शुक्रवार, 23 मार्च 2012

नए चिंतन का समय

( 21 तारीख को जागरण में केंद्र में मंत्री अश्विनी कुमार का एक लेख छपा है। बिना मांगे मैं कपिल सिब्‍बल एंड कंपनी को सलाह दे रहा हूं कि वे इस लेख को पढ़ें। उन्‍हें समझ में आएगा कि मौजूदा व्‍यवस्‍था से न सिर्फ जनता, बल्कि नेताओं का भी दम घुटने लगा है। टीम अन्‍ना और सोशल मीडिया के लोगों पर शिकंजा कस देने से देश नहीं चलता। देश चलने के लिए एक प्रगतिशील व्‍यवस्‍था चाहिए होती है.......................। क्‍या इस लेख में व्‍यक्‍त अश्‍िवनी कुमार की बेचैनी लोगों की बेचैनी नहीं है। ईमानदार स्‍वीकारोक्ति के लिए मैं अश्विनी कुमार को बधाई देता हूं। 
आप भी पढ़ें। )


हमारी राजनीति की दशा से संबंधित कोई भी गहन विश्लेषण यही परिलक्षित करेगा कि संवैधानिक संस्थानों के बीच तनाव व्यवस्था को खतरे में डालने वाला साबित होता है। आज की हमारी राजनीति की पहचान टकराव-विवाद हैं, न कि विचारों के बीच संघर्ष। राजनीतिक धारा अब संभवत: विचार-विमर्श पर आधारित नहीं है। इसका परिणाम यह है कि राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना करने के लिए आम सहमति कायम करने की संभावनाएं कमजोर होती जा रही हैं। पहचान, विभिन्नता, बहुलवाद और संप्रदायवाद से संबंधित बहसों ने विभाजनकारी सुर अपना लिया है। अपने संघीय ढांचे से संबंधित विचार-विमर्श में क्षेत्रीय संवेदनाएं और आकांक्षाएं राष्ट्रीय उद्देश्यों पर भारी पड़ती जा रही हैं। कुल मिलाकर भारत का विचार ही एक जकड़न में नजर आ रहा है। विवादों से चलने वाली इस राजनीति में चुनाव जीतना न केवल अनिवार्य हो गया है, बल्कि इसने एक सनक-जुनून का भी रूप ले लिया है। इस क्रम में अक्सर वर्तमान के लिए भविष्य का बलिदान कर दिया जाता है। चूंकि चुनाव लोक-लुभावन राजनीति के दबावों के कारण झूठे वायदों के मुकाबले बन गए हैं इसलिए यह स्वाभाविक है कि राजनीति ने छल-कपट की एक प्रक्रिया का रूप ले लिया है। 
हमें खुद से यह सवाल करना चाहिए कि क्या हमारा लोकतंत्र तर्क के शासन का सम्मान करता है, जिसमें सत्ता तक पहुंचने की कोशिश को केवल उन्हीं सिरों द्वारा न्यायोचित ठहराया जा सके जो उसके मूल में निहित हैं? विचारों की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए हम क्या कर सकते हैं? क्या हमारा कथित जीवंत लोकतंत्र विचार-विमर्श आधारित शासन के अनुकूल है? क्या हमारी पत्रकारिता समाचारों का इस्तेमाल जोर-जबरदस्ती और रेटिंग की तलाश में करके पंगु हो गई है? विपक्षी विचारों के संपूर्ण और मुक्त विश्लेषण के माध्यम से देश के मूलभूत मुद्दों के नैतिक केंद्र की खोज करने के लिए हम खेल के नियमों को किस तरह परिवर्तित करते हैं? हम एक ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं जिसमें हमारे पास प्रत्येक कठिनाई का समाधान नहीं है, बल्कि प्रत्येक समाधान में हमारे सामने एक कठिनाई है। यह एकदम स्पष्ट है कि पूरी दुनिया के साथ हम इस सदी की जिन वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं उनसे एक विभाजित देश, एक विखंडित राजनीति के जरिए नहीं निपटा जा सकता। यह विडंबना है कि हम एक ऐसे राजनीति तंत्र में काम कर रहे हैं जो परिवर्तनकारी नेतृत्व नहीं पैदा करता। उत्पीड़नकारी दुष्प्रचार की विसंगति (जिसमें हाल के कुछ मीडिया ट्रायल भी शामिल हैं) ने निष्पक्ष अभियोजन और विधि के शासन के सबसे पहले सिद्धांत की ही बलि चढ़ा दी है। इस स्थिति में हमें निष्पक्ष प्रतिक्रिया की सीमाओं पर फिर से विचार करना चाहिए। क्या हम निर्वाचन प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाए बिना अपनी राजनीति को अवैध तरीके से अर्जित की गई धन-संपदा और बाहुबल से मुक्त कर सकते हैं? चुनाव में जीत हासिल करने की क्षमता की परवाह किए बिना क्या हम निर्वाचन