हैं। यह कृषिप्रधान देश फिलहाल किसानों की कब्रगाह बना रहेगा।

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