गुरुवार, 3 मई 2012


आज सांस कुछ मद्धम है
जैसे थाम के तुम्हें
चले थे रेत पर
ज़मीन से कुछ ऊपर उठ
लरजते क़दमों से
आज फिर लौटी है वो सिहरन
थरथराते पत्ते की तरह
जैसे गह के तुम्हारी हथेली
बहे थे हम हवा के साथ साथ
आज फिर से हुआ हूं बेखुद
कि तुममे डूब चला हूं
आओ थाम लो फिर आज
कि मैं बहने लगा हूं

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