रविवार, 27 दिसंबर 2015

करछना में सरकारी लूट का कहर

यह इसी देश में संभव है कि किसान विकास कार्यों के लिए अपनी जमीन दे, अपनी जीविका और सुरक्षा कुर्बान करे और अगर अपने अधिकार मांगने लगे तो लाठी खाए, गोली खाकर जान गंवाए. देश भर में जहां कहीं भी सरकारें जमीन अधिग्रहण करती हैं, वहां जनता से टकराव के बाद पुलिस बल का इस्तेमाल जैसे नियम बन गया है.

इलाहाबाद जिले की करछना तहसील के कचरी गांव में करीब दो महीने से धारा 144 लागू है. पुलिस आैैर ग्रामीणाें में संघर्ष के बाद पूरे गांव में पीएसी तैनात है. गांव के कई घरों में ताले लगेे हैं. गांव सूना  पड़ा है. पुलिस की दहशत से गांव के 70 फीसदी लोग घरों में ताला लगाकर वहां से भाग गए हैं. जो घर खुले हैं, उनमें सिर्फ महिलाएं और बच्चे हैं. कई घरों के दरवाजे टूटे हैं. घरों के अंदर भी तोड़फोड़ की गई है. गांव वालों के मुताबिक इन्हें पुलिस ने तोड़ा है. गांव के सभी पुरुष पुलिस के डर से फरार हैं,  यहां सिर्फ महिलाएं, बच्चे और बूढ़े बचे हैं.


जमीन बचाने के लिए कचरी गांव के किसान 1,850 से ज्यादा दिनों से धरने पर हैं. इसी साल 9 सितंबर की सुबह 7 बजे किसान आंदोलनकारियों पर पुलिस ने धावा बोल दिया. ग्रामाणों और पुलिस के बीच जबर्दस्त संघर्ष हुआ. लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले छोड़े गए, जमकर पथराव हुआ, चापड़ चले और आगजनी भी हुई. ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस ने एक घर में आग भी लगा दी. कई राउंड गोलियां चलाईं. धरनास्थल पर मौजूद लोगों की पिटाई की और उन्हें गिरफ्तार कर ले गई. हालांकि पुलिस ज्यादातर आरोपों से इंकार कर रही है. पुलिस का कहना है कि उन्होंने गोली नहीं चलाई और घर में आग खुद ग्रामीणों ने लगाई थी.

गांव के एक घर में दो ग्रेनेड फेंके गए. घर के अंदर की दीवारें काली पड़ गई हैं. गांव वाले कह रहे हैं कि यह ग्रेनेड पुलिस ने फेंका है जबकि पुलिस का कहना है कि बम घर के अंदर से फेंका गया. अब सवाल ये है कि अगर बम घर के अंदर से फेंका गया तो अंदर ही कैसे फट गया? यदि अंदर से कोई बम फेंक रहा था और बम अंदर ही फट गया तो कोई हताहत क्यों नहीं हुआ? बहरहाल, ये बम आर्टिलरी (आयुध कारखाने) के बने हैं, जिन पर सितंबर 2010 एक्सपाइरी डेट है. पुलिस अधिकारियों ने सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की एक जांच समिति के सवालों के जो जवाब दिए, उनमें हास्यास्पद किस्म का विरोधाभास है. अधिकारियों ने एक ही बातचीत में बार-बार बयान बदले हैं.

तीन साल के एक बच्चे के कंधे पर 12 टांके आए हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि उसे पुलिस की गोली छूकर निकली है जबकि पुलिस का कहना है कि बच्चा ग्रामीणों के हमले में दराती से घायल हुआ है. जो भी हो, पुलिस को कम से कम ऐसे सवाल का जवाब देना चाहिए कि चारपाई पर पड़े 84 साल के बुजुर्ग से सरकार को क्या खतरा था, जिसे घर में से घसीट कर पीटा गया? सरकार या पुलिस को 13-14 साल के बच्चे से क्या खतरा हो सकता है जिसे जेल में डाल दिया गया?

बहरहाल, गांव के 41 किसान इलाहाबाद की नैनी जेल में बंद हैं. इन 41 लोगों में 13 साल से लेकर 17 साल तक के नाबालिग और 75 साल के बुजुर्ग भी शामिल हैं. ये सभी बिना किसी सुनवाई के जेल में बंद हैं. इन लोगों के अलावा पुलिस अन्य किसानों और 300 अज्ञात लोगों के खिलाफ गैंगस्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) की कार्रवाई की तैयारी कर रही है. महिलाओं और बच्चों के साथ आंदोलन में उतरे किसानों को प्रशासन ने उपद्रवी मानते हुए उनके खिलाफ हत्या के प्रयास सहित विभिन्न गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कराए हैं.

आंदोलनकारियों के मुखिया किसान नेता राज बहादुर पटेल अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. उन पर 12 हजार रुपये का इनाम है. उनके परिवार के 22 सदस्य जेल में बंद हैं. यह सब इसलिए हुआ है क्योंकि किसान अपनी जमीन किसी कंपनी को देने का विरोध कर रहे हैं, इसीलिए पुलिस उन्हें अपराधी मानती है. कचरी गांव के कई घरों में पुलिस ने तोड़फोड़ की है. राज बहादुर पटेल के घर की महिलाओं ने बताया, ‘नौ सितंबर को भारी संख्या में आई पुलिस ने पूरा गांव घेर लिया, जो सामने मिला, उसे पीटा, घरों में तोड़फोड़ की और 46 ग्रामीणों को पकड़ कर थाने ले गई. पुलिस दल के साथ डीएम भी थे.’

लगातार धारा 144 लागू होने, गांव में पुलिस की दबिश और उत्पीड़न के चलते गांववाले दहशत में जी रहे हैं. आठ अक्टूबर को एक किसान सहदेव (65) की मौत हो गई. ग्रामीणों का कहना है कि सहदेव की मौत पुलिस की प्रताड़ना और सदमे से हुई है. पुलिस गांव वालों को इतना प्रताड़ित कर रही है कि हर कोई भय में जी रहा है. इसी तरह से पास के कोहड़ार गांव में जय प्रकाश के घर पर बुलडोजर चलवाकर उसे ध्वस्त करा दिया है.

इन किसानों का दोष बस इतना है कि वे अपनी जमीन जेपी समूह को नहीं देना चाहते. गौर करने लायक बात ये है कि सरकार भी ग्रामीणों से बातचीत करने को राजी नहीं है, वह कोर्ट का आदेश मानने को तैयार नहीं है कि किसानों की जमीन वापस की जाए. सरकार कोई भी यत्न करके ग्रामीणों से निपटने के मूड में है.

इलाहाबाद के पास के इलाके में 20 किलोमीटर की दूरी में तीन थर्मल पावर प्लांट लगाए जाने हैं. करछना और बारा में दो पावर प्लांट जेपी समूह के होंगे और बारा में एक प्लांट एनटीपीसी और यूपी पावर कॉरपोरेशन का होगा. इसके लिए भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना 23 नवंबर, 2007 को अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4, 17(1) और 17(4) के तहत जारी हुई थी. तत्कालीन प्रदेश सरकार ने अधिग्रहीत जमीन पावर प्रोजेक्ट के लिए जेपी समूह को हस्तांतरित कर दी थी.

जब अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई तो कचरी के किसान नेता राजबहादुर पटेल की अगुवाई में दर्जनों किसानों ने अधिग्रहण के खिलाफ प्रशासन को आवेदन सौंपा लेकिन प्रशासन ने इसकी अनदेखी की और अधिग्रहण संबंधी कार्रवाई जारी रही. आखिरकार अप्रैल, 2008 में सात किसानों की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिग्रहण की योजना को चुनौती दी गई. इस प्रोजेक्ट के लिए 2010 में 2200 बीघा जमीन अधिग्रहीत की गई. सरकार ने जमीन का मुआवजा बाजार दर से दस गुना कम तय किया, कुल तीन लाख रुपये प्रति बीघा, जबकि तब जमीन का बाजार भाव 30 लाख रुपये प्रति बीघा था. यहां के किसान ‘किसान कल्याण संघर्ष समिति’ के बैनर तले भूमि अधिग्रहण के विरोध में लामबंद हैं. किसानों का संघर्ष जारी है तो पुलिस का दमन भी. इस मुद्दे पर अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा दूसरे संगठनों के साथ मिलकर आंदोलन कर रही है. विरोध के चलते अभी तक अधिग्रहीत जमीन की घेराबंदी पूरी नहीं हो सकी है.

22 अगस्त, 2010 से इलाके के किसान धरने पर बैठे. सरकार ने जब इस तरफ भी ध्यान नहीं दिया तो किसानों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया. प्रशासन ने बातचीत करके मसला सुलझाने की जगह आंदोलन को कुचलने का रास्ता अपनाया. जनवरी 2011 में अनशनरत किसानों पर लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले दागे गए और फायरिंग की गई. इस संघर्ष में पुलिस की गोली से एक किसान गुलाब विश्वकर्मा की मौत हो गई थी, जिसके कारण किसानों का गुस्सा बढ़ गया. उस वक्त किसानों के उग्र हो जाने पर पुलिस को पीछे हटना पड़ा था. इसके बाद 22 अगस्त 2015 को भी कचरी के 122 ग्रामीणों के विरुद्ध शांति भंग की धारा 107/116 के अंतर्गत कार्रवाई करते हुए नोटिस तामील किया गया.


इस बीच 13 अप्रैल, 2012 को हाईकोर्ट ने करछना में प्रस्तावित जेपी समूह के थर्मल पावर प्लांट के लिए भूमि का अधिग्रहण रद्द करते हुए कहा था कि किसानों को मुआवजा लौटाना होगा, इसके बाद उनकी जमीनें वापस कर दी जाएं. वहीं बारा पावर प्रोजेक्ट के मामले में किसानों की याचिका खारिज कर दी गई. दोनों ही मामलों में भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली अवधेश प्रताप सिंह और अन्य किसानों की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया. बारा में जेपी के पावर प्रोजेक्ट के मामले पर कोर्ट ने कहा कि बारा प्लांट में निर्माण का कार्य काफी आगे बढ़ चुका है, इसलिए वहां भूमि अधिग्रहण रद्द किया जाना नामुमकिन है. नोएडा भूमि अधिग्रहण मामले में गजराज सिंह केस का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर अधिग्रहण के बाद प्रोजेक्ट पर काम प्रारंभ हो चुका है तो वहां का अधिग्रहण रद्द नहीं किया जा सकता है. बारा के किसान मुआवजे को लेकर अपनी लड़ाई जारी रख सकते हैं. करछना के किसानों के मामले में कोर्ट ने कहा कि अभी तक  परियोजना का कार्य शुरू नहीं किया गया है.

मामले में प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल जवाब में कहा गया कि किसानों के आंदोलन के कारण पावर प्लांट का कार्य प्रारंभ नहीं हो सका. तब कोर्ट ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण मनमाने और मशीनरी तरीके से नहीं किया जा सकता. किसानों की आपत्तियों को सुनना जरूरी है. करछना मामले में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह छूट दी है कि वह चाहे तो कानून के मुताबिक नए सिरे से अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर सकती है.

किसानों की मांग है कि पांच साल तक उनकी जमीनें सरकार के पास खाली पड़ी रहीं. अगर जमीनें उनके पास होतीं तो उस पर फसल पैदा की जाती. इसलिए सरकार पांच साल में उन जमीनों पर पैदा होने वाले अनाज की कीमत किसानों को दे लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की बात पर गौर करने की बजाय उनके विरोध को कुचलने के लिए पुलिस ने दमन का सहारा लेना शुरू कर दिया. गांववाले बताते हैं कि नौ सितंबर को गांव में पुलिसिया हमला करवाने वाले डीएम कौशल राज शर्मा ने धमकी दी थी कि जिस तरह उन्होंने मुजफ्फरनगर में दंगा करवाया था, वैसे ही यहां भी करवा सकते हैं इसलिए सुधर जाओ. उनका अब कानपुर तबादला हो चुका है. संजय कुमार नए डीएम बनकर आए हैं. कनहर गोलीकांड के बाद इनको सोनभद्र में लगाया गया था. जांच टीम के सदस्याें के साथ एक अनौपचारिक बातचीत में उन्हाेंने पिछले डीएम कौशल राज को ‘दंगा स्पेशलिस्ट’ भी बताया.

