शनिवार, 25 जनवरी 2014

साहित्य की सियासत के नामवर

बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक अजित सरकार की हत्या के आरोप में सज़ा काट रहे कुख्यात बाहुबली पप्पू यादव जेल से छूटे तो जेल में लिखी गई अपनी जीवनी द्रोहकाल का पथिक का लोकार्पण कराया. यहां तक ठीक है. क्योंकि कोई भी यह तर्क दे सकता है कि कोई अपराधी भी किताब लिखने का हक़ रखता है और यह तर्क सही भी है कि सिद्ध अपराधी को भी अभिव्यक्ति का उतना ही अधिकार है, जितना की एक सामान्य नागरिक को. लेकिन वामपंथी नेता की हत्या के अपराधी की किताब का विमोचन किया आलोचना के शीर्ष पर विराजमान धुर वामपंथी नामवर सिंह ने. 
उन्होंने स़िर्फ किताब का विमोचन नहीं किया, बल्कि पप्पू यादव की तारीफ़ में कसीदे भी प़ढे. नामवर सिंह ने पप्पू यादव को सरदार पटेल से भी बेहतर नेता बताते हुए कहा कि राजनीति में बहुत कम लोग पढ़ते-लिखते हैं. सरदार पटेल तक आत्मकथा नहीं लिख पाए. आजकल कोई राजनीतिज्ञ आत्मकथा नहीं लिखता. सब लोग जी-हुजूरी करते हैं. किसी भी पार्टी के नेता ख़तरा नहीं उठाना चाहते, पर पप्पू यादव ने अपनी आत्मकथा में साहस का परिचय दिया है. प्रधानमंत्री तक फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं. पप्पू यादव बड़े जिगर वाले आदमी हैं. वे चींटियों के कुचले जाने के डर से अपना अगला क़दम उठाने से नहीं डरते हैं. उनकी हिम्मत की दाद दी जानी चाहिए. 
हिंदी साहित्यिक जगत में यह प्रवृत्ति पाई जाती है कि विरोधी विचार वाले व्यक्ति के साथ मंच साझा करने पर ख़ासा हल्ला मचता रहा है. ख़ासकर वामपंथी रुझान वाले लेखक समुदाय में यह अवधारणा है कि दक्षिणपंथी अथवा हिंदुत्ववादी ताक़तों के समर्थक विचार वाले बुद्धिजीवियों से दूरी बनाकर रखी जाए. ऐसा कई बार हुआ भी है जब लब्ध प्रतिष्ठ लोगों पर ख़ूब हल्ला मचा है. कथाकार उदय प्रकाश ने योगी आदित्यनाथ के हाथों पुरस्कार लिया था, तो उन्होंने लाख सफाई दी लेकिन उनपर बहुत हल्ला मचा और उनकी फिर-फिर भर्त्सना की गई. 
हाल ही में हंस के सालाना कार्यक्रम में अरुंधति राय, वामपंथी कवि वरवरा राव और पूर्व भाजपा नेता गोविंदाचार्य को आमंत्रित किया गया था. अरुंधति इस कार्यक्रम में आई ही नहीं और वरवरा राव दिल्ली तक आकर लौट गए. वरवरा राव के इस फैसले के साथ सभी वामपंथी मज़बूती से ख़डे हुए. लेकिन जब नामवर सिंह ने एक वामपंथी नेता की हत्या के आरोपी की किताब का विमोचन किया तो उनकी वैसी भर्त्सना नहीं हुई. पप्पू यादव की इस किताब के लोकार्पण में नामवर सिंह के अलावा कई नामचीन हस्तियां थीं, जिन्होंने पप्पू यादव की जमकर तारीफ़ की और उन्हें साहसी, विद्रोही, आने वाली पी़ढी के लिए नज़ीर, क्रांतिकारी आदि-इत्यादि के विशेषणों से नवाजा. इनमें मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, गायक अनूप जलोटा, फिल्मकार मुज़फ़्फ़र अली और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह थे, जिन्होंने पप्पू यादव को न स़िर्फ क्लीन चिट दी, बल्कि उन्हें साज़िश का शिकार, संघर्षशील, और साहसी कहा. 
सवाल है कि ऐसी क्या मजबूरी थी कि पप्पू यादव को महिमामंडित करने में
नामवर सिंह जी इन नेताओं के साथ ख़डे हुए? और उक्त कार्यक्रम में पप्पू यादव ने अपने बारे में जो कुछ कहा, वह ख़ास तौर से ग़ौरतलब है. उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति मेरी तरह व्यवस्था से लड़ा, उसका यही हाल हुआ. मेरी ही तरह गुरुनानक देव, गौतम बुद्ध, मोहम्मद साहब तक को अपना घर छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया गया. मैंने शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो मुझे पूंजीपति व शासकवर्ग ने विद्रोही, उग्रवादी, बाहुबली, आतंकवादी घोषित कर दिया. मैं मानवता व इंसानियत का पुजारी हूं. मैं बचपन से ही क्रांतिकारी बनना चाहता था. भगत सिंह व सुभाष बनना चाहता था पर लगता है कि ज़िंदगी ने मुझे नेलसन मंडेला बनाने की ठानी है.
