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चाय बागान के मजदूरों के नाम

चित्र
चाय बागानों में विचरते नरकंकाल टूटी पत्तियों जैसे सूखते महीनों तक रोटियों के इंतजार में पत्थर हुईं आंखें  छटपटातीं, चीखतीं, सूखतीं आतें
उन्हें याद नहीं है कि पिछली बार कब खाया था उन्होंने भर पेट खाना उन्हें याद नहीं कि उनके घर में कब जला था चूल्हा उन्हें घर हैं लेकिन दरो—दीवार और छत नदारद हैं 
मांओं की सूखी छातियां तड़फड़ाती हैं बिलखते बच्चों को देख जो जंगली पौधों की जड़ों से पेट भरने की नाकाम कोशिशें करते करते चीख पड़ते हैं वे केवल रोटी बोलते हैं वे केवल रोटी खोजते हैं सपने में रोटी देखते हैं

उनके कुनबे में लगातार हो रही असंख्य मौतें भी गणनाओं का अनोखा खेल हैं दबी हुई सरकारी फाइलों एनजीओ की नाकाम गणनाओं और कोने में लगी अखबारी रिपोर्टों के
रोज होतीं हैं दस बीस मौतें उदार व्यवस्था के निवाले हैं जिन्हें वह रोज लील जाती है और डकार भी नहीं लेती 
आहिस्ता—आहिस्ता माटी में मिलते जा रहे हजारों लोगों की खामोश मौतों के बारे में किसी ने नहीं सुना राष्ट्रपति को बुखार होने की गर्म चचाओं के बीच जलपाईगुड़ी के नरसंहार के बारे में किसी नहीं सुना लोगों ने बस यह जाना कि जंगली मजदूरों ने भून कर खा लिया  च…

एक पुरानी लालटेन

गोल बनाकर बैठे 
दो बहनें और एक मैं 
एक पुरानी लालटेन के गिर्द 
बहनों की आंखों में झांकने के दिन थे वे 
जब हम अपनी—अपनी किताबों की आड़ में 
फुसफसाकर पढ़ा करते थे 
एक दूसरे की होटों की चुप्पी हंसी 
पलकों पर बैठा पिता का भय 
माथे पर चस्पा मां की हथेली

मद्धम नीम उजाले में झांकती
बहनों की डबडबाई आंखें अब भी मेरे साथ हैं
उस पुरानी लालटेन का ढांचा
अब भी रखा है छज्जे पर
जब कभी इकट्ठे होते हैं हम
देखते हैं उस पर छपे हुए हमारे चेहरे

सृजन की रात

एक काली रात का अँधेरा 
दौड़ता है मेरी रगों में 
अक्सर, जब हम जन रहे होते हैं 
साथ साथ, एक चाँद 
एक बहुत सुन्दर घड़ी में 
होता हूँ मैं तुम्हारे साथ 
और इस श्याम-श्वेत, धूसर रंग से डरी हुई 
भयातुर आँखों वाली तुम 
दुबकी होती हो मेरे सीने में 
मैं एक बाजू में थामे तुम्हें 
दुसरे से लड़ रहा होता हूँ, तमाम स्याहियों से 
बिना तुम्हें खबर किये 
इस दुर्दांत संघर्ष के बावजूद 
तुम्हारी आँखों के उजाले में 
बहुत सुन्दर होती है 
सृजन की हर रात