कुछ स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि जिन जमीनों को लेकर मामला फंसा है, वे सारी अधिग्रहण से पहले आला अधिकारियों की पत्नियों और सगे-संबंधियों के नाम कर दी गई थीं, इसलिए किसानों को मुआवजा वापसी का नोटिस नहीं दिया जा रहा कि बात कहीं खुल न जाए. यह आरोप सही भी लगता है क्योंकि जब कोर्ट ने किसानों की जमीन वापस करने का आदेश दे दिया है तो प्रशासन जमीन वापस क्यों नहीं कर रहा है? इस सवाल पर डीएम संजय कुमार का कहना है, ‘अखबारों में विज्ञापन दिया गया लेकिन गांववाले पैसा वापस नहीं कर रहे हैं.’ जबकि ग्रामीणों का कहना है कि कैसे करना है, क्या करना है, हमें कुछ मालूम ही नहीं है. प्रशासन ने जमीन वापस करने की प्रक्रिया के बारे में कोई सूचना नहीं दी है. प्रशासनिक अधिकारियाें का कहना है कि वे जो कर रहे हैं, वह सब ‘ऊपर’ के आदेश के मुताबिक कर रहे हैं.


पुलिस की रिपोर्ट में गांव के आधे से ज्यादा लोग अधिग्रहण से असहमत हैं और अपनी जमीन नहीं देना चाहते. दूसरी तरफ डीएम से फोन पर हुई बातचीत में उन्हाेंने कहा कि अस्सी फीसदी लोग जमीन देने के लिए सहमत हैं यानी ग्रामीणों की असहमति और कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रशासन जमीन वापस करने की प्रक्रिया शुरू करने की बजाय अधिग्रहण की कोशिश में लगा है. प्रशासन का कहना है कि हम ग्रामीणों को सहमत करने का प्रयास कर रहे हैं. किसानों के इस आंदोलन से अलग ‘पावर प्लांट बचाओ आंदोलन’ भी चल रहा है जिससे सपा से पूर्व सांसद रेवती रमण सिंह भी जुड़े हैं. हाल ही में वे पावर प्लांट का काम पूरा कराने का संकल्प भी जता चुके हैं.

उधर, 26 सितंबर को नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर आंदोलन कर रहे किसानों से मिलने जा रही थीं, तभी इलाहाबाद पुलिस ने उनको समर्थकों के साथ हिरासत में ले लिया. मेधा भूमि अधिग्रहण का विरोध करने पर बच्चों और महिलाओं की जेल में डालने का विरोध कर रही हैं. वे किसानों से मिलना चाह रही थीं लेकिन जिलाधिकारी संजय कुमार ने उन्हें वहां जाने से रोक दिया. उन्होंने कहा, ‘गांव में धारा 144 लगी हुई है और किसी सभा की इजाजत नहीं है.’ प्रशासन ने मेधा को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में ही नजरबंद कर दिया था. उन्हें बाद में छोड़ दिया गया.

मेधा को नजरबंद किए जाने को लेकर पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई कि मेधा पाटकर की नजरबंदी गैरकानूनी थी. याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश सरकार से जवाबी हलफनामा तलब करके पूछा है कि मेधा और उनके समर्थकों को क्यों गिरफ्तार किया गया? पीयूसीएल की इस याचिका में कचरी गांव में धारा 144 लगाने को लेकर भी चुनौती दी गई है. गौरतलब है कि पुलिस ने 144 लागू करने का जो आदेश जारी किया है, उसमें कहा गया है कि प्रशासन को यह ‘आभास’ है कि क्षेत्र में अशांति की ‘संभावना’ है. सवाल यह भी है कि क्या ‘आभास’ और ‘संभावना’ के आधार पर किसी क्षेत्र में इतने लंबे समय तक धारा 144 लागू की जा सकती है?

अब इस आंदोलन में कई किसान संगठन शामिल हो गए हैं.  ‘कृषि भूमि बचाओ मोर्चा’ और ‘जन संघर्ष समन्वय समिति’ ने 27 अक्टूबर को बनारस में किसान-मजदूर संगठनों का एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया. इस सम्मेलन में तय किया गया कि पांच नवंबर को प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर सामूहिक धरना दिया जाएगा और 16 नवंबर को लखनऊ में धरना प्रदर्शन होगा.

उधर, जेल में बंद ग्रामीणों ने जमानत लेने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है, ‘हमने कोई अपराध नहीं किया है. हमारी जमीन पर हमारा अधिकार है. सरकार जब तक चाहे, हमें जेल में रखे, पर हम जमानत नहीं लेंगे.’ गांव के एक बुजुर्ग ने एक लोकगीत गाकर अपनी भावनाएं कुछ इस तरह जाहिर कीं, ‘जब सर पर कफन को बांध लिया तब पांव हटाना न चाहिए…’ पर सवाल यह है कि जब सरकार ही इन गरीब ग्रामीणों को पांव पीछे हटाने पर मजबूर कर दे तो ये न्याय की अपेक्षा किससे करें?

प्रशासन का सभी आरोपों से इंकार 

इलाहाबाद के जिलाधिकारी संजय कुमार ने इन आरोपों के मद्देनजर कहा, ‘ये सारे आरोप गलत हैं. हम जनता के दुश्मन नहीं हैं. हम जनता की सेवा के लिए हैं, अन्याय क्यों करेंगे? सबको साथ लेकर काम करना है.’ भारी संख्या में पुलिस बल तैनात करने या लाठी चार्ज करने की जरूरत क्या थी, इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘कुछ लोगों ने जनता को भड़काने की कोशिश की. रणनीति के तहत पुलिस पर हमला किया गया, जिसके बचाव में पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी.’

महिलाओं और बच्चों को भी जेल में डालने के बारे में उनका कहना है, ‘जिन लोगों ने माहौल खराब करने की कोशिश की, उन पर कार्रवाई की गई. कुछ और नाम भी प्रकाश में आए हैं, जिनके बारे में जांच की जा रही है.’ कोर्ट के आदेश के बावजूद जमीन वापसी की प्रक्रिया नहीं शुरू करने के सवाल पर उन्होंने कहा, ‘हमने प्रक्रिया शुरू की थी, अखबारों में विज्ञापन दिए थे, गांव में भी अधिकारियों को भेजा गया, लेकिन गांववालों ने कोई रुचि नहीं दिखाई. कोई अपनी जमीन वापस लेने नहीं आया.’ हालांकि, वे यह भी कह रहे हैं कि 80 फीसदी लोग जमीन देने के लिए सहमत हैं. बाकी को सहमत करने का प्रयास किया जा रहा है.

(यह रिपोर्ट तहलका पत्रिका के 15 नवंबर, 2015 के अंक में प्रक‍ाशित है.)

किसान आत्महत्याएं और तेलंगाना का शाही यज्ञ

तेलंगाना में सरकार शाही यज्ञ करा रही है. वही ​तेलंगाना जो करीब आधी सदी तक संघर्ष के बाद नया राज्य बना है. वही तेलंगाना जहां इसी साल करीब एक हजार किसानों ने आत्महत्या की है. अभी का आंकड़ा नौ सौ के आसपास है. 2015 के आधिकारिक आंकड़े जारी होंगे. किसानों की लाशें इस देश में आंकड़ों से ज्यादा कुछ नहीं हैं. जैसे राज्य सरकार का यज्ञ आयोजन एक खबर से ज्यादा कुछ नहीं है.
रविवार को खबर आई कि तेलंगाना में चल रहे इस शाही के यज्ञ के पंडाल में आग लग गई. यह पंडाल 7 करोड़ रुपये की लागत से बना था. सच कहूं, इस खबर से मुझे खुशी हुई. किसानों की लाशों पर होने वाले सरकारी यज्ञ में आग ही लगनी चाहिए. इन सरकारों के पास घास की रोटियां खा रहे किसानों के लिए कुछ नहीं हैं. रोटी की जगह फिनायल पीकर मरने वाले किसानों के लिए कुछ नहीं है. लेकिन सरकारी यज्ञ कराने के लिए खजाने लुटा रहे हैं. मात्र एक पंडाल पर जितना पैसा खर्च किया गया, उतने में इस साल करीब 1000 किसानों की आत्‍महत्‍या रोकी जा सकती थी.
जिन किसानों की मौत को सरकारी आंकड़ों में आत्महत्या कहा जाता है, वे दरअसल आत्‍महत्याएं नहीं, सरकारी हत्याएं हैं. जनता के हिस्से का धन हवन हो जाता है और जनता भूख से मरती है.
यह वही तेलंगाना राज्‍य है जिसके लिए लंबा संघर्ष चला और सैकड़ों लोगों ने जान गंवाई. अंतत: 2 जून, 2014 को इस 29वें राज्य का गठन हुआ. आजादी के पहले तक तेलंगाना  हैदराबाद निजाम का हिस्‍सा था. बाद में इसे 1956 में नवगठित आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया. तेलंगाना क्षेत्र में आजादी के पहले से असंतोष था, क्योंकि यह क्षेत्र पिछड़ा था और यहां के लोगों को लगता था कि उन्हें सत्ता में उचित भागीदारी और विकास के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं. 1940 के दशक से ही वामपंथी नेता कॉमरेड वासुपुन्यया के नेतृत्व में वामपंथी धड़ा अलग तेलंगाना राज्य की मांग कर रहा था. तेलंगाना क्षेत्र को आंध्र में मिलाए जाने के बाद यहां के छात्रों ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया और अलग राज्य की मांग जोर पकड़ गई. 1969 में इस आंदोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया. उस्मानिया विश्वविद्यालय इस आंदोलन का केंद्र बना.
6 अप्रैल, 1969 को तेलंगाना के समर्थन में उस्मानिया के सैकड़ों छात्रों ने मिलकर तेलंगाना के विरोध में बुलाई गई एक मीटिंग का घेराव किया. यह मीटिंग आंध्र प्रदेश के तेलंगाना विरोधियों ने बुलाई थी. छात्रों की जबरदस्त भीड़ पर पुलिस ने फायरिंग कर दी जिसमें तीन छात्र मारे गए. एक मई को एक बार फिर छात्रों ने तेलंगाना क्षेत्र के लोगों के समर्थन से एक बड़ी रैली निकाली. रैली पर रोक लगाने के बावजूद हजारों की भीड़ जमा हो गई. इस रैली में भी पुलिस फायरिंग हुई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे. 1969 के पूरे तेलंगाना आंदोलन के दौरान पुलिस की गोली से 369 लोगों की जान गई थी. मारे गए लोगों में ज्यादातर उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र थे.
हालांकि, बाद में एम. चेन्नारेड्डी की अगुआई वाली तेलंगाना प्रजा समिति का कांग्रेस में विलय हो गया और फिर यह आंदोलन शांत हो गया. 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने तीन नए राज्यों का गठन किया-उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़. इसके बाद तेलंगाना की मांग फिर से उठी. 2001 में के. चंद्रशेखर राव अलग तेलंगाना का मुद्दा उठाते हुए तेलुगू देशम पार्टी से अलग हुए और तेलंगाना राष्ट्र समिति बना ली. 2014 में तेलंगाना अलग राज्य बना.
तेलंगाना संघर्ष की मुख्य वजह थी कि राज्य का अलग ढंग से विकास होगा और गरीबी दूर होगी. लेकिन नया राज्य बनने के बाद सूखा, गरीबी, भुखमरी, आत्महत्याएं वैसे ही जारी हैं. नये राज्य की नई सरकार शाही यज्ञ कराकर जनता के पैसे फूंक रही है. इतने लंबे संघर्ष के बाद गठित राज्य में भी किसानों को आत्महत्या करनी पड़ रही है.
वे कौन से देवी-देवता हैं जो किसानों की कीमत पर हवि और शमिधा से खुश होंगे और मुख्‍यमंत्री के चंद्रशेखर राव को अभयदान देंगे? ऐसी निर्दयी और अधर्मी सत्ता को फिर-फिर आग लगे. 