प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाने के लिए तैयार हैं? हमें खुद से यह भी सवाल पूछना चाहिए कि क्या संसदीय और विधानमंडलों में बहुमत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर हमेशा समाज में बहुमत की आवाज को परिलक्षित करता है और हमें किस तरह के चुनाव सुधारों की जरूरत है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकारें देश की नैतिक और राजनीतिक चेतना को प्रदर्शित करें? अपनी अभूतपूर्व पहुंच के कारण सोशल मीडिया ने लोकतांत्रिक राजनीति के तौर-तरीकों को नए सिरे परिभाषित करने का काम किया है। हमें खुद से यह सवाल करना होगा कि क्या एक राष्ट्र के रूप में हम राजनीतिक शक्ति के नए रूपों के लिए तैयार हैं जो परंपरागत ढांचों से हटकर हो और जिसमें ज्ञान की दुनिया और मानवता का बहुमत हो। नागरिकों के लिए बुनियादी महत्व वाले मुद्दों पर जो विचलित करने वाली खामोशी नजर आ रही है वही अब हमारे शोर-शराबे वाले लोकतंत्र की पहचान बन गई है। हमें इस पर बहस करनी चाहिए कि क्या शासन को सुरक्षा के नाम पर नागरिकों की मूलभूत स्वतंत्रता की कीमत पर अधिकाधिक अधिकार अपनी झोली में भर लेने चाहिए? क्या हम अपनी बुनियादी आजादी को गंवाए बिना सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते? अगर नहीं तो हम किसके खिलाफ अपने को किस तरह सुरक्षित कर रहे हैं? अपने गणतंत्र के अक्सर टकराते, लेकिन बुनियादी मूल्यों के बीच आदर्श संतुलन क्या होना चाहिए? क्या चुनावों के बाद अलग-अलग उभरने वाले पांच वर्षीय बहुमतों के सामने क्या संवैधानिक गारंटी का सम्मान नहीं होना चाहिए? 
अरब स्पिं्रग, आक्युपाई वाल स्ट्रीट और दूसरे आंदोलनों ने विजयी मुद्रा में यह दावा किया है कि सड़क की शक्ति ने लोकतंत्रों और तानाशाहियों को समान रूप से चेताने का काम किया है। सिविल सोसाइटी और नया मीडिया जिस तरह राजनीतिक क्रियाकलापों की शर्ते नए सिरे से तय कर रहा है उसे देखते हुए हमें नागरिकों के अधिकारों को उनकी जिम्मेदारियों के साथ संतुलित करने के लिए कार्ययोजना का ब्लूप्रिंट तैयार करने की जरूरत है। हमें अपनी राजनीति में आदर्शवाद को फिर से स्थापित करना होगा और देश के बुनियादी मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जतानी होगी। हमें यह खतरा उठाते हुए भी यह काम करना होगा कि चुनाव में विपरीत परिणाम सामने आ सकता है। सवाल यह है कि यदि भारत हार गया तो कौन जीतेगा? आखिरकार प्रगति संबंधी बदलाव का मानक रहन-सहन का स्तर नहीं है, बल्कि जीवन का स्तर है। जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती ने पीढि़यों के बीच समानता का सवाल खड़ा कर दिया है। हमें खुद से यह पूछना चाहिए कि क्या हमारी राजनीति ने टिकाऊ खपत के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पर्याप्त प्रयास किए हैं। सवाल यह भी उभरता है कि क्या एक ऐसा देश जहां की आंतरिक राजनीति जाति, वर्ग, भाषा के समीकरणों पर निर्भर हो, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का प्रभावशाली तरीके से सामना कर सकता है। चुनौती तो कठिन बाहरी वातावरण की भी है और ऊर्जा निर्भरता की भी। चीन का उभार, अस्थिर पश्चिम एशिया और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का बढ़ता खतरा भी गंभीर चुनौतियां प्रस्तुत कर रहा है। हमारे सामने जो चुनौतियां हैं वे एक मजबूत नेतृत्व की मांग करती हैं। हमारे लोकतंत्र को अनिवार्य रूप से विचारों के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। निश्चित ही भारत का भविष्य अतीत पर टिका नहीं है, यह निर्भर है वर्तमान पर, जहां अलग-अलग चीजों को अलग-अलग तरीकों से करने की आवश्यकता है। (लेखक केंद्र में योजना, विज्ञान एवं तकनीक राज्य मंत्री हैं) 

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