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सरकारी योजना

जब कोई उच्चारता है शहर
तो मेरे जेहन में कौंध जाता है
एक त्रासदी सा कुछ
मुझे लगता है कि किसी ने
शहर नहीं पुकारा है,
एक जिन्न का आह्वान किया है
ऐसा जिन्न जो बोतल से बाहर आता है
तो बस्तियां तब्दील हो जाती हैं श्मशान में

यहां पर मैं आपको रोककर
यह बताना चाहता हूं
कि इस श्मशान में हर कोई दफ्न नहीं होता
यह जिन्न नरमुंड लीलने से पहले
व्यावसायिक छंटनी करता है
जिसकी जेबें भरी हैं
वह उसका निवाला नहीं है
जिसकी रसोई में निवाला नहीं है
इस जिन्न का निवाला वही है

उंची उंची अट्टालिकाओं वाले इस श्मशान में
कुछ छटपटाती चीखें हैं मेरे दोस्त
इराक, अफगानिस्तान की तरह
कश्मीर और विदर्भ की तरह
इनका चीखना और घुट कर मर जाना
उंचे कान वालों के लिए कोई मुद्दा नहीं हैं

मैं एक ऐसे ही शहर में आ गिरा हूं
जो राजधानी में गढ़े गए जिन्न के चंगुल में है
यहां एक हरे भरे आसमान में
बूढ़े बरगद का खुदकुशी कर लेना
किसी के लिए गौरतलब नहीं है

वार्षिक योजनाओं और बजटों में एक झरोखा है
कभी उसमें झांकना तो पाओगे
फाइलों के बंडल में
एक नर्इ् नई सहेज कर रखी हुई मोटी सी फाइल है
जिसमें उजड़ें घरों को नेस्तनाबूत करने
और भूखों को उन्हीं के…

मां को चिट्ठी

चित्र
मां! बहुत दुख में हूं। तुम्हारा आंचल सर से हटने के बाद समय बहुत कठिन हो गया। भीतर से बाहर तक बलात्कार, ​नरसंहार, खूनखराबा इसके सिवा कुछ नहीं रह गया। 'इंसान' बनने का जो सपना तुमने मेरी आंखों में डाला था, उसमें खलल पड़ गया है। तमाम बलत्कृत होते, चीखते सपनों के बीच में न कान बंद किया जाता है, न सुना जाता है। आसपास जो है वह बहुत नाकाफी है सुकून से जीने के लिए। यह कोलाहल भरा समय मुझे संज्ञाशून्य किए देता है। मैं एक संज्ञाशून्य यंत्र होता जा रहा हूं।
आज का दिन बहुत भयावह था। रात भी स्याहियों से डूबी हुई, डरावनी सी। रात को देखा कि मैं कहीं से घर लौट रहा हूं। मेरे ठीक आगे खूब मतवाली चाल से एक स्त्री चल रही है। वह कौन थी, नहीं जानता। लेकिन जो भी थी, अपनी थी। नितांत अपनी। सपने में संबंध परिभाषित नहीं होते। वे बस संबंध होते हैं। वह निश्चिंत हो मेरे आगे आगे चल रही थी कि इतने में दो व्यक्ति फुसफुसाते हुए मेरे बगल से गुजरते हैं। एक दूसरे से कहता है कि तुम इस तरफ से उसका रास्ता रोको, मैं उस तरफ से। भागने न पाए।
मुझे महसूस होता है कि वे उस स्त्री पर हमला करने जा रहे हैं। मैं बेचैन होता हूं …