शनिवार, 31 मई 2014

अच्छे दिन

मित्रों! नई सरकार के आने पर अच्छे दिन आने थे. कहा जा रहा है कि अच्छे दिन आ गए हैं. आइए अच्छे दिनों की पड़ताल करें कि वे कैसे हैं, किसके लिए आए हैं? 

1. गुजरात में दो संवेदनशील फर्जी मुठभेड़ों के केस में सीबीआई के पब्लिक प्रॉसीक्यूटर बदल दिए गए हैं. सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति केस देख रहे सीबीआई के वकील ऐजाज खान और सादिक जमाल केस देख रहे आईएच सैयद को रिलीव कर दिया गया है. ऐजाज खान की जगह पीवी राजू पब्लिक प्रॉसीक्यूटर हांगे. सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति केस में अमित शाह पर आरोप हैं.


2. 2004 में हुए इशरत जहां मुठभेड़ मामले में अभियुक्त आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल को बहाल कर दिया गया है. इस पर मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त जूलियो एफ़ रिबेरियो की प्रतिक्रिया है कि 'ऐसा पहले नहीं होता था, कोई पुलिस अधिकारी अगर किसी आपराधिक मामले में अभियुक्त बनाया गया हो और जेल गया हो तो उसका निलंबन तब तक ख़त्म नहीं होता था जब तक अदालत से वह बरी न हो जाए. यह मैं नया चलन देख रहा हूँ. ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक आप नियमों को बदल नहीं देते हैं. मुझे लगता है कि नियमों को बदल दिया गया है. यह सब कुछ नया है. मैंने पहले ऐसा नहीं सुना था. गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) कह रहे हैं कि ऐसा नियमों के अनुसार किया गया है. मुझे नहीं पता कि एसके नंदा किस नियम का हवाला दे रहे हैं. ये वही सिंघल हैं जिनके घर से सीबीआई को पेन ड्राइव मिली थी, जिसमें जिसमें 267 रिकॉर्डिंग थीं. एक रिकॉर्डिंग में राज्य के क़ानून अधिकारियों और मंत्रियों के बीच इशरत मामले की जाँच को बाधित करने की योजना बनाने की बात थी. एक रिकॉर्डिंग में कथित पूर्व गृह मंत्री अमित शाह और सिंघल के बीच 'साहेब' प्रकरण की बातचीत थी.

3. गुजरात दंगों, बेस्ट बेकरी, जाहिरा शेख कांड और फर्जी मुठभेड़ हत्याकांड मामलों में गुजरात सरकार को सफलतापूर्वक बचाने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील मुकुल रोहतगी नए अटॉर्नी जनरल बन गए हैं. रोहतगी 2जी घोटाले के मामले में कई कॉरपोरेट घरानों के भी वकील हैं. रोहतगी ही हैं जिन्होंने वरुण गांधी को उनके घृणास्पद भाषण मामले में बचाया था.4. 2007 में डीएलएफ को गांधीनगर के प्राइम लोकेशन में औने−पौने के भाव ज़मीन दी थी। राष्ट्रपति को शिकायत की गई कि गांधीनगर की इन्फोसिटी के पास करीब एक लाख वर्गमीटर जमीन डीएलएफ को दी गई। सरकार ने इसका दाम पांच हजार रुपये वर्गमीटर लगाया था जबकि उन दिनों इसका बाजार मूल्य तीस हजार रुपये वगर्मीटर था। रजिस्ट्री और स्टांप ड्यूटी के लिए तय सरकारी कीमत भी 19 हजार रुपये वर्गमीटर थी। इस मामले की जांच जस्टिस एमबी शाह ने की और राज्य सरकार को क्लीन चिट मिली. दिलचस्प है कि यह जमीन सेज़ के नाम पर दी गई थी, लेकिन बाद में डीएलएफ के कहने पर राज्य सरकार ने वहां आईटी पार्क बनाने की इजाजत दे दी। वे जस्टिस शाह अब काले धन के लिए बनी एसआईटी के प्रमुख हैं.
इन सूचनाओं का स्रोत टाइम्स आफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, एनडीटीवी और बीबीसी है. मैं कोई जांच एजेंसी नहीं हूं. कोई अथॉरिटी भी नहीं हूं. यह कोई आरोप नहीं हैं, बस आशंकाएं और जिज्ञासाएं हैं. हो सकता है कि उक्त सभी फैसलों और प्रक्रियाओं में कानूनी तौर पर कोई समस्या न हो, लेकिन लिखित कानूनों के अलावा एक नैतिक कानून भी होता है, जो अलिखित होता है. जिसका पालन अपेक्षित होता है. खासकर तब, जब आप अपने को बेहद ईमानदार, देशभक्त और पारदर्शी कह रहे हों. हर जगह अपने वफादारों या करीबियों की नियुक्ति और उन्हें बचाने की पहल को क्या कहा जाएगा?