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

कांग्रेसी तरीके से बिना जांच की क्लीनचिट


किसी नेता पर गंभीर किस्म के घोटाले में लिप्त होने का आरोप लगने से पहले ही उसे क्लीन चिट कैसे दी जा सकती है? लेकिन भारतीय लोकतंत्र में यह संसदीय रवायत है कि किसी पर आरोप लगने के साथ ही पार्टी और सरकारें उसे क्लीन चिट दे देती हैं. यह घोटाले से निपटने का कांग्रेसी तरीका है. इसी तर्ज पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डीडीसीए मामले में अरुण जेटली पर लगे सभी आरोपों को बे​बुनियाद बता रहे हैं. मोदी ने संसदीय पार्टी मीटिंग में कहा, 'जेटली पाक साफ हैं. जिस तरह हवाला घोटाले में लालकृष्ण आडवाणी बेदाग साबित हुए, वैसे ही जेटली भी बेदाग होकर बाहर निकलेंगे.' अमित शाह पार्टी के अध्यक्ष हैं. वे अपनी पार्टी लाइन की मजबूरी के चलते कदाचार में शामिल लोगों का भी हर तरह से बचाव करेंगे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी अपनी सामूहिक जवाबदेही को ताक पर रखकर बिना किसी जांच पड़ताल के ही जेटली को क्लीन चिट कैसे दे रहे हैं?
भाजपा सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद करीब आठ वर्षों से डीडीसीए में व्याप्त भ्रष्टाचार पर आवाज उठाते रहे हैं. लेकिन उनकी नहीं सुनी गई. अब दिल्ली सचिवालय में छापे के बाद जब आम आदमी पार्टी ने भी इस घोटाले को उछाला तो यह मसला हंगामाखेज हो गया. अंतर इतना रहा कि कीर्ति आजाद ने पार्टी लाइन को दरकिनार कर पहले की ही तरह अपनी बात मजबूती से रखी. अब भाजपा कह रही है कि वे कांग्रेस से मिल गए हैं. जिस आरोप के समर्थन में तमाम तथ्य और दस्तावेज मौजूद हैं, सरकार उसकी जांच कराने से क्यों कतरा रही है?
कीर्ति आजाद के लगाए आरोप गंभीर हैं और उनकी निष्पक्ष तरीके से जांच होनी चाहिए. आरोपों के कुछ बिंदु ऐसे हैं जो गंभीर हैं:
डीडीसीए की ओर से 14 ऐसी कंपनियों को लाखों रुपये भुगतान किए गए, जिनके पते फर्जी थे और उनके बारे में जान​कारियां गलत या अधूरी थीं.
फिरोजशाह कोटला स्टेडियम के पुनर्निर्माण में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं हुईं.
निर्माण कंपनियों को एक से ज़्यादा बार भुगतान हुए. एक ही पते और एक ही फोन नंबर वाली कई कंपनियां थीं, जिनसे डीडीसीए के अधिकारियों के निजी संबंध भी जाहिर हुए.
इन कंपनियों के पास पैन कार्ड जैसी बुनियादी चीजें तक नहीं थीं.
विकीलीक्स और सन स्टार अख़बार ने दावा किया था कि डीडीसीए ने लैपटॉप और प्रिंटर किराये पर लिए थे. एक लैपटॉप का प्रतिदिन किराया 16000 रुपए और एक प्रिंटर का किराया 3000 रुपए  प्रतिदिन भुगतान किया गया.
कीर्ति आजाद का आरोप है कि उन्होंने लगातार गड़बड़ियों की जानकारी तत्कालीन अध्यक्ष रहे अरुण जेटली को दी, पर उन्होंने इस पर गौर नहीं किया.
कीर्ति आज़ाद ने कई बार फ़िरोज़शाह कोटला के बाहर धरना दिया. इस मामले में बिशन सिंह बेदी, मदन लाल, मनिंदर सिंह और दूसरे खिलाड़ी भी उनके साथ रहे. फिर भी इस बार उचित कार्यवाही क्यों नहीं हुई?
कीर्ति आजाद का इलजाम है कि खिलाड़ियों के चयन में पैसों का लेनदेन किया जाता है.
सवाल उठते हैं कि क्या जेटली डीडीसीए के रोज़मर्रा के कामकाज से संबंधित थे? क्या उन्होंने कथित भ्रष्टाचार करने वालों का बचाव किया?
कीर्ति आजाद ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो वीडियो जारी किया उसमें जेटली बोलते सुने जा सकते हैं कि 'डीडीसीए का अध्यक्ष होने के नाते ये मेरा दायित्व है कि जिन लोगों पर आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं मैं उनका बचाव करूं.'

आम तौर पर किसी घोटाले में लिप्त आरोपी कभी भी अपना अपराध कबूल नहीं करते. वे अंत समय तक अपने को पाक-साफ बताते रहते हैं. जिस तरह जेटली वीडियो में कह रहे हैं कि मेरा दायित्व है कि जिन लोगों पर आप​राधिक मामले दर्ज हुए हैं मैं उनका बचाव करूं, प्रधानमंत्री मोदी भी वही कर रहे हैं. उनका दायित्व है कि वे अपने ताकतवर मंत्री का बचाव करें. ऐसा करके केंद्र सरकार यह संदेश दे रही है कि जो ताकतवर है, उसपर तमाम आरोपों के बाद भी आंच नहीं आ सकती. आरोपों में कितना दम है, यह तो जांच के बाद ही सामने आ सकता है, लेकिन सवाल यह है कि सत्ता जब भ्रष्टाचार के आरोपी का बचाव करेगी तो आरोपों की जांच कौन करेगा?

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

बुंदेलखंड में अकाल, घास की रोटी खा रहे लोग

योगेंद्र यादव

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में इस वर्ष का सूखा विकराल स्वरुप धारण करता drought effected-जा रहा है। फसलों के नुक्सान, पानी की कमी और रोज़गार के अवसरों की कमी का असर अब सीधे सीधे इंसान और पशुओं के खाने पर दिखाई पड़ने लगा है। इससे यह अंदेशा पैदा होता है कि इस क्षेत्र के सबसे ग़रीब परिवारों के लिए भुखमरी की नौबत आ सकती है। ग़ौरतलब है कि इस क्षेत्र में लगातार तीसरे साल सूखा पड़ रहा है और इस साल ओलावृष्टि/अतिवृष्टि से रवि की फसल भी नष्ट हो गयी थी। इस संकटमय स्थिति का मुकाबला करने के लिए सरकार और प्रसाशन को तुरंत कुछ आपात कदम उठाने होंगे, चूँकि अब तक ये जनता तक राहत पहुंचाने में असमर्थ रहे हैं।
यह निष्कर्ष स्वराज अभियान द्वारा बुंदेलखंड की सभी 27 तहसीलों के 108 गांवों में किये सर्वेक्षण से सामने आया है। इस सर्वे में कुल 1206 परिवारों (सबसे ग़रीब 399 सहित) का इंटरव्यू किया गया। दशहरा और दिवाली के बीच हुए इस सर्वे में स्वराज अभियान और बुंदेलखंड आपदा राहत मंच के कार्यकर्ताओं ने गांव गांव जाकर सूखे के असर का जायज़ा लिया। सर्वे का निर्देशन योगेन्द्र यादव ने संजय सिंह (परमार्थ औरई), ज़्याँ द्रेज़ (राँची) और रीतिका खेड़ा (दिल्ली) के सहयोग से किया। यह निष्कर्ष सर्वे में लोगों द्वारा दी गयी सूचना पर आधारित है। इसकी स्वतंत्र जांच नहीं की गयी है।
बुंदेलखंड में खरीफ की फसल लगभग बर्बाद हो गयी है। ज्वार, बाजरा, मूंग और सोयाबीन उगाने वाले 90% से अधिक परिवारों ने फसल बर्बादी की रपट दी। अरहर और उड़द में यह प्रतिशत कुछ कम था। केवल तिल की फसल ही कुछ बच पायी है। वहां भी 61% किसानों ने फसल बर्बादी का ज़िक्र किया। सूखे के चलते पीने के पानी का संकट बढ़ रहा है। दो तिहाई गांवों में पिछले साल की तुलना में घरेलू काम के पानी की कमी आई है, आधे के अधिक गांव में पानी पहले से अधिक प्रदूषित हुआ है। दो तिहाई गांव से पानी के ऊपर झगड़े की खबर है। पानी का मुख्य स्रोत हैण्ड-पम्प है, लेकिन सरकारी हैण्ड-पम्पों में एक तिहाई बेकार पड़े हैं।
सर्वेक्षण के सबसे चिंताजनक संकेत भुखमरी और कुपोषण से सम्बधित है। पिछले एक महीने के खान-पान के बारे में पूछने पर पता लगा कि एक औसत परिवार को महीने में सिर्फ़ 13 दिन सब्ज़ी खाने को मिली, परिवार में बच्चों या बड़ों को दूध सिर्फ़ 6 दिन नसीब हुआ और दाल सिर्फ 4 दिन। ग़रीब परिवारों में आधे से ज़्यादा ने पूरे महीने में एक बार भी दाल नहीं खायी थी और 69% ने दूध नहीं पिया था। ग़रीब परिवारों में 19% को पिछले माह कम से कम एक दिन भूखा सोना पड़ा।
सर्वे से उभर के आया कि कुपोषण और भुखमरी की यह स्थिति पिछले 8 महीनों में रबी की फसल खराब होने से बिगड़ी है। सिर्फ़ ग़रीब ही नहीं, लगभग सभी सामान्य परिवारों में भी दाल और दूध का
लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वराज अभियान के संयोजक हैं।
लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वराज अभियान के संयोजक हैं।
उपयोग घट गया है। यहां के 79% परिवारों ने पिछले कुछ महीनों में कभी ना कभी रोटी या चावल को सिर्फ़ नमक या चटनी के साथ खाने को मजबूर हुए हैं। 17% परिवारों ने घास की रोटी (फिकारा) खाने की बात कबूली। सर्वे के 108 में से 41 गांवों में इस होली के बाद से भुखमरी या कुपोषण से मौत की रपट भी आई, हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी। इस सर्वे में आसन्न संकट के कई और प्रमाण भी आये। एक तिहाई से अधिक परिवारों को खाना मांगना पड़ा, 22% बच्चों को स्कूल से वापिस लेना पड़ा, 27% को ज़मीन और 24% को जेवर बेचने या गिरवी रखने पड़े हैं।
जानवरों के लिए भुखमरी और अकाल की स्थिति आ चुकी है। बुंदेलखंड में दुधारू जानवरों को छोड़ने की “अन्ना” प्रथा में अचानक बढ़ोत्तरी आई है। सर्वे के 48% गांवों में भुखमरी से 10 या अधिक जानवरों के मरने की ख़बर मिली। वहां 36% गांवों में कम से 100 गाय-भैंस को चारे के अभाव में छोड़ दिया गया है। जानवरों के चारे में कमी की बात 77% परिवारों ने कही तो 88% परिवारों ने दूध कम होने की रपट की। मजबूरी में 40% परिवारों को अपना पशु बेचना पड़ा है और पशुधन की कीमत भी गिर गयी है।
इस संकट से निपटने के लिए सरकार और प्रसाशन को तुरंत कुछ बड़े कदम उठाने होंगे। इस संकट की घड़ी में मनरेगा योजना से कुछ लाभ नहीं हो पाया है। एक औसत ग़रीब परिवार को पिछले 8 महीनों में मनरेगा से 10 दिन की मज़दूरी भी नहीं मिली है। सरकारी राशन की स्थिति भी असंतोषजनक है। ग़रीब परिवारों में आधे से भी कम (केवल 42% के पास) बीपीएल या अंत्योदय कार्ड है।
स्वराज अभियान ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से मिलकर मांग की थी कि कुछ इमरजेंसी कदम उठाये जाएं। यह सर्वेक्षण बुंदेलखंड को लेकर हमारी उस चिंता को सही ठहराता है। सरकार ने इस सम्बन्ध में कई घोषणाएं की हैं। अब ज़रूरत है कि आम लोगों को अविलम्ब राहत पहुंचाई जाए।

(साभार:हिम न्यूजपोस्ट)

शनिवार, 21 नवंबर 2015

वंशवाद: भारतीय राजनीति का डीएनए

बिहार में लालू यादव के दो पुत्रों का विधानसभा में प्लेसमेंट हुआ तो सोशल मीडिया पर अभूतपूर्व शोर मच गया. खासकर भाजपा और उसके समर्थकों की ओर से कहा गया कि अब बिहार बर्बाद हो जाएगा. यह चिंता आज की नहीं है और बिल्कुल जायज है. बरसों से विशेषज्ञों द्वारा यह चिंता जताई जा रही है कि भारतीय राजनीति कुछ परिवारों की गिरवी हुई जा रही है. कांग्रेस पार्टी मूलत: वंशवाद की वाहक है, जहां आज भी राहुल से आगे उस पार्टी में कुछ दिखाई नहीं देता. वंशवाद के मसले पर भाजपा कांग्रेस पर सबसे ज्यादा हमले करती है तो यह देखना चाहिए कि क्या भाजपा वंशवाद से मुक्त है?

भाजपा के लोग अपने बारे में दावा करते हैं कि उनकी पा​र्टी में परिवारवाद नहीं है और वे बेहद लोकतांत्रिक हैं. उनकी पार्टी में रहते हुए कोई भी व्यक्ति सामान्य कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री पद तक जा सकता है. लोकसभा चुनाव में मोदी ने कांग्रेस की वंशवाद की कमजोर नस पकड़ी और इस मसले पर कांग्रेस पर खूब जमकर हमले किए. लेकिन बिहार चुनाव में वंशवाद चुनावी मुद्दा नहीं रहा, जबकि पूरा चुनाव लालू बनाम मोदी लड़ा गया. क्या ऐसा इसलिए था कि राजग गठबंधन में कई चेहरे ऐसे थे जो परिवारिक पृष्ठभूमि के कारण चुनाव लड़ रहे थे?

लालू यादव के दो बेटों के मंत्रिमंडल में दाखिल होने के जितना हल्ला मचा तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सिर्फ लालू यादव के परिवार की शिक्षा या परिवारवादी राजनीति पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? किसी और नेता के बेटों के राजनीति में दाखिल होने पर इतने ही सवाल क्यों नहीं उठे?

