गुरुवार, 17 जनवरी 2013

एक पुरानी लालटेन


गोल बनाकर बैठे 
दो बहनें और एक मैं 
एक पुरानी लालटेन के गिर्द 
बहनों की आंखों में झांकने के दिन थे वे 
जब हम अपनी—अपनी किताबों की आड़ में 
फुसफसाकर पढ़ा करते थे 
एक दूसरे की होटों की चुप्पी हंसी 
पलकों पर बैठा पिता का भय 
माथे पर चस्पा मां की हथेली

मद्धम नीम उजाले में झांकती
बहनों की डबडबाई आंखें अब भी मेरे साथ हैं
उस पुरानी लालटेन का ढांचा
अब भी रखा है छज्जे पर
जब कभी इकट्ठे होते हैं हम
देखते हैं उस पर छपे हुए हमारे चेहरे

2 टिप्‍पणियां:

geetesh ने कहा…

हाँ मित्र हमारे यहाँ भी टंगी है, पहले एक दिया भी हुआ करता था.
सुन्दर कविता
गीतेश

yashaswi dwivedi ने कहा…

sach main ekdam purene dino ki yad hain...jb bijali ke balb nhi hua karte the ya ...bijali nhi hoti thi....magar lalten ki bhi apni kahani hai jo apki jubani hain.