गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

सरकारी योजना


जब कोई उच्चारता है शहर
तो मेरे जेहन में कौंध जाता है
एक त्रासदी सा कुछ
मुझे लगता है कि किसी ने
शहर नहीं पुकारा है,
एक जिन्न का आह्वान किया है
ऐसा जिन्न जो बोतल से बाहर आता है
तो बस्तियां तब्दील हो जाती हैं श्मशान में

यहां पर मैं आपको रोककर
यह बताना चाहता हूं
कि इस श्मशान में हर कोई दफ्न नहीं होता
यह जिन्न नरमुंड लीलने से पहले
व्यावसायिक छंटनी करता है
जिसकी जेबें भरी हैं
वह उसका निवाला नहीं है
जिसकी रसोई में निवाला नहीं है
इस जिन्न का निवाला वही है

उंची उंची अट्टालिकाओं वाले इस श्मशान में
कुछ छटपटाती चीखें हैं मेरे दोस्त
इराक, अफगानिस्तान की तरह
कश्मीर और विदर्भ की तरह
इनका चीखना और घुट कर मर जाना
उंचे कान वालों के लिए कोई मुद्दा नहीं हैं

मैं एक ऐसे ही शहर में आ गिरा हूं
जो राजधानी में गढ़े गए जिन्न के चंगुल में है
यहां एक हरे भरे आसमान में
बूढ़े बरगद का खुदकुशी कर लेना
किसी के लिए गौरतलब नहीं है

वार्षिक योजनाओं और बजटों में एक झरोखा है
कभी उसमें झांकना तो पाओगे
फाइलों के बंडल में
एक नर्इ् नई सहेज कर रखी हुई मोटी सी फाइल है
जिसमें उजड़ें घरों को नेस्तनाबूत करने
और भूखों को उन्हीं के खेतों में
बहुत नीचे दफना देने का मसौदा है
इसी से श्मशानों के चमचमाने का
बीजारोपण होना है।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

मां को चिट्ठी


मां! बहुत दुख में हूं। तुम्हारा आंचल सर से हटने के बाद समय बहुत कठिन हो गया। भीतर से बाहर तक बलात्कार, ​नरसंहार, खूनखराबा इसके सिवा कुछ नहीं रह गया। 'इंसान' बनने का जो सपना तुमने मेरी आंखों में डाला था, उसमें खलल पड़ गया है। तमाम बलत्कृत होते, चीखते सपनों के बीच में न कान बंद किया जाता है, न सुना जाता है। आसपास जो है वह बहुत नाकाफी है सुकून से जीने के लिए। यह कोलाहल भरा समय मुझे संज्ञाशून्य किए देता है। मैं एक संज्ञाशून्य यंत्र होता जा रहा हूं।
आज का दिन बहुत भयावह था। रात भी स्याहियों से डूबी हुई, डरावनी सी। रात को देखा कि मैं कहीं से घर लौट रहा हूं। मेरे ठीक आगे खूब मतवाली चाल से एक स्त्री चल रही है। वह कौन थी, नहीं जानता। लेकिन जो भी थी, अपनी थी। नितांत अपनी। सपने में संबंध परिभाषित नहीं होते। वे बस संबंध होते हैं। वह निश्चिंत हो मेरे आगे आगे चल रही थी कि इतने में दो व्यक्ति फुसफुसाते हुए मेरे बगल से गुजरते हैं। एक दूसरे से कहता है कि तुम इस तरफ से उसका रास्ता रोको, मैं उस तरफ से। भागने न पाए।
मुझे महसूस होता है कि वे उस स्त्री पर हमला करने जा रहे हैं। मैं बेचैन होता हूं और दौड़कर उसका हाथ पकड़ता हूं और पूरे वेग से भागता हूं। उससे बोलता हूं कि जितनी तेज दौड़ सको, दौड़ो। वह मेरे साथ घिसटती हुई भागती है। वे हमलावर हम दोनों के पीछे दौड़ते हैं, हमें पकड़ने के लिए। मैं उसका हाथ और कस लेता हूं। पूरे दम से और भागता हूं। इतने में गांव आ जाता है। वही अपना गांव, जहां मैं कभी डरता नहीं था। तुम भी नहीं। बहनें भी नहीं। वह बच जाती है।
मेरी आंख खुल जाती है। यह सपना था और बेहद डरावना था। मैं पसीने से भीगा बिस्तर पर कांप रहा था। जिसे बचाने के लिए नींद की अवचेतना में मैं भागा था, वह कौन थी, नहीं पता। वह शायद तुम थीं। बहन रही होगी। प्रिया रही होगी...कुल मिलाकर वह थी मेरे ही भीतर की स्त्री।
मां, क्या यह सपना सच होगा कि मैं किसी को बलत्कृत न होने दूं? क्या यह संभव है मां? जानती हो, सपने में तो मैंने उसे बचा लिया, ​लेकिन कहीं कुछ था, जो टूटा था। आवाज दिन के उजाले में भी मेरे कानों में चटक रही थी।
उसे बचा कर, इस भय से मुक्त होने की कोशिश करते करते जब दफ्तर पहुंचा तो पाया कि मैं उसे नहीं बचा सका। जिस जमीन पर तुमने हमें खेलना—चलना सिखाया था, उसी जमीन पर एक मंत्री के घर के सामने झाड़ियों में एक बच्ची का बलात्कार कर पत्थरों से उसका सर कुचल दिया गया। उसका शरीर जानवर खा गए थे। लाश से अलग हुआ एक पैर कुत्ता लेकर सड़क पर आ गया तो हल्ला मचा कि यह तो किसी बच्ची का पैर है। पुलिस आई, लाश खोजी गई। आठ साल की बच्ची की लाश। उसकी लाश के पास किसी नरपिशाच की जांघिया भी पड़ी थी, उसके वीर्य और बच्ची के खून से सनी हुई।
मां, मैं खबरनवीस हूं। यह सब आज मैंने अपने हाथों से लिखकर भेजा है। सुबह होगी तो दुनिया इसे पढ़ेगी। यह लोगों के लिए एक खबर होगी। इसे मैंने लिखा है। मेरे हाथों से मुझे खून की बदबू आती है। मेरे कानों में उस बच्ची की चीख सुनाई देती है। मां, मेरे भीतर की स्त्री आज फिर बलत्कृत हुई। मां मैं टूट रहा हूं। मुझे ताकत दो। मैं उसे नहीं बचा सका। रात का सपना दिन में टूट गया। मां बहुत पीड़ा में हूं। मां तुम कहां हो...?