बुधवार, 22 जनवरी 2014

कॉरपोरेट के कंधे पर सवार मोदी लहर

नवंबर में अंग्रेज़ी पत्रिका ओपेन ने टीवी चैनलों पर चलने वाली कुछ ख़बरों का विश्‍लेषण करते हुए लेख छापा कि कैसे नेटवर्क-18 के सभी चैनलों में काम करने वाले पत्रकारों को निर्देश दिए गए हैं कि वे नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नर्म रुख़ अपनाएं. नेटवर्क-18 पर उद्योगपति मुकेश अंबानी का क़ब्ज़ा है. कई पत्रकारों ने कहा कि उन्हें स्पष्ट निर्देश है कि मोदी के ख़िलाफ़ कुछ न छापें. उनका कहना है कि नेटवर्क-18 मीडिया समूह की पूरी रीति-नीति ऊपर से तय होती है. इस समूह के सभी चैनलों में काम करने वाले सभी पत्रकारों को पता है कि मोदी विरोधी ख़बरों को प्रसारित करने के बजाय ठिकाने लगाना है. इस समूह में काम कर रहे ब़डे-ब़डे पत्रकार मोदी पर स़िर्फ मीठा बोलते हैं. अन्य चैनल जैसे-आजतक, टाइम्स नाउ आदि भी किस तरह से मोदी के समर्थन में ही ख़बरें चलाते हैं, पत्रिका इसकी भी प़डताल करती है. जिन चैनलों पर कॉरपोरेट घरानों का क़ब्ज़ा है, उन्हें भी स्पष्ट निर्देश है कि मोदी के प्रति नरमी बरतें और अधिक से अधिक कवरेज दें, उनकी रैली को बिना काटे हुए सीधे प्रसारित करें. मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ कहा जाता है, वह किसी एक व्यक्ति या पार्टी के लिए काम करने लगे, तो इसके क्या निहितार्थ हैं? 

पिछले कुछ महीनों में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में नरेंद्र मोदी को अभूतपूर्व जगहें मिली हैं. बहुत सारे दर्शक और पाठकों के मन में यह सवाल उठता होगा कि भारतीय राजनीति में इतने राजनीतिक दलों की मौजूदगी और सक्रिय हस्तक्षेप होने के बावजूद मोदी को ही क्यों इस तरह से दिखाया जा रहा है. आख़िर नरेंद्र मोदी ने ऐसा कौन-सा कारनामा किया है कि मीडिया, ख़ासकर टीवी चैनलों पर मोदी ही मोदी नज़र आते हैं? क्या नरेंद्र मोदी के प्रशासन में गुजरात ने समृद्ध और गरिमापूर्ण जीवन के लिए वह सबकुछ प्राप्त कर लिया है, जो एक कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य होना चाहिए? क्या गुजरात देश के बाक़ी सारे राज्यों से आगे निकल चुका है? क्या स़डक, बिजली और कुछ कॉरपोरेट कंपनियों की चमक-दमक ही विकास है? इन सब सवालों के जवाब नकारात्मक ही होंगे. तो फिर नरेंद्र मोदी का ऐसा गुणगान क्यों किया जा रहा है? इन सवालों का जवाब बहुत दबे छुपे स्वरूप में मीडिया में उठने लगा है. 
ओपेन पत्रिका के नवंबर अंक में संदीप भूषण ने एक लेख लिखकर इसका जवाब दिया है. सोशल मीडिया पर भी बहुत सारे लोग इस पर चर्चा कर रहे हैं. मोदी पर कॉरपोरेट मीडिया क्यों मेहरबान है, इसके लिए आपको मीडिया की आर्थिकी की प़डताल करनी चाहिए. ज्यादातर जो ब़डे-ब़डे मीडिया समूह हैं, उनमें उद्योगपतियों का पैसा लगा है. देश के 27 टीवी समाचार और मनोरंजन चैनलों पर अंबानी समूह का नियंत्रण है. इनमें नेटवर्क-18 समूह के सीएनएन-आइबीएन, आइबीएन लाइव, सीएनबीसी, आइएन-7, आइबीएन लोकमत और और लगभग हर भाषा में प्रसारित होने वाला ईटीवी समूह शामिल है. इसी तरह एक उदाहरण प्रिंट मीडिया का देखते हैं. डीबी कॉर्प समूह का हिंदी अख़बार दैनिक भास्कर है जो 13 राज्यों से चार भाषाओं में प्रकाशित होता है. इसकी पाठक संख्या 75 लाख है. यह समूह 69 अन्य कंपनियां चलाता है, जो खनन, उर्जा, रीयल एस्टेट और कप़डा उद्योग आदि से जुडी हैं. ये दोनों मात्र दो उदाहरण हैं. यही हालत बाक़ी मीडिया घरानों की भी है. ज्यादातर मीडिया घरानों के हित व्यावसायिक हैं. 
जिस मीडिया घराने पर जिन कंपनियों का नियंत्रण है, वे उनके व्यावसायिक हित के लिए काम करते हैं. अब इन मीडिया घरानों का सीधा फ़ायदा नरेंद्र मोदी का समर्थन करने में है, क्योंकि समूचे कॉरपोरेट जगत का मोदी से व्यावसायिक गठबंधन है और वे मोदी का ज़बरदस्त समर्थन कर रहे हैं. ओपेन पत्रिका ने नेटवर्क-18 समूह में काम कर रहे कई पत्रकारों के हवाले से लिखा है कि उन्हें स्पष्ट निर्देश है कि मोदी से जु़डी नकारात्मक ख़बरें न दिखाई जाएं और उनकी रैलियों का बिना व्यवधान लाइव प्रसारण किया जाए. यह हाल अन्य मीडिया समूहों का भी है. यही कारण है कि मीडिया में मोदी ही मोदी छाए हुए हैं और बाक़ी राजनीतिक दलों की अपेक्षा मोदी को ब़ढत दिलाई जा रही है. 
हाल ही में कांग्रेस पार्टी की ओर से आरोप लगाया गया कि मीडिया मोदी के पक्ष में ख़डा है और राहुल गांधी और कांग्रेस से जु़डी ख़बरें नहीं दिखाता है. कांग्रेस का यह आरोप यूं ही नहीं है. पिछले साल द न्यू यॉर्कर के एक पत्रकार को बेनेट एंड कोलमैन कंपनी के मालिक विनीत जैन ने कहा था कि हमारा अख़बार का व्यवसाय नहीं है. हमारा विज्ञापन का व्यवसाय है. ज़ाहिर है कि कॉरपोरेट समूह अपने हर उद्यमों में फ़ायदा देखते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स अख़बार और टाइम्स नाउ चैनल इसी समूह का है. यह समूह वही बेचता है, जो बिकता है. अभी तक इनकी टीआरपी का साधन अन्ना हजारे थे. अब नरेंद्र मोदी हैं. 
कुछ महीने पहले नेटवर्क-18 समूह से बिना कारण बताए 325 पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया. इसकी वजह यही है कि मीडिया में कॉरपोरेट विरोधी आवाज़ों को दबाया जाए. जो लोग मीडिया की एजेंडा सेटिंग में समूह के वफ़ादार साबित नहीं हो सकते, उनसे मुक्ति पा ली जाए. मीडिया अब विचार अभिव्यक्ति का माध्यम न होकर शायद कॉरपोरेट हितों का पोषक है. इन समूहों को स्वतंत्र विचारों के पत्रकार नहीं, अपने व्यवसाय और पक्षधरता को मूर्तरूप देने के लिए व्यावसायिक सहयोगी चाहिए. मीडिया के एक ध़डे में यह चर्चा है कि उनके यहां काम करने वाले जो भी वाम विचार के लोग हैं, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाए. इससे मीडिया और मोदी का गठबंधन सुचारु ढंग से चल सकेगा. 
इधर कुछ महीनों में में दुनिया के कई ब़डे मीडिया समूहों की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की ख़ूब तारीफ़ की गई. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने-‘धीमे होते भारत का उभरता सितारा’ शीर्षक से लेख छापा. विश्‍वप्रसिद्ध टाइम मैगज़ीन ने भी नरेंद्र मोदी पर कवर स्टोरी छापी-‘मोदी मतलब व्यापार’. मोदी के समर्थक इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी और गुजरात की स्वीकार्यता कहते हैं. मोदी के आलोचक कहते हैं कि ये नरेंद्र मोदी की मीडिया मशीनरी का कमाल है कि दुनिया की बड़ी-बड़ी पत्रिकाएं गुजरात की कथित आर्थिक प्रगति और मोदी का गुणगान कर रही हैं. इस का कारण वे कंपनियां हैं जो मोदी के लिए काम करती हैं. 