भाजपा के वंशवाद का विरोध करने की जमीनी हकीकत यह है कि वह खुद भी वंशवाद की गिरफ्त में है और बाकी दलों को पीछे छोड़ती ऩजर आ रही है. मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी उसी कांग्रेसी परिवारवाद से निकले हैं, जिससे कांग्रेस के राहुल गांधी निकले हैं. यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा, कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह, राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, विजयाराजे सिंधिया की बेटियां वसुंधरा और यशोधरा, वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत, रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह, प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर, मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हैं.

कांग्रेसी नेता भगवत झा आज़ाद के पुत्र कीर्ति आज़ाद भाजपा में ही हैं. लालू के बेटे तेजस्वी यादव की तरह वे भी क्रिकेटर से नेता बने. भाजपा के दिवंगत नेताओं के पुत्र-पुत्रियों को भी उनके रहते या बाद में राजनीति में उतारा गया है. मध्य प्रदेश में दिलीप सिंह भूरिया की पु​त्री निर्मला भूरिया, महाराष्ट्र में दिवंगत प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन, गोपीनाथ मुण्डे की पुत्रियां पंकजा मुण्डे और प्रीतम मुंडे को सक्रिय राजनीति में भागीदारी और पद मिले हैं. दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा के सुपुत्र प्रवेश वर्मा भी सांसद हैं. भाजपा की ओर से दिवंगत नेताओं की पत्नियों को भी बिना किसी राजनीतिक अनुभव या योग्यता के चुनाव लड़ाया जा रहा है. सरदार सदाशिव राव महादिक की ​बेटी गायत्री राजे महादिक, जो दिवंगत तुकोजीराव की पत्नी हैं, इसका ताजा उदाहरण है.

जिस बिहार में लालू को परिवारवाद के लिए कोसा जा रहा है, उसी बिहार में भाजपा के तीन सांसद पुत्रों को टिकट दिया. डॉ. सी. पी. ठाकुर के पुत्र विवेक ठाकुर, अश्विनी चौबे के पुत्र अर्जित शाश्वत और हुकुमदेव नारायण यादव के पुत्र अशोक कुमार यादव  को बिहार विधानसभा में चुनाव में उतारा गया. चारा घोटाले में दोषी ठहराए जा चुके जगन्नाथ मिश्र के बेटे नितीश मिश्र भी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े.

भाजपा की सहयोगी पार्टी हम के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी के पुत्र राजेश चौधरी खगड़िया से चुनाव लड़े और 25 हजार मतों से हार गए. हम के मुखिया जीतनराम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन कुटुंबा सुरक्षित सीट से चुनावी मैदान में थे, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राजेश कुमार ने उन्हें पराजित कर दिया. हम के कद्दावर नेता नरेंद्र सिंह के पुत्र अजय प्रताप को भाजपा ने जमुई से प्रत्याशी बनाया था, वे चुनाव हार गए. उनके दूसरे पुत्र सुमित कुमार को चिराग पासवान के विरोध के कारण जमुई से टिकट नहीं मिला तो सुमित ने चकाई से निर्दलीय चुनाव लड़ा और वे भी हार गए. भाजपा की सहयोगी पार्टी लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के सुपुत्र चिराग पासवान सांसद हैं.

भाजपा की दूसरी सहयोगी पार्टी लोजपा की हालत से कौन परिचित नहीं है. राम विलास पासवान के भाई पशुपति कुमार पारस इसी चुनाव में अलौली से चुनाव लड़े और हारे. लोजपा सांसद रामचंद्र पासवान के पुत्र प्रिंस राज कल्याणपुर सीट से पहली बार चुनावी मैदान में थे, हालांकि जनता ने उन्हें भी नकार दिया. लोजपा ने खगड़िया से सांसद चौधरी महबूब अली कैसर के पुत्र मुहम्मद यूसुफ सलाउद्दीन को मैदान में उतारा और वे 37 हजार मतों के अंतर से चुनाव हार गए. जदयू के शिवानंद तिवारी के बेटे राहुल तिवारी शाहपुर से चुनाव लड़े और जीते.

हाल ही में मोदी के भाई के साले को गुजरात नगरीय निकाय चुनाव में टिकट दिया गया जिस पर काफी घमासान मचा था. इसी चुनाव में तमाम भाजपाई नेताओं के परिजनों को टिकट मिले थे, जिसे अन्य दलों ने चुनावी मुद्दा बनाया था.

मोदी जी ने लोकसभा चुनाव के बाद राज्यों के चुनाव में भी परिवारवाद को मुद्दा बनाया, लेकिन महाराष्ट्र और कश्मीर में भाजपा उसी परिवारवाद की नाव पर सवार होकर सत्ता के समंदर में सैर कर रही है. कश्मीर में मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती की पार्टी उनकी सहयोगी है तो महाराष्ट्र में तीन पीढ़ियों वाली शिवसेना उनकी सहयोगी है.

पंजाब में भाजपा की सहयोगी पार्टी है अकादी दल, जिसके प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री हैं, बेटे को उन्होंने उपमुख्यमंत्री बना रखा है, उनकी बहु केंद्र में मंत्री हैं, दामाद को भी उन्होंने राज्यमंत्री बना रखा है और बेटे के साले को मंत्री पद नवा़जा है. देश में इतने मंत्री पद वाला दूसरा परिवार फिलहाल नहीं है, भले ही लालू पर हल्ला ज्यादा मचा हो.

भाजपा के पितामह अटल बिहारी वाजपेयी भी के दत्तक दमाद रंजन भट्टाचार्य का उनके कार्यकाल में पीएमओ में जो जलवा रह चुका है, वह किसे नहीं याद होगा. रंजन भट्टाचार्य अटल बिहारी वाजपेयी की मित्र राजकुमारी कौल के दामाद थे. अटल जी के समय में कहा जाता था कि राजग सरकार में असल सत्ता उन्हीं के हाथ में थी. लेकिन राजग सरकार के जाते ही वे भी गायब हो गए. बाद में उनका नाम नीरा राडिया टेप कांड में उछला. टेप में वे कहते सुने गए कि 'मुकेश भाई (मुकेश अंबानी) ने मुझसे कहा, कांग्रेस तो अपनी दुकान है.' ये बातचीत यूपीए-2 की सरकार में मंत्री तय करने के मामले में थी जिसमें वे नीरा राडिया को आश्वस्त कर रहे थे कि कांग्रेस में अपनी पैठ के चलते दयानिधि मारन को टेलीकॉम मंत्री नहीं बनने देंगे. सियासी गलियारे में उनकी हनक वंशवाद के बदौलत ही संभव हुई.

लोकतंत्र में राजनीति को कुछ परिवारों की पुश्तैनी धरोहर नहीं होना चाहिए. लेकिन इससे मुक्त होने की शुरुआत कौन करेगा? यूपी में मुलायम के परिवार 18 सदस्य हैं जो सांसद, मंत्री, विधायक अथवा अन्य पदों पर काबिज हैं. लालू इससे अलग नहीं हैं. अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाकर और अब अपने बेटो—​बेटियों को लाकर उन्होंने भी यह साबित किया. दिलचस्प है कि लालू—मुलायम आपस में समधी भी हैं.

वंशवाद भारतीय राजनीति में घुन की तरह लगा है. यह सवाल बेहद जरूरी है लेकिन यह सवाल अगर सबसे नहीं किए जाएंगे तो उस चुनिंदा शोर पर भी सवाल उठने चाहिए.

देश में कौन सी पार्टी है जिस पर आप संतोष जता सकते हैं? कम्युनिष्ट पार्टियों को छोड़ कर सभी पर्टियां व्यक्ति या परिवार केंद्रित हैं. भाजपा का मतलब आज सिर्फ नरेंद्र मोदी रह गया है और कांग्रेस का मतलब है सिर्फ गांधी परिवार. बाकी पार्टियों पर गौर करें—  राजद (लालू परिवार), सपा (मुलायम परिवार), अकाली दल (बादल परिवार) नेशनल काँफ्रेंस (अब्दुल्ला परिवार), लोकदल (चौटाला परिवार), एनसीपी (पवार परिवार), डीएमके (करुणानिधि परिवार), बसपा (मायावती) आम आदमी पार्टी (केजरीवाल), जेडी-यू (नीतीश कुमार), शिव सेना (उद्धव ठाकरे), एमएनएस (राज ठाकरे), एआईडीएमके (जयललिता) बीजू जनता दल (नवीन पटनायक) तेलगुदेशम (चन्द्र बाबू नाइडू) एआईएमएम (ओवैसी) टीसीआर (आरसी राव) तृणमूल काँग्रेस (ममता बनर्जी). इनमें से आप किसके परिवारवाद या व्यक्तिवाद के समर्थन में खड़े होंगे और क्यों? बाकी भाजपा जब वंशवाद का विरोध करती है तो बड़ा ही अश्लील लगता है. 

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

हत्याओं पर कौन उत्‍साहित है?

जनता के पैसे से चलने वाला दूरदर्शन मोहन भागवत को लाइव क्यों प्रसारित करता है? मोहन भागवत के प्रसारण में जनता का कौन सा हित है? वे मोहन भागवत जो मौजूदा भयावह हालात को लेकर इसी भाषण में कहते हैं कि बढ़ा चढ़ा कर पेश की गई छोटी-छोटी घटनाएं हिंदू संस्कृति को नुकसान नहीं पहुंचा सकतीं. छोटी छोटी घटनाएं होती रहती हैं लेकिन ये भारतीय संस्कृति, हिंदू संस्कृति को विकृत नहीं करतीं. उनकी निगाह में देश उत्साहित है. उनके विचार से लगातार दंगों, हत्याओं में भारतीय हिंदू संस्कृति का गौरवगान छिपा है.

दूरदर्शन ने लगातार दूसरी बार मोहन भागवत का भाषण क्यों प्रसारित किया? जनता का पैसा संघ के प्रचार पर क्यों खर्च होगा? पूरी सरकार मोहन भागवत के दरबार में नतमस्तक होकर हिसाब देने क्यों जाती है? जिन लोगों को सोनिया गांधी का सरकार पर नियंत्रण रखना बुरा लगता था, वे अब क्यों चुप हैं. सोनिया गांधी तो फिर भी चुनी हुई सांसद और पार्टी अध्यक्ष रहीं. मोहन भागवत कौन हैं? कोई ऐसा व्यक्ति जो जातीय और धार्मिक आधार पर संगठन चलाता है, वह लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार के ऊपर कैसे है? एक चुनी हुई सरकार के मोहन भागवत के आगे नतमस्तक होने का अर्थ है कि वह पूरे देश के बहुमत को ले जाकर एक ऐसे व्यक्ति और संगठन के सामने डाल देती है जिसका इस गणतंत्र और इस​की प्रक्रियाओं के साथ घात करने का इतिहास रहा है.

भागवत को इस देश में उत्साह नजर आ रहा है. उस समय जब महाराष्ट्र से दिल्ली तक हर असहमति पर कालिख पोती जा रही है. कश्मीर फिर से दंगे की चपेट में है. लंपटों की फौज सबका खाना—पीना, गाना—बजाना अपने कब्जे में लेना चाहती है. जम्मू में धर्म पूछकर हत्या हो रही है. भाजपा शासित प्रदेशों में आधा दर्जन से ज्यादा घोटाले हुए हैं जो हजारों करोड़ के हैं. मध्य प्रदेश में व्यापमं 50 लोगों को लील गया है. यूपी तालिबान हुआ चाहता है. उसी समय मुलायम और मोदी एक दूसरे की तारीफ झोंक रहे हैं. पूरे देश में गुंडाराज—दंगाराज चल रहा है. अफवाह फैलाकर, घर में घुसकर अल्पसंख्यकों की हत्या की जा रही है. कोई गाय बैल लेकर जाता हुआ आदमी मारा जा सकता है. हरियाणा में दलित परिवार को जला दिया गया. दो बच्चे जिंदा जल गए. उसी दिन भागवत कह रहे हैं कि 'देश में बहुत उत्साह है!... छोटी छोटी घटनाएं भारतीय हिंदू संस्कृति का नुकसान नहीं कर सकतीं.' हर घटना पर सत्ता पक्ष की प्रतिक्रियाएं लाशों पर तांडव करने जैसी हैं.

पिछले दो साल के माहौल को लेकर जब लोगों में भय बैठ रहा है. तीन बड़े चिंतकों की हत्या हुई, दादरी की वीभत्स घटना घटी. कई जगह अफवाहों पर दंगे हुए. 40 से ज्यादा लेखक अपना पुरस्कार लौटा चुके हैं. तब सत्ता पक्ष से कोई भी व्यक्ति देश को यह आश्वासन नहीं दे सकता है कि यह घटनाएं रोकी जाएंगी और सबको सुरक्षा दी जाएगी. उल्टे चुने हुए नेता और सांसद संदेश दे रहे हैं कि गाय को नुकसान पहुंचाने वालों की हत्या कर दी जाएगी. क्या मोदी की केंद्र सरकार ने इस देश को गुंडों के हवाले कर दिया है? अब देश में किसी को दोषी ठहराने या सजा देने के लिए कानून नहीं, उन्मादी भीड़ का इस्तेमाल होगा?

मोहन भागवत उस संगठन के मुखिया हैं जिसकी दलितों, महिलाओं, लोकतंत्र, समरसता, बहुलता आदि से शत्रुता है. इसे गंभीरता से समझने की आवश्यकता है. संघ से ही निकले इस देश के मुखिया नरेंद्र मोदी का मानना है कि दलितों का सर पर मैला ढोना आध्यात्मिक काम है! मोहन भागवत का विचार है कि इस धरती पर रहने वाले सभी अनिवार्यत: हिंदू हैं. वे डेढ़ साल से हर किसी को हिंदुआने में लगे हैं. वे आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं. उन्हें दलितों, महिलाओं, गैरहिंदुओं की स्वतंत्र अस्मिता ​बर्दाश्त नहीं है. संघ का मुखपत्र 'पांचजन्य' वेदों के हवाले से गाय के नाम पर इंसान की हत्या को जायज बताता है तो मोहन भागवत इसकी निंदा तक नहीं कर सकते. संघ कहता है कि पांचजन्य हमारा मुखपत्र ही नहीं है.

संघ सिर्फ झूठ, घृणा, उन्माद और वैमनस्य का व्यापारी संगठन है. वे हिंदुओं के हितैषी बनकर न सिर्फ हिंदुओं का, बल्कि देश का ऐसा नुकसान कर रहे हैं जिसकी भरपाई में सदियां लगेंगी. देश आजाद हुआ था, तब संघ को भारत का संविधान, तिरंगा आदि मंजूद नहीं था. उन्हें गांधी, नेहरू के साथ लोकतंत्र से परहेज था, इसलिए गांधी की हत्या कर दी. अंतत: उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में शामिल होकर धर्म की राजनीति शुरू की और अब केंद्र में पहुंच गए तो पूरे देश को तालिबानी रास्ते पर झोंक रहे हैं. वे लगातार हिंदू राष्ट्र बनाने की बात कहते हैं जो इस देश के संविधान और आइडिया आॅफ इंडिया पर हमला है. वे अपनी ही देशवासियों को आपस में लड़ा रहे हैं.

आप हर दिन की छोटी छोटी घटनाओं पर गौर करें. संघ भाजपा समर्थकों के पास हत्याओं के समर्थन में तर्क हैं. वे दो साल की बच्ची को जिंदा जलाने पर शर्मिंदा नहीं हैं. वे किसी को अफवाह के आधार पर मार देने पर शर्मिंदा नहीं हैं. वे बेशर्म तर्क पेश करते हैं. मोहन भागवत से लेकर मंत्री और गली के कार्यकर्ता तक. मोहन भागवत इन्हें मामूली घटनाएं बता हरे तो जनरल वीके सिंह कह रहे हैं कि कोई कुत्ते पर पत्थर फेंके तो सरकार क्या करे? वे मौतों का उपहास करना भरपूर जानते हैं. अखलाक से लेकर दो बच्चियों को जिंदा जलाए जाने तक.

लेकिन चूंकि जब ऐसे संगठन का केंद्रीय सत्ता पर कब्जा है तो वह संसाधनों पर कब्जा करेगा और उसका दुरुपयोग भी करेगा जो कि वह कर रहा है. असल मुद्दा यह है कि जनता को यह सब समझ में आए कि उसके साथ क्या हो रहा है. मोदी और संघ का जो लोग अंध समर्थन करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि इस देश को सदियों के संघर्ष के बाद मिली आजादी और साठ साल के लोकतंत्र पर कैसा खतरा है और किससे है?



मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

भक्तों के नाम खत

प्रिय भक्तों!
आप लोगों से इतनी गालियां खा चुका हूं कि अब आप सब पर गुस्सा आना बंद हो गया है. गीता और महात्मा गांधी की प्रेरणा से मेरा हृदय परिवर्तन हो गया है. मैं स्थि​तप्रज्ञ हो गया हूं. ऐसा इसलिए क्योंकि आप क्रोध के नहीं, आप प्रेम और दया के पात्र हैं. दरअसल, हमको पढ़े लिखे युवा भारत से उम्मीदें ज्यादा थीं. जिस देश का नायक भगत सिंह जैसा 23 साल का युवा हो, जो अपने आदर्शों और अपनी जनता के लिए जानबूझ कर फांसी चढ़ गया, उस देश के युवाओं से यह उम्मीद ज्यादा नहीं है कि वह हमेशा मानवीय मूल्यों और मानवता के पक्ष में खड़ा हो. यह उम्मीद ज्यादा नहीं है कि आपने जो सरकार चुनी है, यदि वह आपकी उम्मीदों पर पानी फेरकर सिर्फ पोलिटिकल स्टंट करती हो तो आप उस पर सवाल उठाकर दबाव बनाएं.

लेकिन अब भरोसा हो गया है कि इस देश का युवा फिलहाल सवाल उठाने वाले को गरियाता है. उसकी नजर में लोकतंत्र, न्याय, समता, सौहार्द, स्वतंत्रता, सेक्युलरिज्म, मुलायम सिंह और ओवैसी पर्यायवाची हैं. वह इन सबको समान भाव से गरियाता है. इसके उलट योगी, साक्षी, संगीत सोम, साध्वी आदि के लिए वह रख सकता है. यह साइकिल एक्सीडेंट की शक्ल में सभ्यता का ध्वंस है कि जिन मूल्यों के लिए लाखों जानें गंवाकर भी हमारा देश टिका रहा था, वे सब हमारे लिए गाली हो गए हैं.

एक डेढ़ साल गाली खाने का अनुभव यह रहा कि जब गालियां देते समय आप हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी, अवधी कुछ भी ठीक से लिख नहीं पाते तो आप पर गुस्सा होना मूर्खता है. अब इसके आगे क्या बचता है! आपसे लोकतंत्र, न्याय, समानता, सेक्युलरिज्म आदि विषयों पर अच्छी समझ की उम्मीद करना संपोले में रीढ़ की हड्डी तलाशना है.

वैसे आपको दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि बहुत बड़ी जनसंख्या ऐसी भी है जो कहने को पढ़ी लिखी है लेकिन उसका आईक्यू आपसे भी कम है. कोई अमेरिका से पढ़कर लौटे और योगी आदित्यनाथ का समर्थक हो जाए तो उसका आईक्यू आदित्यनाथ से भी बदतर है, इसमें कोई शक नहीं. आपके नायक यदि आपसे भी घटिया हैं तो आपको बिना शर्माए अपने आदर्शों पर पुनर्विचार ​कर लेना चाहिए.

तो आपके साथ वे पढ़े लिखे साधू सधुआइन छाप लोग भी दुखी और क्षुब्ध लेखकों को गरिया रहे हैं. लेखकों का कोई बयान पढ़ने की बजाय, उनसे बात करने की बजाय, उनका लिखा पढ़ा कुछ देखने की बजाय, वे विषवमन पर आमादा हैं. आरोप भी कैसे कैसे? अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश सुर्खियां पाने के लिए ऐसा कर रहे हैं. आप ही कहते हैं कि इनको कौन जानता है, इनके ऐसा करने से क्या फर्क पड़ता है, तो उनके पुरस्कार लौटाने से चर्चा भी कौन करेगा? तब उनके बहिष्कार से आपके अखंड आततायी निजाम का क्या उखड़ने वाला है? खैर...

मामला यह है कि इस देश को गुलामी की आदत नहीं गई है. एक आदमी अगर यह एहसास करा दे कि मैं तुम पर जुल्म करता रह सकता हूं और तुम मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकते तो दंडवत हो जाना मोक्ष पा लेने जैसा है. असहमति के लिए विवेक और साहस चाहिए होता है. आपमें इनकी अनुपस्थिति आपकी शर्म का बायस नहीं है.

असली बात यही है कि आंख का पानी मर गया है और अब शर्म नहीं है. आपको तो एक भी लेखक नाम न मालूम होने की शर्म नहीं. उसने कब लिखना शुरू किया, क्या क्या लिखा, कब पुरस्कार मिला, आदि नहीं मालूम होने की भी शर्म नहीं. चौरासी हुआ था तो गुजरात और मुजफ्फरनगर भी होना चाहिए, ऐसे तर्क देने पर भी शर्म नहीं. हत्या और उन्माद की सियासत पर शर्म नहीं. धर्मांध होकर देश की विरासत पर गोबर कर देने पर भी शर्म नहीं. किसी को भी गरियाने पर भी शर्म नहीं. आपको ​किसी राजनीतिक हत्या पर शर्म नहीं. आपको हत्या के बाद हत्या को सरकारी ​तमगा मिलने की भी शर्म नहीं. और तो और, अपने मूर्ख होने पर भी शर्म नहीं.

आपको सिर्फ अपनी मूर्खता, अपने गोबरनुमा झूठ के पहाड़ और बर्बर नेतृत्व पर गर्व है. अच्छा है. ऐसी सोच का नेतृत्व आततायी ही हो सकता है. उसका असली प्रतिनिधि कोई धर्म और राजनीति के बीच लटका लंपट साधु संत ही हो सकता है. ऐसे देश का नेता कोई तड़ीपार ही हो सकता है. साठ साल के आजाद भारत के मुसलसल पतन पर आपको गर्व है, तो यह पतन और गर्व दोनों मुबारक! आपको सिर्फ कांग्रेस या भाजपा में से एक को श्रेष्ठ साबित करना है और उनकी निकृष्ट सियासी प्रतियोगिता में शामिल होने पर गर्व है तो आपको यह प्रतियोगिता मुबारक!

लेकिन मेरे भाई, कोई दुखी या क्षुब्द होना चाहता है तो उसे हो जाने दो. बड़ा एहसान होगा.

आपका
एक अदना सा अवसादग्रस्त

शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

भारतीय राजनीति की बकरी कथा

एक पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त हैं. वे बहुत दिनों तक लोगों को पाकिस्तान भेजने पर उतारू थे. लेकिन न कोई गया, न कोई जाने को तैयार हुआ. जिन लोगों को उनने धमकियाया था, उनको भेज भी नहीं पाए. तो फिर उन्होंने पाकिस्तान भेजने की धमकी देना बंद कर दिया. न कोई पाकिस्तान गया, न ले जाया गया. ठीक वैसे जैसे भव्य राम मंदिर बनना तो था, लेकिन न राम मंदिर बना, न बनाया गया. 25 साल तक उपद्रव जरूर मचाया गया.

कलयुग में समय जल्दी जल्दी बदलता है. अवतार भी जल्दी—जल्दी होते हैं. जितनी बार अपने गांव जाता हूं, किसी नये चौडगरे पर एक नये बाबा उग आते हैं. वे पिछले वाले से ताकतवर होते हैं. इसी तरह से अब सियासत में राम मंदिर से ताकतवर सियासी अवतार गाय का है. गांव के बाहर मुर्दहिया में अब डांगर छोड़ आना मौत को न्यौता देकर आना है. जहां कहीं गाय की टांगनुमा कोई आकृति दिखी, आस्था की विकृति फनफना उठती है. फिर जो आगे आया, वह अब मरा कि तब मरा.

एक दिन तो हद हो गई. मैं बस में था और फोन पर बतिया रहा था. मेरा दोस्त फोन की दूसरी तरफ था. उसने कहा, ससुरे तुम बहुत दुष्ट हो. हमने कहा, अच्छा! और तुम तो अल्ला मियां की गाय हो! मेरे भाई, मैं गाय, अल्ला, मोदी जी को दुख देने वाला पिल्ला और सारे मुहल्ला की कसम खाकर कहता हूं— मेरा किसी को आहत करने का कोई इरादा नहीं था. हमारे गांव में ऐसा बोल देते हैं, हमने भी बोल दिया. लेकिन मेरे मुंह से अल्ला मियां की गाय सुनते ही बगल खड़ा एक मुस्टंडा नाराज हो गया. कहने लगा— अबे देशद्रोही! तुझे पीटकर मार डालूंगा. मैंने पूछा— काहे भाई, हमने तुम्हारी भैंस खोल ली है क्या? और तुनक गया, बोला—पहले तो तुमने गाय को अल्ला से जोड़कर हिंदू द्रोह किया और अब मेरे घर से भैंस बरामद करने की बात कर रहे हो. तुम मेरा धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हो. तुमको छोडूंगा नहीं.
बगल में एक चचा बैठे थे. चचा अपने रौब और दाब से लखनवी प्रतीत होते थे. चचा ने मुस्टंडे की मंशा भांप ली और उसके हस्तास्त्र का आक्षेप प्रक्षेप होने से पहले हस्तक्षेप कर दिया— अरे बबुआ काहे नाराज होते हो, वह बेचारा दढ़ियल खाली पीली खीस ही निपोर रहा है. अपने किसी मित्र मित्राणी से बतिया रहा है. तुम दालभात में मूसलचंद कहां से आ गए?
चचा की मूूंछें रौबदार थीं, डरना बनता था. इसलिए मुस्टंडा कुछ सहम कर बोला— देखो अंकल, इन्होंने गाय को अल्ला से जोड़ दिया है, इन्होंने हमारी भावना को आहत कर दिया है...आप मत बोलिए, यह मेरी आस्था का मामला है...

