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युवा लिख रहे हैं लोकतंत्र की नई इबारत

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मेरठ में चौ. चरण सिंह विश्‍वविद्यालय के दीक्षांत समारोह कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय चुनाव आयुक्त वीएस संपत ने कहा कि राजनेताओं के नैतिक आचरण में क्षरण व योग्यता को लेकर उठने वाले सवालों की वजह से राजनीति से युवा वर्ग का मोहभंग हो रहा है. लेकिन हाल के चुनावों में युवाओं ने ज़बर्दस्त भागीदारी की. अगर युवा मतदान में बढ़चढ़ कर हिस्सेदारी करते हैं तो निश्‍चित रूप से नैतिक मतदान का स्तर उठेगा. साथ ही राजनीति को अपराधीकरण से मुक्ति, राजनीतिक पार्टियों की आंतरिक प्रजातांत्रिक कार्यप्रणाली व उनकी आय के स्रोत में पारदर्शिता व धन के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने में सफलता मिलेगी.
यह झूठ के बहुत नजदीक का एक मिथक है कि देश में चुनावी राजनीति के प्रति उदासीनता गहरी होती जा रही है. राजनीतिक विश्‍लेषक योगेंद्र यादव का कहना है कि इसमें सच का अंश महज़ इतना है कि तथाकथित शहराती मध्य-वर्ग में राजनीति, राजनेता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर उदासीनता और द्वेष पनप रहा है.
राजनीति से घृणा करना मानो एक फ़ैशन बन गया है. समाज का ये तबका वोट डालने को मामूली काम मानकर महत्व नहीं देता. इसमें किसी भी क़िस्म की राजनीतिक भागीदार…

आधी सदी में मर गईं 250 भाषाएं

कहा जाता है कि दि किसी सभ्यता अथवा संस्कृति को नष्ट करना है तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए। भाषा किसी समुदाय विशेष की सांस्कृतिक पहचान होती है, जो कि तेजी से नष्ट हो रही है। वैश्वीकरण ने दुनिया को एक गांव में तब्दील करके हमें सिर्फ फायदे पहुंचाए हों, ऐसा नहीं है। इसने हमसे बहुत कुछ छीना है। छोटी-छोटी संस्कृतियां वैश्वीकरण की धारा में तिनकों की तरह बह रही हैं। उनकी बोंली-भाषा, उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान आदि पर गंभीर संकट है। हाल ही में एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि पिछले 50 सालों में भारत में 250 भाषाएं नष्ट हों गईं। सर्वेक्षण में दावा किया गया है भाषाएं अलग-अलग वजहों से ब़डी तेजी से मर रही हैं।
इससे पहले इस तरह का कोई सर्वेक्षण ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेज अधिकारी जॉन अब्राहम ग्रियर्सन की अगुआई में 1894-1928 के बीच इस तरह का भाषाई सर्वे हुआ था। उसके करीब सौ साल बाद भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर नामक संस्था की ओर से भारतीय भाषाओं का लोक सर्वेक्षण (पीएलएसआइ) किया गया। करीब सदी भर बाद अपने तरह का यह पहला सर्वे है। इसमें कहा गया है कि 1961 में भारत में 1100 भाषाएं बोली जाती थीं। पिछले 50…

हर हत्या एक संभावना है

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धरती को कोई झकझोरता है जोर से
तो अक्सर आसमान दरक जाता है
और एक ढहती हुई छत आ गिरती है सुबह के सीने पर
उसी सुबह कोई युवती बिलखती हुई देखती है
अपने दो चार सपनों को पिसते हुए
एक चिड़िया झुंझलाहट में आग लगा देती है
जतन से बनाए गए अपने घोंसले को
बारिश आने या अंडे रखने से ठीक पहले

अभी अभी जागे एक बच्चे की आंख से
काजल बह जाता है
और गहरे हो जाते हैं उसके गाल पर उगे धब्बे
मां सपने देखती है कि शहर सूख गया है
आंचल से कितना भी रगड़ो
कालिख नहीं छूटती

दूधिया जो दूध लाया है
उसका रंग कुछ काला है
सुबह की हवा का मिजाज विषैला है
जंगल में चूहे मारने गए कुछ बच्चों को
खतरा बताकर गोली मार दी गई है
एक बूढ़ा अपंग बाप जूझता अपनी पसलियों से
उन्हें कंधा देना चाहता है
काफी चीख मची है बस्ती में

चौड़ी सड़कों में दबे
बांध के पानी में समा गए
शहर के शोर में बिला गए
तमाम मुर्दे आज इकट्ठा हो गए हैं
उन्होंने अदालत लगा ली है
और इंसाफ पर अड़ गए हैं
हर हत्या एक संभावना हो गई है...।

सरकारी योजना

जब कोई उच्चारता है शहर
तो मेरे जेहन में कौंध जाता है
एक त्रासदी सा कुछ
मुझे लगता है कि किसी ने
शहर नहीं पुकारा है,
एक जिन्न का आह्वान किया है
ऐसा जिन्न जो बोतल से बाहर आता है
तो बस्तियां तब्दील हो जाती हैं श्मशान में

यहां पर मैं आपको रोककर
यह बताना चाहता हूं
कि इस श्मशान में हर कोई दफ्न नहीं होता
यह जिन्न नरमुंड लीलने से पहले
व्यावसायिक छंटनी करता है
जिसकी जेबें भरी हैं
वह उसका निवाला नहीं है
जिसकी रसोई में निवाला नहीं है
इस जिन्न का निवाला वही है

उंची उंची अट्टालिकाओं वाले इस श्मशान में
कुछ छटपटाती चीखें हैं मेरे दोस्त
इराक, अफगानिस्तान की तरह
कश्मीर और विदर्भ की तरह
इनका चीखना और घुट कर मर जाना
उंचे कान वालों के लिए कोई मुद्दा नहीं हैं