नरेंद्र मोदी के लिए क़रीब दो दर्जन कंपनियां काम कर रही हैं, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्टीय स्तर पर मोदी और गुजरात मॉडल का प्रचार-प्रसार देखने का काम करती हैं. वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता के निर्देशन में नीति सेंटर नाम से एक वेब पोर्टल तैयार किया गया है. इस पर मोदी और भाजपा से जु़डी खबरें, तस्वीरें, वीडियो, रेडियो कार्यक्रम और मोदी की सभी रैलियों की विस्तृत कवरेज होती हैं. कंचन गुप्ता के अलावा तवलीन सिंह, स्पप्नदास  गुप्ता, संध्या जैन, जय भट्टाचार्जी समेत दर्जनों पत्रकार और भाजपा के कई ब़डे नेता इस पोर्टल के लिए प्रमोशनल लेख लिखते हैं. इस पोर्टल पर कांग्रेस व अन्य दलों से जु़डी वही ख़बर दिखती है, जिससे उन्हें नुकसान होता हो या एक पार्टी के रूप में उसकी छवि धूमिल होती हो. पोर्टल की घोषणा है कि उसका उद्देश्य ‘परिवर्तन’ के लिए ‘सोच परिवर्तित’ करना है. इसी तरह इंडिया 272+ नाम से एक और वेबसाइट है, जो नरेंद्र मोदी के ऑनलाइन प्रचार का काम कर रही है. इस वेबसाइट का उद्देश्य है, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के मिशन में ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करना और दिल्ली में सरकार बनाने के लिए 272 सीट का आंक़डा जुटाना. यह वेबसाइट भारी संख्या में अभियान चलाकर स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं को जो़ड रही है जो मोदी के लिए ऑनलाइन और ग्राउंड पर प्रचार करेंगे. इस पर मोदी के भाषण, उनके पार्टी नेताओं से ज़ुडी ख़बरें और मोदी का गुणगान करने वाली रिपोर्ट लगाई जाती हैं. इस तरह से और भी कई मीडिया समूह हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर मोदी के प्रचार अभियान में लगे हैं. 
ऐसे सभी पोर्टल और वेबसाइट का उद्देश्य है भाजपा कार्यकर्ताओं को मोदी के प्रचार के लिए सामग्री उपलब्ध कराना, ताकि वे सोशल मीडिया समेत अन्य जगहों पर उनका प्रचार-प्रसार कर सकें. इनके माध्यम से मोदी और गुजरात सरकार के बारे में उजले और कई बार भ्रामक आंक़डे पेश कर सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों का ब्रेनवॉश किया जाता है. इस पूरे अभियान के पीछे गोएबल्स का वह फार्मूला काम कर रहा है कि एक झूठ को सौ बार दोहराया जाए तो वह सच में तब्दील हो जाता है.
नरेंद्र मोदी ने अपने प्रचार-प्रसार के लिए दिल्ली की एक जनसंपर्क कंपनी म्युचुअल पीआर को लगाया है जो गुजरात की एक दूसरी जनसंपर्क कंपनी आकृति मीडिया के साथ मिलकर काम करती है. अलग-अलग स्तर पर कई टीमें बनी हुई हैं जो देश-विदेश में मोदी की छवि चमकाने के लिए काम करती हैं. म्युचुअल पीआर में मैनेजिंग पार्टनर हैं कविता दत्ता, जिनकी 18 लोगों की टीम है. इस टीम का काम है कि भारतीय मीडिया में गुजरात सरकार और मोदी के बारे सकारात्मक कवरेज हो. कविता कहती हैं कि उनका प्रयास होता है कि वे गुजरात सरकार की योजनाओं के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां लोगों तक पहुंचाएं. मोदी भारतीय मीडिया में गुजरात दंगों के बाद से ही मौजूद रहे हैं, लेकिन हाल में उनका अचानक छा जाने की घटना का रहस्य यही कंपनियां हैं जो लगातार मोदी को प्रमोट करने के लिए काम कर रही हैं. इन कंपनियों और मोदी की प्रचार शैली का ही कमाल है कि हाल में हुए हर चुनाव और हर सर्वे रिपोर्ट में मोदी का असर ढूंढा जा रहा है. यह भी मीडिया का फैलाया गया मायाजाल है. 
अमेरिकी कंपनी एप्को से भी मोदी का गठबंधन है. हालांकि, आधिकारिक तौर पर एप्को कहती है कि उसे सिर्फ वाइब्रेंट गुजरात आयो​जन की जिम्मेदारी मिली थी. कालाधन विदेश न जाने का नारा लगाने वाले मोदी को बताना चाहिए कि अपने प्रचार पर करोड़ों करोड़ जो वे खर्च कर रहे हैं, वह कौन सा सफेद धन है? क्या वह जनता का या देश का पैसा नहीं है जो कारपोरेट और विदेशी प्रचार कंपनियों पर लुटा रहे हैं? 
क्योंकि मोदी के प्रचार से हालिया किसी चुनाव में कोई ख़ास फ़र्क प़डा हो, ऐसा देखने में नहीं आया. हाल में कई बड़े मीडिया हाउसेस के सर्वे के मुताबिक़, आगामी लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा को मिलने वाली सीटों में स़िर्फ 15 से 20 सीट का फ़ासला है. 80 के दशक से दोनों पार्टियों के वोट प्रतिशत मे मात्र दो-ढाई फ़ीसद का अंतर रहता है. इस बार भी सारे चुनावी अनुमान यही कह रहे हैं. तमाम सर्वे बता रहे हैं कि दोनों बड़ी पार्टियां यानी भाजपा और कांग्रेस 150 सीट के आसपास रहेंगी. राजग और संप्रग में से कोई गठबंधन दो-सवा दो सौ सीटों के पार जाता नहीं दिख रहा है. अब जब कोई पार्टी 543 सीटों में से 150 के आसपास ही पाएगी तो किस लहर का शोर मचाया जा रहा है. 
इससे साफ़ है कि नरेंद्र मोदी का मीडिया मैनेजमेंट इतना तगड़ा है कि भाजपा को 150 सीट मिलने के अनुमान के बाद भी मोदी नाम की आंधी बताई जा रही है. अगर यह मानें कि सर्वे बहुत बार ग़लत साबित होते हैं तो हालिया चुनावों ने जो संकेत दिया है, वह भी मोदी लहर की हवा निकालता दिख रहा है. चार राज्यों के चुनाव में मोदी का असर कहीं भी नहीं देखा गया. छत्तीसग़ढ में कांग्रेस ने क़डी टक्कर दी. दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस-भाजपा दोनों को धूल चटा दी. राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा की ज़बरदस्त जीत की वजह वहां के भाजपा नेता और विपक्ष की कमज़ोरियां हैं. लेकिन प्रोपेगैंडा के तहत मीडिया में मोदी लहर की चर्चा की जा रही है. विभिन्न सर्वे पर ग़ौर करें तो देश का महज़ 25 प्रतिशत जनता मोदी और भाजपा को वोट देती दिखाई दे रही है. 
अब सवाल उठ रहा है कि वह कौन सी जनता है जहां मोदी की लहर चल रही है? ज़ाहिर है कि मोदी लहर का हल्ला मचाकर बहुसंख्यक जनता का वोट बटोरने का एजेंडा काम कर रहा है. पूर्वोत्तर में भाजपा का नामोनिशान नहीं है. चार दक्षिण-भारतीय राज्यों में भी भाजपा का खाता खुलने के आसार नहीं है. यूपी, बिहार, ओडिशा, पश्‍चिम बंगाल में भी क्षेत्रीय पार्टियों का ही वर्चस्व है और आगामी चुनाव में वे क़डी टक्कर में होंगी. अब सवाल उठता है कि मोदी की लहर कहां है? 