लोकार्पण की ख़बर के बाद कथाकार उदय प्रकाश ने टिप्पणी की कि ‘वक्त बदल गया है. खेत से हल और काग़ज़ से कलम की बेदख़ली और बंदूक के शासन का दौर है यह. जब एंटोनिन अर्ताउ ने कहा था कि अब बर्बरता के रंगमंच ने पुराने, शब्द और लेखक के ज़माने वाले शिथिल थिएटर को विस्थापित कर दिया है. शब्द और शब्दकार दोनों अब मर चुके हैं तो वह इसी बदलाव की ओर इशारा कर रहे थे. 1998 में अजित सरकार की हत्या या चंद्रशेखर की हत्या इस ‘थियेटर आफ़ क्रुएलिटी ’ के जन्म और आधिपत्य का संकेत था. जहां तक नामवर सिंह जी की बात है तो उनका एक ‘कोडेड फ़ार्मूला’ मैं आपको बताता हूं, जिसे जानते सब हैं लेकिन कोई कहता नहीं. रामबाण फ़ार्मूला यह है कि जब लेखक और प्रकाशक के बीच विवाद हो, तो प्रकाशक के साथ रहो. जब प्रशासन और स्टुडेंट के बीच विवाद हो, तो प्रशासन का साथ दो. जब अफ़सर और मातहत की बात हो, तो हमेशा अफ़सर के पक्ष में रहो. जब जातिवाद और उसके विरोध के बीच झगड़े हों, तो सवर्णवाद का साथ दो. जब उत्कृष्टता और मीडियॉकरी के बीच चुनना हो, तो दूसरे को ही चुनो. जब बंदूक और कलम के बीच बहस चले, तो बंदूक के साथ रहो. सामंतवाद और लोमड़ चतुराई यही सीख देते हैं. ’ 
नामवर जी ऐसे बुद्धिजीवी हैं, विवाद जिनका शगल है. राजनीति से उन्हें परहेज नहीं है, न ही सियासी लाभ लेने से उन्हें कोई संकोच है. किसी के विरोध करने न करने से उन्हें कोई फ़़र्क नहीं प़डता, क्योंकि साहित्य जगत में उनका जो कद है, वह छोटे-मोटे विरोध से डिगने वाला नहीं है. उन्हें तानाशाह आलोचक और साहित्य डॉन जैसे विशेषणों से नवाजा जा चुका है. उनके बारे में यह भी मशहूर है कि वे अपने ही विचारों के विरोध में बातें कहते हैं और ख़ूब तालियां बटोरते हैं. हर छोटा-बडा साहित्यकार उनकी एक नजर पाकर धन्य हो जाना चाहता है. शायद यही वजह है कि उनकी ऐसी गतिविधियों पर चुप्पी ही छाई रहती है. 
नामवर जी सियासी गलियारों में चहलकदमी के आदी रहे हैं और गाहे-ब-गाहे विवादों में आते रहे हैं. जिस संघ और भाजपा को वामपंथी बुद्धिजीवी पानी पी-पीकर गालियां देते हैं, नामवर जी को उनसे परहेज नहीं है और ऐसा करके भी वे अपना वामपंथ और आलोचना की शीर्ष सत्ता बचाए रखते हैं. उन्होंने भाजपा नेता जसवंत सिंह की किताब का लोकार्पण किया. उन्होंने भाजपा और संघ के चिंतक और सांसद तरुण विजय की पुस्तक का लोकार्पण किया. वे लालू यादव के फेर में प़डकर भी अपनी फ़ज़ीहत करवा चुके हैं. एक साल पहले बिहार के ही एक और बाहुबली आनंद मोहन को जेल में काव्य प्रतिभा प्राप्त हुई. उनकी किताब राजकमल प्रकाशन से छपी और आमंत्रण कार्ड बांटा गया कि नामवर सिंह किताब का विमोचन करेंगे. हालांकि, किसी कारणवश नामवर सिंह विमोचन कार्यक्रम में नहीं गए. 
आख़िर, जो बुद्धिजीवी इस बात ऐतराज़ करते हैं कि विरोधी विचार वाले के साथ मंच साझा नहीं किया जाना चाहिए, वे नामवर की ऐसी तमाम शिरकतों पर मौन क्यों रहते हैं? यदि नामवर सिंह का किसी भी तरह के आयोजन या किसी भी व्यक्ति के साथ मंच साझा करना माफ़ है, तो बाक़ी लेखकों-बुद्धिजीवियों पर फ़तवा क्यों जारी होता है? यह जानना दिलचस्प है कि नामवर न सिर्फ़ वामपंथी हैं, बल्कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर बनारस से चुनाव लड़ चुके हैं और कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार जनयुग के संपादक भी रह चुके हैं. क्या वामपंथी बुद्धिजीवी उनके बहिष्कार या उनकी तीखी निंदा का साहस जुटा पाएंगे? यदि नहीं, तो क्या इतनी छूट हर बुद्धिजीवी को मिलेगी कि वह जहां, जिस मंच पर चाहे जा सके और विरोधी विचार वाले के साथ अपनी राय रख सके?

कोई टिप्पणी नहीं: