रविवार, 9 नवंबर 2014

नये उपग्रह की खोज बनाम गोरक्षा

पश्चिमी वैज्ञानिकों ने अभी अभी एक नया ग्रह खोजा. उसी समय भारत के महान शिक्षाविद बाबा बत्रा कह रहे
हैं कि स्कूलों में गोसेवा और सूर्यस्नान पढ़ाया जाए. वे गुजरात में पढ़ाए भी जा रहे हैं. पोप फ्रांसिस ने विज्ञान की बिग बैंग थ्योरी और क्रमिक उद्विकास के सिद्धांत को स्वीकार किया. हमारे एक महा धर्मगुरु बााब रामदेव कह रहे हैं कि 'बच्चों को वैज्ञानिक सिद्धांतों की जगह पढ़ाया जाए कि हम सब ईश्वर की संतान हैं और गुुरुकुल परंपरा फिर से शुरू की जाए.' उनकी वैज्ञानिक खोजों की यात्रा अनवरत जारी है. डार्विन की किताब On the Origin of Species 1859 में ही छप गई थी, जिसने चर्च और धार्मिक मान्यताओं की धज्जियां उड़ाकर सारी अंध—आस्थाओं को ध्वस्त कर दिया था. अब उनका धर्म प्रगतिशीलता दिखाते हुए इतने लंबे धर्म और विज्ञान के संघर्ष के बाद उसको स्वीकृति दे रहा है. ठीक उसी समय भारत के धार्मिक लोग इस बात के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि एक युवक और युवती सार्वजनिक तौर पर हाथ में हाथ डालकर चल कैसे सकते हैं? वे संघर्ष कर रहे हैं कि हिंदू और मुसलमान अगर प्रेम में भी हों, तो शादी कैसे कर सकते हैं? ठीक इसी समय गोहाना के स्कूलों में बच्चों से 20-20 रुपए लेकर उन्हें गोवंश रक्षा के लिए किताब बांटी गई है। बच्चों से कहा गया है कि सरकारी किताब आई है। और मजा देखिए, हमारे परधान सेवक जी एक साल से कहते फिर रहे हैं कि हमें विश्वगुरु बनना है.
मूर्खता की ​हद तक पहुंची अज्ञानता के बादल अभी छंटने हैं. कितने साल लगेंगे? सौ साल? या पांच सौ साल? अभी साधारण सी यह बात समझने में इन लोगों काफी देर है कि इतिहास वही है जिसके बारे में कुछ तथ्य हों. सारे मिथक, सारे गप्प अब इतिहास
बनाकर पेश किए जा रहे हैं. दुनिया आगे जा रही है लेकिन ये भाई लोग पीछे जा रहे हैं.
क्या कीजिएगा. घर में बैठिए, भाड़े चैनल सेट करके भाषण सुनिए, भाड़े के दर्शकों का मोदी..मोदी नारा सुनिए और अपना कपार पीटिए.


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