चचा ने बात काट दी और जोर से डपट कर बोले— अमां डरेबर, गाड़ी रोक. रोक... रोक... रोक...
सुन बचवा, तेरी भावना और आस्था को समेट और निकल इधर से. अब हमारी भावना आहत हो गई, तू बस पर चढ़ा क्यों? चल भाग जंगल निकल. तू यहां दिल्ली में मत रहा कर. लखनऊ तो दिखाई मत पड़ना...
लड़के ने अपने पांव प्रेम से अपने सर पर रखे और रफू हो गया.
चचा मुस्कराए— बौउचट पता नहीं कहां से आ गया... ई जीवधारी जंतु है. हमारे मुहल्ला पहुंच जाए तो खून खराबा करा दे. अरे ई सब तो हम लोग भी बोलते हैं! लखनऊ के हो न बच्चे! हम लोग अइसै बोलते चालते हैं तुम्हारे जइसा ही, अब ई ससुरा भावना और आस्था लेकर आ गया का जाने कहां से.
इतने में हमारा स्टैंड आ गया और हमने राहत की सांस ली, चचा को एक लखनवी मुस्कराहट पास की और उतर गया.
यह उस समय की बात है जब जम्बूदीप में आस्थाएं राजनीति की रखैल हो चुकी थीं. आस्थाओं को कोई धर्म का दलाल अपने तरीके से इस्तेमाल करके जा सकता था. समोसा चटनी, कपडे का रंग, गाय—गोरू, गोबर—मूत्र आदि इस दोहन के हथियार थे. देश में इस बात पर बहस गर्म थी कि किसकी रसोईं में क्या पकना चाहिए.

इस चलन के बाद एक दिन पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त् की घरवापसी हुई और उन्होंने फिर से मुंह खोला तो खोल ही दिया. उन्होंने गाय और बकरी की मांस का सैंपल लिया, उस पर कलात्मक ढंग से आस्था और संस्कार को आरोपित किया और फिर उस पर बहन और पत्नी को आरोपित कर दिया. बवाल मच गया— गाय मां थी तो बहन कैसे हुई? गाय मां भी कैसे हो सकती है? मां गाय कैसे हो सकती है? गाय और बकरी दोनों जानवर हैं तो मां, बहन और पत्नी तीनों में से कोई भी बकरी या गाय क्यों हो जाएगी? जानवर को इज्जत देते देते मनुष्य को जानवर कैसे बनाया जा सकता है?
भक्तों ने कहा, नहीं, यह हो सकता है. यही होता है. जिस तरह आप बहन से संबंध नहीं बनाते है, लेकिन पत्नी से बनाते हैंं, उसी तरह आप बकरी को काट कर खा सकते हैं, लेकिन गाय को नहीं? नारीवादी बहनों ने पूछा— तो भैया, का हम गाय हैं? हमार लाइफ कौनों लाइफ नहीं है का? भक्तों ने कहा, मेरा वो मतलब नहीं था. मेरा मतलब आस्था से था. आप बुरा मत मानिए.
एक बहन मुंहजोर थी, अपने भगत हो चुके तर्क—मुब्तिला भाई को चप्पल लेकर दौड़ा लिया— 'भाग दाढ़ीजार यहां से, एक पे रहता नहीं है. कभी भावना पर आता है तो कभी आस्था पर. कमीना अपनी नौटंकी के चक्कर में हमको गाय बोल गया. दोबारा दिखा इधर तो हलाल करके छोडूंगी.' भक्त भागा तो भाग ही गया.
एक दूसरा भगत भाई भागा—भागा घर पहुंचा. पत्नी झाड़ू लगा रही थी. टीवी पर न्यूज देख कर आई थी. उसका बकरी बना दिया जाना उसे नागवार गुजरा था. भगत को देखा तो उधर मुंह कर लिया. सोचा कि झाड़ू से मारने पर दोष होता है. तब तक भाई बोला— आज फिर बवाल हो गया.
इतना सुनते ही पत्नी ने आव देखा न ताव, लेकर झाड़ू पिल पड़ी. भगत सनाका खा गया. बोला— यह क्या है? कोई संस्कार सीख कर नहीं आई बाप के घर से, पति पर हाथ छोड़ती है.
पत्नी जोर से चिल्लाई— तू बड़ा संस्कारी है, हमको टीवी पर बकरी बना के आया है. जा अपनी मां को गाय बना ले और बैल को बाप. हमको बकरी सकरी बोला तो कर दूंगी मुकदमा. अपने अम्मा के साथ जेल की रोटी तोड़ना. करमजला! मुंहझौंसा!
भगत भाई भागकर घर से बाहर आए और चारपाई पर गिरते हुए सोचा— साला बुरे फंसे. उधर टीवी पर वामियों ने धोया, इधर घर आकर कामिनी ने धोया. अब नहीं जाऊंगा.
आगे की बकरी कथा अभी जारी है.

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

किस्सा-ए-गोरक्षा उर्फ गाय पर चर्चा

आज सुबह सुबह गोरक्षा दल के एक सिपाही से गाली खाकर अपने एक भूतपूर्व मित्र की याद ताजा हो गई. एक महीने पहले की दुर्घटना है जब मेरा वह मित्र शहीद हो गया था.
हुआ यह कि दिल्ली चुनाव में धुलाई हो जाने के बाद संस्कारवान कुनबा कनफ्यूजनात्म अवस्था को प्राप्त हो गया. राम मंदिर में जो निवेश आडवाणी जी ने किया था, वह अब दुहने के काबिल नहीं बचा था. तो कुनबे को अचानक गाय की याद आ गई. गाय दुधारू जानवर तो है ही, सियासत में भी उसे दुहा जा सकता है, जहां दूध की जगह वोट निकलता है.
तो दिल्ली चुनाव के बाद और बिहार चुनाव के पहले उक्त मित्र भूतपूर्व हो गए, क्योंकि वे गोरक्षा के लिए शहादत को तैयार थे.
उनके शहादत की कहानी भी बड़ी मारू है. ऐसे ही एक दिन उनके गायात्मक भावुक उच्छवास के दौरान उनसे पूछ लिया कि मित्र आपने कभी गाय पाली है? कभी पूजा पतिंगा किया है या ऐसे ही भावुक हुए जा रहे हैं? वे तुनक कर बोले— तुम सब वामपंथी लोग देशद्रोही हो. मैंने कहा, हम वामपंथी कैसे हुए? और हम लोग कौन? मैं तो तुम्हारे साथ हूं और तुमको माइनस कर दिया जाए तो अकेला हूं.
तो बोले— तुम लोग मतलब रवीश कुमार वगैरह! तुम सब देशद्रोही हो. अब देशद्रोहियों का सफाया ही एकमात्र चारा है. मैं चकरायमान हो गया. गाय पर चर्चा के दौरान रवीश कुमार, देशद्रोह और सफाये का प्रवेश अवांछनीय था.
उसने आगे कहा, जो गाय नहीं पालता, वह भी दूध पीता है न! उसी तरह जो गाय नहीं पालता, उसे भी तो गाय की रक्षा करने का हक है! कभी गाय पाली नहीं है तो क्या हुआ, यूट्यूब पर तो देखी है! गाय हमारी माता है. गाय पर देवता रहते हैं.
मैंने माहौल सेंसेटिव देखा तो तुम से आप पर आ गया. मेरा मित्र आहतातुर हो गया था. मामला बढ़ने पर वह हत हो सकता था. इसलिए संभलकर मैंने पूछा— जो यूट्यूब वाली गाय आपकी माता है, वह जानवर है जो लावारिस अवस्था में घूमता पाया जाता है और कूड़ा भी खाता है! आप उसे ऐसे नारकीय हालत में कैसे छोड़ देते हैं? गाय पर देवता रहते हैं तो गाय को रस्सी से छांदकर, डंडे से मारकर दुहते हैं, उसके बच्चे यानी आपके भाई के हिस्से का दूध निकाल लेते हैं, उसे कुपोषित बना देते हैं, बच्चा मर जाता है तो इंजेक्शन लगाकर गाय को दुहते हैं. माता के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार होता है. उस पर वास करने वाले देवता भी लगता है सोमरस पीकर मगन रहते हैं. गाय की पीठ पर पड़ने वाला डंडा उनको भी तो लगता होगा. बेचारे क्रिया की प्रतिक्रया नहीं देते, वरना तीन चार हजार कपूतों को तो यूं ही निपटा देते.
दोस्त उखड़ गया. तुम लोग मुसलमानों के कोठे के दलाल हो. मुसलमान गाय खाता है. मुसलमान देशद्रोही है. तुम लोग उनका साथ देते हो. तुम लोग भी देशद्रोही हो. धर्म के नाम पर कलंक हो. मुसलमान आतंकवादी होता है. उसे सबक सिखाना होगा. जो गाय मारता है, उसको काट दिया जाएगा.
मेरी घिग्घी, जहां कहीं होती होगी, वहीं बंध गई. मैंने धीरे से पूछा— मेरे भाई, लेकिन जीव हत्या भी तो पाप है! और गाय पर रहने वाला देवताओं ने आपको कमांडो नियुक्त किया है क्या कि मेरी और गो माता की रक्षा करो? हमारा धरम कहता है कि ईश्वर की मर्जी से पत्ता भी नहीं हिलता. हो सकता है कि ईश्वर की मर्जी हो कि मुसलमान गोमांस खाता हो. उसको उसके कर्म का फल मिलेगा...
वह गुस्से में एकदम तपतपायमान अवस्था में पहुंच गया था, कांपते हुए वह बोला— एक मुल्ले ने अपनी बेटी को दुपट्टा नहीं लेने के लिए मार डाला. आईएसआईएस वाले सबको मार रहे हैं. हिंदुओं पर खतरा है...
उसके बात बदलने से मुझे लगा कि कुछ बात बनेगी. मैंने कहा, मेरे दोस्त, आईएसआईएस वाले मुसलमानों का ही रक्तपान कर रहे हैं, वह भी अरब में, तो हिंदुओं पर खतरा कैसे हो गया? और आप किसी इंसान को मारेंगे तो पाप लगेगा. फिर यमराज आपको ले जाएगा और खौलते तेल से भरे कड़ाहे में आपका पकौड़ा तल देगा. यार तुम तो समझदार आदमी हो. इहलोक को नरक बनाने से परलोक का कैसा संबंध है?
वह फुफकारीय अवस्था में फेचकुर छोड़ते हुए बोला— तुम पक्के वामपंथी हो, तुम देशद्रोही हो. तुम सबकी आत्मा रूस में बसती है. तुम सब भारत के लिए खतरा हो...
इस छोटी सी गाय पर चर्चा में रवीश, देशद्रोह, सफाये के बाद यूट्यूब, देवता, मुसलमान, आईएसआईएस, वामपंथ और रूस के अनधिकृत प्रवेश से मैं सनाका खा गया. सारे तर्क तेल लेने चले गए और मैं अपने घर चला गया.
इस तरह मेरा एक अभूतपूर्व मित्र भूतपूर्व हो गया.

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

गांधी के नाम पर भी झूठ?

राकेश सिन्हा नाम के एक व्यक्ति संघ विचारक के तौर पर टीवी चैनल पर आते हैं. बरखा दत्त के साथ डिबेट में कह रहे थे कि गांधी बूचड़खाने बंद करने के समर्थक थे. मनीष तिवारी ने गांधी का बयान पढ़कर सुनाया तो राकेश सिन्हा पूछ रहे थे कि ऐसा गांधी ने कहां पर कहा है? यह गलत बयान है. अब या तो उन्होंने गांधी को कभी नहीं पढ़ा या फिर राष्ट्रवाद की तरह गांधी का भी धूर्ततापूर्ण इस्तेमाल करना चाहते हैं. गांधी ने ऐसा कहा है और बार बार कहा है. गांधी ने धर्म को भले हमेशा ऊपर रखा हो, लेकिन गांधी ने कभी इंसान की हत्या की वकालत नहीं की, बल्कि यह कहा कि मैं गाय को मर जाने दूंगा लेकिन इंसान को बचाउंगा. राकेश सिन्हा को गांधी वांग्मय पढ़ना चाहिए और यह समझना चाहिए कि बाकी लोग जो गांधी के नाम का नारा नहीं लगाते, वे भी गांधी को पढ़ते हैं. उनको भी पढ़ना चाहिए और घृणापूर्ण विचारों का प्रसार नहीं करना चाहिए. ऐसा करना आइडिया आॅफ इंडिया के खिलाफ तो है ही, देश के संविधान के भी खिलाफ है. संघ परिवारी जनों को वेद पुराण और उपनिषद छोड़कर पहले संविधान पढ़ना चाहिए.
गांधी के गोरक्षा के बारे में विचार यहां दे रहा हूं. एक हिस्सा मेरे सपनों का भारत से है जो उन्होंने यंग ​इंडिया में लिखा था और दूसरा हिस्सा उनकी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज से है.

