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भारत कृषिप्रधान देश या किसानों की कब्रगाह?

सरकार ने 13 मार्च को संसद में जानकारी दी कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद डिवीजन में 2015 के शुरुआती 58 दिनों के भीतर 135 किसानों ने आत्महत्या कर ली। कृषि राज्यमंत्री मोहनभाई कुंडारिया ने बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 और 2013 में क्रमश: 13,754 और 11,772 किसानों ने आत्महत्या की। भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं। 1995 से लेकर अब तक 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसी साल एक जनवरी से अब तक 200 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। उरई में फसल बर्बाद होने के सदमे में नरेंद्र कुशवाहा (35) ने कल सोमवार को आत्महत्या कर ली। रविवार को मध्य प्रदेश के खंडवा में एक किसान ने आत्महत्या कर ली। पिछले हफ्ते हमीरपुर के कुनैठा गांव के किसान इंद्रपाल ने बढ़ते कर्ज और फसल की बर्बादी से परेशान होकर खेत में फांसी लगा ली। हमीरपुर के ही सुमेरपुर परहेटा के 68 वर्षीय किसान राजाभैया तिवारी को खेत में दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई। उन्नाव के पूराचांद निवासी विरेंद्र सिंह की दिल …

मनमोहन की चुप्पी, मोदी का शोर

जैसे मनमोहन की चुप्पी किसानों को लील रही थी, ठीक वैसे ही मोदी के भाषणों का शोर किसानों को लील रहा है. एक जनवरी से अब तक 200 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. एक जनवरी से 45 दिन के भीतर महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में 93 किसानों ने आत्महत्या की. 
उरई में फसल बर्बाद होने के सदमे में नरेंद्र कुशवाहा 35 ने कल सोमवार को आत्महत्या कर ली. रविवार को मध्य प्रदेश के खंडवा में एक किसान ने आत्महत्या कर ली. पिछले हफ्ते हमीरपुर के कुनैठा गांव के किसान इंद्रपाल ने बढ़ते कर्ज और फसल की बर्बादी से परेशान होकर खेत में फांसी लगा ली. हमीरपुर के ही सुमेरपुर परहेटा के 68 वर्षीय किसान राजाभैया तिवारी को खेत में दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई. उन्नाव के पूराचांद निवासी विरेंद्र सिंह को दिल का दौर पड़ने से खेत में ही मौत हो गई. 
आप याद कर सकते हैं कि विजय माल्या जैसे उद्योगपति खुद को दिवालिया घोषित करते हैं तो भारत सरकार अरबों देकर उन्हें उबार लेती है. मोदी जब तीन देशों की यात्रा में अपना पिटारा खोले धन लुटा रहे हैं, अमेरिकी कंपनियों के लिए 1500 करोड़ का बीमा पूल बना रहे हैं, अडानियों को क़र्ज़ दे रह…

कृषिप्रधान देश या किसानों की कब्रगाह?

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सरकार ने 13 मार्च को संसद में जानकारी दी कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद डिवीजन में 2015 के शुरुआती 58 दिनों के भीतर 135 किसानों ने आत्महत्या कर ली. कृषि राज्यमंत्री मोहनभाई कुंडारिया ने बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 और 2013 में क्रमश: 13,754 और 11,772 किसानों ने आत्महत्या की. भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं. 1995 से लेकर अब तक 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.  महाराष्ट्र लगातार 12वें साल महाराष्ट्र किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल है. यहां का सूखाग्रस्त विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह है. अकेले महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. बीती फरवरी में प्रधानमंत्री मोदी ने बारामती में शरद पवार के किसी ड्रीम प्रोजेक्ट कृषि विज्ञान केंद्र का उद्घाटन किया और दोनों नेताओं ने एक दूसरे को किसानों का हितैषी बताया. यह गौर करने की बात है कि 1995 से अब तक बीस साल में शरद पवार दस साल कृषि मंत्री रहे और सबसे ज्यादा किसान महाराष्ट्र में मरे.…

जनांदोलन के विचार की दुर्गति

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अरविंद केजरीवाल का उभार भाजपा और कांग्रेस मार्का घोड़ा खरीद राजनीति का नकार था. केजरीवाल उस काजल की कोठरी को पानी पी—पी कर कोसते हुए उसमें दाखिल हुए और कोठरी साफ करने की जगह सर से पांव तक खुद को कालिख से पोत लिया. केजरीवाल के उभार के साथ
हम सबने जनता की तड़पती हुई आकांक्षाओं को देखा है कि वह कितनी बेताबी से बदलाव के लिए छटपटाती है. नरेंद्र मोदी और भाजपा को मिला ऐतिहासिक बहुमत भी इसी जन छटपटाहट का नतीजा रहा. लेकिन इन दोनों ने ही जनता की आकांक्षाओं को बेरहमी से रौंदा. आम आदमी पार्टी के बारे में यह तो पहले से ही साफ था कि एक पार्टी बिना किसी घोषित विचारधारा के अगर चुनाव लड़ रही है तो वह सिर्फ सत्ता में जगह बनाने की कोशिश कर रही है. वह कोई दूरगामी परिवर्तन ला सकने की कूवत नहीं रखती. सत्ता मिलने के पंद्रह दिन बाद से सामने आई सिर फुटौवल इसका प्रमाण है. सिर्फ आलाकमान बनने की खब्त में केजरीवाल अपने तालीबाज अव​सरवादियों को अपनी विश्वसनीयता और अपने सियासी भविष्य से जैसा खिलवाड़ कर रहे हैं वह ऐतिहासिक मूर्खता असधारण है. केजरीवाल ऐसे लोगों से घिर गए हैं जिन्होंने अवसर देख राजनीति लपक ली है. राजनी…

केजरी बाबू! लोकतंत्र कहां गया?

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अरविंद केजरीवाल भारतीय राजनीति के स्यवंभू
लोकतांत्रिक और सबसे ईमानदार हैं, इसलिए एक से ज्यादा पद पर काबिज रह सकते हैं. बहाना वही है जो सोनिया गांधी, माया या मुलायम के पास है कि पार्टी नहीं चाहती कि वे हटें. वे देश का सिस्टम पारदर्शी चाहते हैं. पूरा सिस्टम श्रीधरन की मेट्रो की तरह चाहते हैं कि कोई भी रहे पर बेईमानी न कर पाए, लेकिन अपनी पार्टी में ऐसी व्यवस्था नहीं बनाते कि विकेंद्रीकरण हो. उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद संयोजक पद से इस्तीफा दिया, पार्टी के लोगों ने मना कर दिया और वे मान गए! फिर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के चापलूस यही करके क्या बुरा करते हैं? केजरीवाल के व्यवहार से तो लगता है कि खुदा न खास्ता, आम आदमी पार्टी की एक से ज्यादा राज्यों में सरकार बनने की नौबत आई तो स​बके मुख्यमंत्री केजरीवाल ही बनेंगे.
केजरीवाल ने चुनाव जीतने से पहले राजनीतिक ईमानदारी को लेकर बड़ा हल्ला मचाया लेकिन उम्मीदवारों को टिकट बांटने में वही किया जो कांग्रेस भाजपा करती हैं. टिकट बंटवारे को लेकर प्रशांत भूषण, शांति भूषण और पार्टी के लोकपाल की आपत्तियों को दरकिनार किया. जब लोकपाल की सुननी नहीं है तो…