मैं एक ऐसे ही शहर में आ गिरा हूं
जो राजधानी में गढ़े गए जिन्न के चंगुल में है
यहां एक हरे भरे आसमान में
बूढ़े बरगद का खुदकुशी कर लेना
किसी के लिए गौरतलब नहीं है

वार्षिक योजनाओं और बजटों में एक झरोखा है
कभी उसमें झांकना तो पाओगे
फाइलों के बंडल में
एक नर्इ् नई सहेज कर रखी हुई मोटी सी फाइल है
जिसमें उजड़ें घरों को नेस्तनाबूत करने
और भूखों को उन्हीं के…

मां को चिट्ठी

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मां! बहुत दुख में हूं। तुम्हारा आंचल सर से हटने के बाद समय बहुत कठिन हो गया। भीतर से बाहर तक बलात्कार, ​नरसंहार, खूनखराबा इसके सिवा कुछ नहीं रह गया। 'इंसान' बनने का जो सपना तुमने मेरी आंखों में डाला था, उसमें खलल पड़ गया है। तमाम बलत्कृत होते, चीखते सपनों के बीच में न कान बंद किया जाता है, न सुना जाता है। आसपास जो है वह बहुत नाकाफी है सुकून से जीने के लिए। यह कोलाहल भरा समय मुझे संज्ञाशून्य किए देता है। मैं एक संज्ञाशून्य यंत्र होता जा रहा हूं।
आज का दिन बहुत भयावह था। रात भी स्याहियों से डूबी हुई, डरावनी सी। रात को देखा कि मैं कहीं से घर लौट रहा हूं। मेरे ठीक आगे खूब मतवाली चाल से एक स्त्री चल रही है। वह कौन थी, नहीं जानता। लेकिन जो भी थी, अपनी थी। नितांत अपनी। सपने में संबंध परिभाषित नहीं होते। वे बस संबंध होते हैं। वह निश्चिंत हो मेरे आगे आगे चल रही थी कि इतने में दो व्यक्ति फुसफुसाते हुए मेरे बगल से गुजरते हैं। एक दूसरे से कहता है कि तुम इस तरफ से उसका रास्ता रोको, मैं उस तरफ से। भागने न पाए।
मुझे महसूस होता है कि वे उस स्त्री पर हमला करने जा रहे हैं। मैं बेचैन होता हूं …

चाय बागान के मजदूरों के नाम

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चाय बागानों में विचरते नरकंकाल टूटी पत्तियों जैसे सूखते महीनों तक रोटियों के इंतजार में पत्थर हुईं आंखें  छटपटातीं, चीखतीं, सूखतीं आतें
उन्हें याद नहीं है कि पिछली बार कब खाया था उन्होंने भर पेट खाना उन्हें याद नहीं कि उनके घर में कब जला था चूल्हा उन्हें घर हैं लेकिन दरो—दीवार और छत नदारद हैं 
मांओं की सूखी छातियां तड़फड़ाती हैं बिलखते बच्चों को देख जो जंगली पौधों की जड़ों से पेट भरने की नाकाम कोशिशें करते करते चीख पड़ते हैं वे केवल रोटी बोलते हैं वे केवल रोटी खोजते हैं सपने में रोटी देखते हैं

उनके कुनबे में लगातार हो रही असंख्य मौतें भी गणनाओं का अनोखा खेल हैं दबी हुई सरकारी फाइलों एनजीओ की नाकाम गणनाओं और कोने में लगी अखबारी रिपोर्टों के
रोज होतीं हैं दस बीस मौतें उदार व्यवस्था के निवाले हैं जिन्हें वह रोज लील जाती है और डकार भी नहीं लेती 
आहिस्ता—आहिस्ता माटी में मिलते जा रहे हजारों लोगों की खामोश मौतों के बारे में किसी ने नहीं सुना राष्ट्रपति को बुखार होने की गर्म चचाओं के बीच जलपाईगुड़ी के नरसंहार के बारे में किसी नहीं सुना लोगों ने बस यह जाना कि जंगली मजदूरों ने भून कर खा लिया  च…

एक पुरानी लालटेन

गोल बनाकर बैठे 
दो बहनें और एक मैं 
एक पुरानी लालटेन के गिर्द 
बहनों की आंखों में झांकने के दिन थे वे 
जब हम अपनी—अपनी किताबों की आड़ में 
फुसफसाकर पढ़ा करते थे 
एक दूसरे की होटों की चुप्पी हंसी 
पलकों पर बैठा पिता का भय 
माथे पर चस्पा मां की हथेली

मद्धम नीम उजाले में झांकती
बहनों की डबडबाई आंखें अब भी मेरे साथ हैं
उस पुरानी लालटेन का ढांचा
अब भी रखा है छज्जे पर
जब कभी इकट्ठे होते हैं हम
देखते हैं उस पर छपे हुए हमारे चेहरे

सृजन की रात

एक काली रात का अँधेरा 
दौड़ता है मेरी रगों में 
अक्सर, जब हम जन रहे होते हैं 
साथ साथ, एक चाँद 
एक बहुत सुन्दर घड़ी में 
होता हूँ मैं तुम्हारे साथ 
और इस श्याम-श्वेत, धूसर रंग से डरी हुई 
भयातुर आँखों वाली तुम 
दुबकी होती हो मेरे सीने में 
मैं एक बाजू में थामे तुम्हें 
दुसरे से लड़ रहा होता हूँ, तमाम स्याहियों से 
बिना तुम्हें खबर किये 
इस दुर्दांत संघर्ष के बावजूद 
तुम्हारी आँखों के उजाले में 
बहुत सुन्दर होती है 
सृजन की हर रात