''मैं फिर से इस बात पर जोर देता हूं कि... कानून बनाकर गोवध बंद करने से गोरक्षा नहीं हो जाती. वह तो गोरक्षा के काम का छोटे से छोटा भाग है.... लोग ऐसा मानते दीखते हैं कि किसी भी बुराई के विरुद्ध कोई कानून बना कि तुरंत वह किसी झंझट के बिना मिट जाएगी. ऐसी भयंकर आत्म—वंचना और कोई नहीं हो सकती. किसी दुष्ट बुद्धि वाले अज्ञानी या छोटे से समाज के खिलाफ कानून बनाया जाता है और उसका असर भी होता है. लेकिन जिस कानून के विरुद्ध समझदार और संगठित लोकमत हो, या धर्म के बहाने छोटे से छोटे मंडल का भी विरोध हो, वह कानून सफल नहीं हो सकता.''
यंग इंडिया, 07.07.1927 से संग्रहीत, मेरे सपनों का भारत, पेज नंबर 137, प्रकाशक— नवजीवन ट्रस्ट


''मैं ख़ुद गाय को पूजता हूं यानी मान देता हूं. गाय हिंदुस्तान की रक्षा करने वाली है, क्योंकि उसकी संतान पर हिंदुस्तान का, जो खेती प्रधान देश है, आधार है. गाय कई तरह से उपयोगी जानवर है. वह उपयोगी जानवर है इसे मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे. लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं. जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू, उपयोगी है.
तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या मैं उसे मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान और गाय दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा. इसलिए मैं कहूंगा कि गाय की रक्षा करने का एक ही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की ख़ातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए.
अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं है. अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती है तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए. यही धार्मिक क़ानून है, ऐसा मैं तो मानता हूं.
हां और नहीं के बीच हमेशा बैर रहता है. अगर मैं वाद-विवाद करूंगा तो मुसलमान भी वाद विवाद करेगा. अगर मैं टेढ़ा बनूंगा, तो वह भी टेढ़ा बनेगा. अगर मैं बालिस्त भर नमूंगा तो वह हाथ भर नमेगा और अगर वह नहीं भी नमे तो मेरा नमना ग़लत नहीं कहलाएगा.
जब हमने ज़िद की तो गोकशी बढ़ी. मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा मानी जानी चाहिए. ऐसी सभा का होना हमारे लिए बदनामी की बात है. जब गाय की रक्षा करना हम भूल गए तब ऐसी सभा की जरूरत पड़ी होगी.
मेरा भाई गाय को मारने दौड़े तो उसके साथ मैं कैसा बरताव करूंगा? उसे मारूंगा या उसके पैरों में पड़ूंगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पांव पड़ना चाहिए तो मुसलमान भाई के पांव भी पड़ना चाहिए. गाय को दुख देकर हिंदू गाय का वध करता है; इससे गाय को कौन छुड़ाता है? जो हिंदू गाय की औलाद को पैना भोंकता है; उस हिंदू को कौन समझाता है? इससे हमारे एक राष्ट्र होने में कोई रुकावट नहीं आई है.
अंत में, हिंदू अहिंसक और मुसलमान हिंसक है, यह बात अगर सही हो तो अहिंसा का धर्म क्या है? अहिंसक को आदमी की हिंसा करनी चाहिए, ऐसा कहीं लिखा नहीं है. अहिंसक के लिए तो राह सीधी है. उसे एक को बचाने के लिए दूसरे की हिंसा करनी ही नहीं चाहिए. उसे तो मात्र चरणवंदना करनी चाहिए. सिर्फ समझाने का काम करना चाहिए. इसी में उसका पुरुषार्थ है.''
हिंद स्वराज, पेज नंबर 32 से 34, प्रकाशक—नवजीवन ट्रस्ट 

रविवार, 4 अक्तूबर 2015

सबसे बड़े बीफ निर्यातक का शाकाहार

भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक है. दूसरे नंबर पर ब्राजील, तीसरे पर आॅस्ट्रेलिया है. भारत अकेले दुनिया भर का 23 प्रतिशत बीफ निर्यात करता है. एक साल में यह निर्यात 20.8 प्रतिशत बढ़ा है. भारत, ब्राजील, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका द्वारा 2015 में एक मिलियन मैट्रिक टन यानी एक अरब किलो बीफ निर्यात करने की योजना है. अकेले भारत और ब्राजील दुनिया के कुल बीफ निर्यात का 43 प्रतिशत सप्लाई करेंगे. पोर्क और पोल्ट्री के बाद बीफ तीसरे नंबर का मांसाहार है, जिसकी दुनिया भर में मांग है. भारत ने पिछले साल 2082 हजार मैट्रिक टन बीफ का निर्यात किया. भारत की छह प्रमुख गोश्त निर्यात करने वाली कंपनियों में से चार के प्रमुख हिंदू हैं. केंद्र में हिंदूवादी सरकार है जिसका मातृ संगठन आरएसएस गोहत्या के खिलाफ तलवारें खींचे खड़ा रहता है. जब एक व्यक्ति को घर से खींच कर इसलिए मार दिया जाता है कि उसके गोमांस खाने की अफवाह उड़ी थी, जब रांची को इसलिए दंगे की आग जला रही है कि किसी धर्मस्थल के सामने मांस का टुकड़ा मिला था, आपको इस शाकाहारी नारे वाली जन्नत की हकीकत मालूम होनी चाहिए.

द हिंदू अखबार लिखता है कि यूएस डिपार्टमेंट आॅफ एग्रीकल्चर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश है. हालांकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि यूएस सरकार बीफ में भैंस का मांस भी शामिल करती है. यानी बीफ मतलब गाय, बैल और भैंस का मांस. इस आंकड़े के मुताबिक, भारत ने 2015 वित्त वर्ष में 2.4 मिलियन टन बीफ निर्यात किया, जबकि ब्राजील ने 2 मिलियन टन और आॅस्ट्रेलिया ने 1.5 मिलियन टन. यह तीनों देश मिलकर दुनिया का 58.7 प्रतिशत बीफ सप्लाई करते हैं.
आईबीएन 7 के मुताबिक, बीते चार साल में भारत में बीफ यानी गोवंश और भैंस के मीट की खपत में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. 2011 में बीफ की खपत 20.4 लाख टन थी, जो 2014 में बढ़कर 22.5 लाख टन हो गई है. भारत ने पिछले वर्ष 19.5 लाख टन बीफ का निर्यात किया. मार्च 2015 के आंकड़ों के हिसाब से, पिछले छह महीने में बीफ निर्यात में 15.58 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है.
2006 में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, भारत की 60 प्रतिशत आबादी मांसाहारी है. The Hindu’s analysis of data from the 2011-12 National Sample Survey के मुताबिक, चार प्रतिशत ग्रामीण और पांच प्रतिशत शहरी भारतीय बीफ खाते हैं.
महाराष्ट्र, ओडिशा, हरियाणा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, राजस्थान, पंजाब, पुड्डुचेरी, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, दिल्ली और बिहार में गौ-हत्या पर प्रतिबंध है. 8 राज्यों में आंशिक प्रतिबंध हैं, ये राज्य हैं- बिहार, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा और चार केंद्र शासित राज्यों, दमन और दीव, दादर और नागर हवेली, पांडिचेरी, अंडमान ओर निकोबार. दस राज्यों, केरल, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और एक केंद्र शासित राज्य लक्षद्वीप में गो-हत्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है. असम और पश्चिम बंगाल में 14 साल से अधिक उम्र की गाय, बैल व भैंस को मारकर उनका मांस खाने की इजाजत है लेकिन उसके लिए 'फिट फॉर स्लॉटर' की सर्टिफिकेट लेना जरूरी है.
नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बनने के लिए चुनाव प्रचार कर रहे थे तो मांस निर्यात पर बड़े चिंतित थे. अपनी एक चुनावी सभा में उन्होंने कहा था, ''...और इसलिए दिल्ली में बहती हुई सरकार का सपना है कि हम हिंदुस्तान में पिंक रेबोल्यूशन करेंगे और पूरे विश्व में मांस-मटन का एक्सपोर्ट का बिजनेस करेंगे और स्वंय इस वर्ष भारत सरकार ने घोषित किया है, पूरे विश्व में बीफ एक्सपोर्ट में हिंदुस्तान नंबर वन है. किन चीजों के लिए गर्व किया जा रहा है भाईयो और बहनों आपका कलेजा रो रहा या नहीं मुझे मालुम नहीं, मेरा कलेजा चीख-चीख कर पुकार रहा है.''
दादरी में गोमांस खाने की अफवाह पर तमाम लोगों की भीड़ ने अखलाक के घर में घुसकर उसकी हत्या कर दी. मंदिर मस्जिद के सामने मांस के टुकड़े मिलने पर रांची को दंगे की आग में झोंक दिया गया. दिल्ली चुनाव के करीब यहां भी ऐसे प्रयास हुए थे. तो क्या पिंक रिवोल्युशन पर प्रधानमंत्री का दिल इसीलिए रो रहा था कि गोमांस और गोहत्या पर तनाव फैले? मांस निर्यात तो वे लगातार बढ़ा रहे हैं, तो देश में बीफ खाने वालों पर इस कदर बवाल क्यों हो रहा है? महाराष्ट्र में जैन पर्व के दौरान शिवसेना का उपद्रव और जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट द्वारा प्रतिबंध लगाने पर भाजपा विधायक द्वारा बीफ पार्टी देने की घोषणा भी ध्यान में रखिए. फिर इसका मकसद साफ होता है कि मांसाहार और शाकाहार पर लोगों को एकदूसरे से लड़ाना ही प्रमुख लक्ष्य है. वरना सरकार सबसे पहले मांस निर्यात रोकती, जिसने बासमती चावल के निर्यात को पीछे छोड़ दिया.
जिस देश की सरकार दुनिया भर को सबसे ज्यादा बीफ खिला रही है, वहां पर एक आदमी के बारे में अफवाह फैलाई जाती है कि वह बीफ खाता है और उसे घर से खींचकर पीटपीट कर मार दिया जाता है. ऐसा करने वाले उस पार्टी और संगठन के समर्थक हैं, जिसकी केंद्र में सरकार है और वह दुनिया भर में सबसे ज्यादा बीफ निर्यात कर रही है. भाजपा के लिए गाय राममंदिर की कैटेगरी का एक मुद्दा है, जिसे वह भुनाना चाहती है. उसे मंदिर नहीं बनवाना था, लोगों को लड़ाना था तो 25 सालों तक लड़ाया. जब वह मुद्दा उतना उकसाने वाला नहीं रहा तो अब गाय मुद्दा है. भाजपा बीफ निर्यात का कीर्तिमान भी बनाएगी और देशवासियों को लड़ाएगी भी. मूर्ख हम और आप हैं.

अब आप तय कीजिए कि आप क्या चाहते हैं और आपकी सरकार क्या चाहती है? दोनों की चाहना से अलग यह भी ध्यान में रखिए कि किसी की खाने पीने की आदत या पसंद पर आप लगाम लगाने वाले आप कौन होते हैं? इस पर भी सोचिए कि एक आदमी की जान की कीमत ज्यादा है या एक जानवर की. जानवर के लिए जान लेने पर उतारू लोग जानवर से कितने कम हैं?