ज़ाहिर है, हक़ीक़त से परे मोदी का शानदार मीडिया मैनेजमेंट उन्हें सारे देश में लोकप्रिय बता रहा है. मोदी किस तरह मीडिया को साधते हैं, इसे ऐसे समझा जा सकता है कि जैसे ही उत्तर प्रदेश की कमान मोदी के घनिष्ट सहयोगी अमित शाह को सौंपी, वे उत्तर प्रदेश में पहुंचते ही अख़बारों के दफ़्तर में भी पहुंचे. आज उत्तर प्रदेश के मीडिया में हवा बदली दिख रही है. यह मोदी के मीडिया मैनेजमेंड का ही कमाल है कि स्वतंत्रता दिवस पर मीडिया ने प्रधानमंत्री के भाषण से ज्यादा मोदी के भाषण को तवज्जो दी. दरअसल, मोदी की नीतियां कॉरपोरेट समर्थन हैं, जिसके कारण कॉरपोरेट मोदी का समर्थन कर रहा है. मोदी भी अपने को पूरी तरह कॉरपोरेट एजेंडे पर चल रहे हैं, जहां मीडिया के द्वारा निजी एजेंडे को पब्लिक एजेंडे में तब्दील करके पेश किया जाता है. 
नरेंद्र मोदी गुजरात दंगों के बाद से मीडिया में चर्चा का विषय बने थे. तब से लगातार वे मीडिया में छाए रहे. मीडिया उन्हें गुजरात दंगों का दोषी ठहराता रहा. मोदी से सवाल करता रहा. लेकिन मोदी इस मामले पर लगभग चुप्पी साधे रहे. इस दौरान मोदी की जितनी चर्चा हुई थी, या कहें दंगों की वजह से जितनी कुख्याति मिली थी, उसे उन्होंने अपनी योग्यता में परिवर्तित करने का अभियान चलाया. कॉरपोरेट मीडिया और विज्ञापन कंपनियों की मदद से मोदी ने उस 12 साल की अपनी देशव्यापी आलोचना को अपने पक्ष में मोड लिया, क्योंकि राष्ट्रीय मीडिया में जितनी आलोचना हुई, उसे उन्होंने गुजरात बनाम मीडिया बनाया. अपनी आलोचना को मोदी ने गुजराती अस्मिता से जो़डकर जनता की सहानुभूति हासिल की और वहां एक के बाद एक चुनाव जीतकर सत्ता में बने रहे. 
मोदी जिस गुजरात के विकास मॉडल का ढोल पीटते हैं, उसमें तमाम मानव विकास सूचकांक और दूसरे पैमाने पर गंभीर ख़ामियां हैं, लेकिन मीडिया इस पर सवाल नहीं उठाता. मीडिया में स़िर्फ मोदी से जु़डी रैलियों और प्रचार अभियान को ही पेश किया जाता है, उनकी आलोचना नहीं. मीडिया मोदी की हर रैली की पूर्व जानकारी देता है कि वे कब, कहां रैली करेंगे. इसके चलते जितनी जनता मोदी की रैली में पहुंचती है, उससे ज्यादा जनता टीवी पर उन्हें सुनती है. चैनल और किसी भी नेता के प्रचार अभियान को इतना कवरेज नहीं दे रहे हैं. मोदी की रैलियों में जुटने वाली भी़ड मीडिया द्वारा मचाए गए शोर का अंजाम है.
मोदी पर मीडिया इस तरह से मेहरबान इसलिए है, क्योंकि मोदी ने कॉरपोरेट जगत को गुजरात में काफ़ी स्थान दिया है, जहां पर वे बिना किसी व्यवधान के फल-फूल सकते हैं. प्रधानमंत्री बनने पर वे देश भर में कॉरपोरेट को अधिक स्पेस देने का वादा भी कर रहे हैं. वे बाज़ारवादी नीतियों को और ज्यादा खोलना चाहते हैं. उनके इस वादे पर कॉरपोरेट बाग-बाग है और वह मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहता है. यह खेल जनता शायद नहीं समझती. अब देखने वाली बात है कि कॉरपोरेट-मोदी और मीडिया का यह गठबंधन कितना रंग लाएगा और जनता के लिए कितना फ़ायदेमंद साबित होगा? 
(चौथी दुनिया में प्रकाशित)

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