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

पगलाई भीड़ के समर्थन में भाजपा की सक्रियता

भाजपा और आरएसएस अराजकता का दूसरा नाम है. एक भी नेता नहीं है भाजपा में जो पगलाई भीड़ के दुष्कर्म की निंदा करे. वे हत्या को जायज ठहरा रहे हैं. वे गांधी से लेकर अखलाक तक, हर हत्या को जायज कहते आए हैं.
भाजपा सांसद तरुण विजय ने फरमाया है कि शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी सिर्फ हिंदुओं पर ही क्यों डाली जाती है? हमले के भुक्तभोगी होकर भी शांति बनाए रखें!! शायद वे यह कहना चाह रहे हैं कि जो अफवाह फैली वह अखलाक ने ही फैलाई थी और फिर खुद ही मर गया.
केंद्रीय मंत्री और गौतम बुद्ध नगर के सांसद महेश शर्मा ने दादरी में अखलाक की हत्या को 'दुर्घटना' बताया है. उनका कहना है कि इसे सांप्रदायिक रंग दिए बिना एक दुर्घटना के तौर पर लिया जाना चाहिए.
स्थानीय भाजपा नेता विचित्र तोमर का कहना है, 'पुलिस ने बेकसूर लोगों को गिरफ्तार किया है. हम उन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हैं जो बूचड़खानों से जुड़े हैं. इससे हिंदुओं की भावनाएं आहत होती हैं.'
पूर्व भाजपा विधायक नवाब सिंह नागर का कहना है कि उत्तेजना के कारण ऐसी घटना घट गई है. इस घटना में ​जिन युवाओं को गिरफ्तार किया गया है वे 'बेकसूर बच्चे' हैं. 'अगर गोवध और गाय का मांस खाना साबित हो जाता है तो शर्तिया तौर पर पीड़ित परिवार की गलती है. अगर उन्होंने गोमांस खाया है तो वे भी जिम्मेदार हैं. उन्हें यह सोचना चाहिए था कि इसकी प्रतिक्रिया क्या होगी. गोवध हिंदुओं की भावनाओं से जुड़ा हुआ है. स्वाभाविक है कि ऐसी घटनाओं से लोगों का गुस्सा भड़केगा और सांपद्रायिक तनाव फैलेगा. यह ठाकुरों का गांव है और उन्होंने बेहद उग्र तरीके से अपनी भावनाएं जाहिर की हैं।'
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाजपा उपाध्यक्ष श्रीचंद शर्मा ने आरोपियों के बचाव में कहा, 'पीड़ित परिवार के घर से गौमांस मिला है, इसलिए आरोपियों पर हत्या का केस नहीं चलाया जाए. यदि यह मांग नहीं मानी गई तो महापंचायत बुलाई जाएगी. वह व्यक्ति मारपीट से नहीं मरा है, बल्कि उसकी मौत इस अफवाह के सदमे से हुई कि किसी ने उसके बेटे की हत्या कर दी है. जब कोई किसी की भावनाओं को आहत करता है तो इस तरह के संघर्ष होते हैं. हिंदू समाज के लोग गाय की पूजा करते हैं. ऐसे में यदि कोई गाय की हत्या करेगा तो क्या हमारा खून नहीं खोलेगा? हम लोग 11 अक्टूबर को महापंचायत की तैयारी कर रहे हैं. गांव गांव जाकर हम लोगों को लामबंद करेंगे.' मुजफ्फरनगर दंगे में भाजपा की भूमिका याद कीजिए.
पुलिस और आरोपियों को शंका था लेकिन भाजपा के जिलाध्यक्ष ठाकुर हरीश सिंह को पहले से पता है कि गोमांस था. उनका कहना है कि 'स्थानीय लोगों ने पुलिस को गोमांस का सैंपल दिया था लेकिन पुलिस ने गंभीरता से नहीं लिया. इसके बाद लोग उत्तेजित हो गए.' इस हत्या के बाद वह सैंपल कहां गया यह हरीश ही जानें.
भाजपा और संघ का हर नेता भीड़ के भड़कने को जायज कहते हुए हिंदू तालिबान का समर्थन कर रहा है. वे कानून की बात नहीं कर रहे हैं. वे धार्मिक भावनाओं के नतीजतन भड़की भावनाओं को जायज ठहरा रहे हैं. वे आगे भी इस मामले को बढ़ाने की धमकी दे रहे हैं. धर्म की सनक के नाम तैयार हो रही यह भीड़ आज बेगुनाह मुसलमानों को मारकर अपनी घृणा शांत करेगी. लेकिन धार्मिक घृणा यहीं नहीं रुकती. उसका रास्ता आईएसआईएस तक जाता है. कल को यही पागल भीड़ उस हर व्यक्ति को मारेगी जो उस भीड़ में शामिल होने से इनकार करेगा.
भाजपा और संघ से पूछना चाहिए कि वे अपने देश के कुछ नागरिकों को कुछ नागरिकों का दुश्मन साबित करने पर क्यों तुले हैं? 

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

इस सिस्टम में बोलना मना है

महाराष्ट्र और पश्‍चिम बंगाल के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर आने वाली नागरिक टिप्पणियों से घबरा गई है. यह फिजूल की घबराहट ऐसी बौखलाहट में बदल गई कि एक दलित चिंतक कंवल भारती को सरकार की आलोचना में पोस्ट डालने पर गिरफ्तार कर लिया गया और अब उन पर रासुका लगाने तक की धमकी दी जा रही है. लेखक ने ऐसा क्या कह दिया कि गिरफ्तारी की नौबत आ गई, यह जानने के बाद कोई भी सिर्फ हैरान हो सकता है, क्योंकि लेखक को जिस-जिस टिप्पणी के लिए गिरफ्तार किया गया, उसमें सरकार की मात्र आलोचना भर थी. इस तरह की कार्रवाई का यह पहला मामला नहीं है. इसके पहले पश्‍चिम बंगाल में ममता बनर्जी का कार्टून बनाकर मित्र को ईमेल भेजने वाले जाधवपुर विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र और उनके मित्र को जेल भेज दिया गया था. शिवसेना के पूर्व प्रमुख बाल ठाकरे की मौत के बाद मुंबई ठप हो जाने को लेकर एक युवती ने फेसबुक पर टिप्पणी की, तो उसे और उस पोस्ट को लाइक करने वाली एक अन्य युवती को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. इसी तरह युवा कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को उनके कार्टूनों के आधार पर देशद्रोह के आरोप में जेल भेजा गया और उनकी वेबसाइट को बंद कर दिया गया.
इन सभी मामलों को देखकर तो यही लगता है कि इस लोकतांत्रिक मूल्यों वाले देश में सरकारें नागरिकों के मूलभूत अधिकार-बोलने की आजादी का गला घोंटने को लेकर प्रतियोगिता कर रही हैं. सहज जिज्ञासा हो सकती है कि इन टिप्पणियों में ऐसा क्या था कि सरकारें ऐसी कार्रवाई करने को मजबूर हुईं? इसका जवाब है कि उपर्युक्त सभी मामले कोर्ट में टिक नहीं सके, क्योंकि इन सभी टिप्पणियों में प्रशासन या सरकार की सामान्य आलोचना भर थी, जिसे लेकर ऐसी असहिष्णु कार्रवाइयां की गईं. आज जब दुनिया भर में सोशल साइटों और विभिन्न इंटरनेट माध्यमों पर नागरिक सक्रियताएं ब़ढ रही हैं, लोग जागरूक हो रहे हैं, वे खुलकर सार्वजनिक मंचों से सरकारों की आलोचना करने लगे हैं, क्या इससे भारत में सत्ता पर काबिज लोग भयभीत हैं? इस तरह के हर मामले में प्रशासन की जबरदस्त फजीहत हुई, लेकिन यह सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है. उस पर तुर्रा यह कि समय-समय पर सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की बातें सरकारी महकमों में उठती रहती हैं. हालांकि, यह तब है, जब आज ज्यादातर नेता, मंत्री, यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय के भी आधिकारिक बयान ट्विटर पर जारी किए जाते हैं. हम सभी को यह पता है कि हम जिस तकनीकी युग में प्रवेश कर चुके हैं, वहां इंटरनेट और सोशल मीडिया पर नागरिकों की सक्रियता को अब रोका नहीं जा सकता. बावजूद इसके, सरकारें ऐसी हिमाकत भरी हरकतें कर रही हैं.
दलित चिंतक और लेखक कंवल भारती ने फेसबुक पर लिखा था-आरक्षण और दुर्गा शक्ति नागपाल, इन दोनों ही मुद्दों पर अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार पूरी तरह फेल हो गई है. अखिलेश, शिवपाल यादव, आजम खान और मुलायम सिंह इन मुद्दों पर अपनी या अपनी सरकार की पीठ कितनी ही ठोंक लें, लेकिन जो हकीकत ये देख नहीं पा रहे हैं, (क्योंकि जनता से पूरी तरह कट गए हैं) वह यह है कि जनता में उनकी थू-थू हो रही है और लोकतंत्र के लिए जनता उन्हें नकारा समझ रही है. अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और बेलगाम मंत्री इंसान से हैवान बन गए हैं. ये अपने पतन की पटकथा खुद लिख रहे हैं. सत्ता के मद में अंधे हो गए इन लोगों को समझाने का मतलब है भैंस के आगे बीन बजाना.
उनकी दूसरी टिप्पणी थी-आपको तो यह ही नहीं पता कि रामपुर में रमजान सालों पुराना मदरसा बुलडोजर चलवाकर गिरा दिया गया और संचालक को विरोध करने पर जेल भेज दिया गया, जो अभी भी जेल में ही है. अखिलेश सरकार ने रामपुर में तो किसी भी अधिकारी को निलंबित नहीं किया. ऐसा इसलिए, क्योंकि रामपुर में आजम खान का राज चलता है, अखिलेश का नहीं. इन टिप्पणियों को लेकर किए गए एफआइआर में दूसरी टिप्पणी के अंतिम में एक अतिरिक्त वाक्य है-आजम खान रामपुर में कुछ भी कर सकते हैं, क्योंकि यह उनका क्षेत्र है और उन्हें खुदा भी नहीं रोक सकता है. इसे लेकर आजम खान के सचिव फसाहत अली खान ने रामपुर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि कंवल भारती ने रमजान माह में, आजम खान को खुदा भी नहीं रोक सकता, ऐसा कहकर खुदा की तौहीन की है. उनकी इस टिप्पणी से सांप्रदायिक सौहार्द बिग़ड सकता है. कंवल भारती पर दो वर्गों में वैमनस्य फैलाने के आरोप में धारा-153 ए और धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के आरोप में धारा-295 ए लगाई गई. पुलिस ने छह अगस्त की सुबह उन्हें उनके घर से गिरफ्तार कर लिया. हालांकि उन्हें जब कोर्ट पेश किया गया, तो कोर्ट ने उन्हें जमानत देते हुए कहा कि फेसबुक पर टिप्पणी करना कोई अपराध नहीं है.
इस मसले पर लेखकों-कलाकारों के संगठन जन संस्कृति मंच की ओर से कहा गया कि भारती ने फेसबुक पर जो कुछ लिखा, उसे देखकर इस आरोप के फर्जीपन को समझा जा सकता है. जिस प्रदेश में दलितों पर भयावह अत्याचारों के खिलाफ प्राथमिकी तक दर्ज कराना दूभर हो, वहां जिस तत्परता के साथ भारती जैसे जुझारू दलित चिंतक के खिलाफ झूठे आरोप दर्ज कर कार्रवाई की गई. हाल के दिनों में, सोशल मीडिया पर टिप्पणी को लेकर कार्रवाई करने के कई मामले सामने आए हैं. सरकारें मानवाधिकार हनन और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने में एक-दूसरे से हा़ेड ले रही हैं. उत्तर प्रदेश सरकार कंवल भारती से माफी मांगे और उन पर दर्ज मुकदमा वापस ले. अन्य संगठनों ने भी आंदोलन की धमकी देते हुए कंवल भारती के खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस लेने की मांग की है.
इसके पहले मुंबई में युवतियों और असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी के मामले में भी कोर्ट ने गिरफ्तारी के आधार को ही बेबुनियाद बताकर उन्हें जमानत दी थी. इन दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने तल्ख प्रतिक्रिया दी थी. युवतियों की गिरफ्तारी पर काटजू ने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को लिखा-हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं, न कि किसी तानाशाही व्यवस्था में. हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है. युवतियों ने मुंबई बंद का विरोध किया था, जो कोई अपराध नहीं है, बल्कि जिसने अपराध नहीं किया, उसे गिरफ्तार करना धारा 341 और 342 के तहत अपराध है. जिन पुलिसकर्मियों व अधिकारियों ने दोनों युवतियों की गिरफ्तारी की है, उन्हें निलंबित कर उनपर मुकदमा दर्ज होना चाहिए. युवतियों आईटी एक्ट की धारा 66-ए के तहत गिरफ्तार किया गया था. इसके दुरुपयोग पर सवाल उठाती एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई इसके बाद सरकार ने दिशा-निर्देश जारी किया कि ग्रामीण क्षेत्र में पुलिस उपायुक्त और महानगरों में पुलिस महानिरीक्षक से नीचे रैंक के अधिकारी इस धारा के तहत गिरफ्तारी का आदेश नहीं दे सकते.
भारतीय राजनीति की इस तरह की गैर सोची-समझी कार्रवाइयों को लेकर आम नागरिक को यह जिज्ञासा हो सकती है कि यदि सरकार के कामकाज की मर्यादित आलोचना पर भी जेल हो सकती है, तो लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का क्या अर्थ है? यदि सत्ता में बैठे लोग कानून का मखौल उ़डाते हुए इस तरह की हरकतों को अंजाम देंगे, तो कानून का लागू किया जाना कौन सुनिश्‍चित करेगा?
(यह रिपोर्ट सितंबर, 2013 में चौथी दुनिया साप्ताहिक में छपी थी.)