सोमवार, 19 मार्च 2012

राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन सकते हैं, नेता नहीं


राहुल गांधी सहित कांग्रेस को उम्‍मीद थी कि वे उत्‍तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव जीत लेंगे। कांग्रेस के रणनीतिकारों को जाने क्‍यों यह गलतफहमी थी कि राहुल और प्रियंका अगर मैदान में उतरेंगे तो प्रदेश की जनता उन्‍हें पलकों पर बिठा लेगी। उन्‍हें विश्‍वास था कि 'मिनी पार्लियामेंट' में उनका परचम फहराएगा। इसके लिए राहुल काफी पहले से ही सक्रिय थे। चुनाव नियराया तो राजनीति में बहुप्रतीक्षित प्रियंका गांधी भी अपने बाल-बच्‍चों समेत उतर आईं। दिग्विजय ने बाटला हाउस का जिन्‍ना बोतल से बाहर लाने की पूरी कोशिश की। सलमान खुर्शीद जी तो इस होड़ में सबसे आगे निकल गए। उन्‍होंने कहा कि वे मुसलमानों के लिए अपनी जान ही दे देना चाहते हैं। लेकिन कांग्रेस के दुर्भाग्‍य और लोकतंत्र के बेहतर भविष्‍य के सौभाग्‍य से जनता ने उनकी जान लेने से मना कर दिया। सम्‍हाल कर रखे हुए कांग्रेस के सारे हथियार फुस्‍स हो गए। इसकी तह में जाना चाहिए। कांग्रेस और राहुल गांधी को सत्‍ता पर से थोड़ी निगाह हटाकर समय की नब्‍ज पहचानने की कोशिश करनी चाहिए। 
मेरी चिंता का मुख्‍य विषय राहुल गांधी और उनकी राजनीति ही है, क्‍योंकि वे लगातार परिवर्तन की बातें करते रहे हैं। गांधी जी के बाद पहली बार कोई नेता गरीबों के करीब आकर उनका हाल चाल लेने लगा। इससे उम्‍मीद जगी थी कि हो सकता है राहुल गांधी सड़ांध से अलग हट कोई नई पहल करें। लेकिन चुनाव में हमने देखा कि राहुल गांधी भी उसी हमाम में हैं और सबकी तरह वे भी निर्वस्‍त्र हैं। गांधी जी का गरीबों से मेलजोल इसलिए महत्‍वपूर्ण है कि उन्‍होंने उनकी आवाज को दुनिया की आवाज बना दिया। उन्‍होंने 'आखिरी आदमी' के लिए राजनीति की और ईमानदारी से अपना सबकुछ न्‍यौछावर किया। परंतु राहुल के मेलजोल में छल है। कलावती के घर में बैठकर पकौड़ी तो राहुल गांधी ने खाई, लेकिन केंद्र में उनकी सरकार ने कलावती के लिए कुछ भी नहीं किया, यह कलावती ने भांप लिया है। इसलिए राहुल बाबा गच्‍चा खा गए।  
हमारी राजनीति गांधी और नेहरू युग के बाद उत्‍तरोत्‍तर अधोगति को प्राप्‍त हुई है और अब इसे यहां से बाहर निकालने के लिए किसी वास्‍तविक नेता जरूरत है। वास्‍तविक नेता का मतलब, जो प्रधानमंत्री बनने के लिए राजनीति न करे, बल्कि सुधार की राजनीति करे, जो बदलाव के लिए काम करे। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह नेतृत्‍व राहुल गांधी नहीं दे सकते, क्‍योंकि उनमें वह साहस नहीं है, जो एक सच्‍चे नेता में होना चाहिए। उनके पास परिवर्तन की पहल का साहस नहीं है। उन्‍होंने परिवर्तन की बातें बार-बार की हैं, लेकिन उत्‍तर प्रदेश चुनाव में वे क्‍या अलग लेकर उतरे? अलबत्‍ता, कांग्रेस ने प्रचार किया कि जनादेश मिलने पर मुख्‍यमंत्री चाहे जो बने, कमान राहुल गांधी के ही हाथ में रहेगी। उनकी टीम ने पुरजोर तरीके से यह बताया कि राहुल गांधी इतने ताकतवर हैं कि किसी मुख्‍यमंत्री को अपने चा‍बुक से मनचाही दिशा में हांक सकते हैं। इन सबने यह प्रचारित किया कि राहुल गांधी इतने दयालु हैं कि जब चाहें तब प्रधानमंत्री बन सकते हैं, लेकिन वे मनमोहन सिंह पर मेहरबान हैं और उन्‍हें कुर्सी का कोई मोह नहीं है। वे राजा हैं, लेकिन उन्‍होंने राजदंड किसी और को दे दिया है। जनता ने इसे नकार दिया। उसे राजे-रजवाड़ नहीं चाहिए थे। उसने सब में से कम खराब पार्टी को जनादेश दे दिया। यह अलग बात है कि प्रदेश की जनता को कुख्‍यात अपराधियों के मंत्री के रूप में देखने का दुर्भाग्‍य नसीब हुआ है। 
राहुल गांधी जिस प्रदेश को बदलने की बात करते रहे, उसका मुख्‍यमंत्री बनने से इंकार कर दिया। उन्‍होंने बाकी पार्टियों से अलग कुछ नहीं किया। उन्‍होंने हिंदू-मुस्लिम और जाति समीकरणों से परे की रणनीति नहीं बनाई। खुशी की बात है कि 'सपेरों और बंजारों' के देश की जनता अब मात्र उजले चेहरों पर सम्‍मोहित नहीं होती। उस पर प्रियंका और राहुल के ग्‍लैमर ने असर नहीं किया। 
जनसभाओं में राहुल गांधी कहते थे कि उत्‍तर प्रदेश में भ्रष्‍टाचार देख कर हमे गुस्‍सा आता है, तो जनता पूछती थी कि केंद्र पर गुस्‍सा क्‍यों नहीं आता ? वहां आपकी सरकार है, आप वहां से शुरुआत क्‍यों नहीं करते? राहुल गांधी के पास इसका जवाब नहीं था। पूर्वांचल के दौरे पर अपने ही कार्यकर्ताओं के गुस्‍से को देख कर भी राहुल गांधी माहौल और जनता का मन भांप सकने में विफल रहे। भट्टा पारसौल से लेकर आजमगढ़ तक की जनता ने पूछा कि जमीन अधिग्रहण पर केंद्र से पहल क्‍यों नहीं होती, राहुल गांधी निरुत्‍तर थे। जनता ने अपना फैसला सुना दिया। 
यह भांपने की जरूरत है कि यह देश खामोशी से अपना नायक तलाश रहा है। कोई एक गांधी, कोई जयप्रकाश, कोई लोहिया। एक अदद नायक के लिए उसकी यह व्‍याकुलता अन्‍ना के आंदोलन ने सिद्ध की। अन्‍ना की अपनी सीमाएं हैं, इसलिए उनका नायकत्‍व सीमित रह गया। जनता में वह व्‍याकुलता अभी भी बनी हुई है। लेकिन नायक बनने के अपने खतरे हैं। नायकत्‍व की पहल करके संभव है आप चुनाव हार जाएं, आप सत्‍ता से वंचित रह जाएं। मगर जनता की स्‍मृतियों में आपको जगह मिलेगी। नायककत्‍व बदलाव के लिए होता है, सत्‍ता के लिए नहीं। हां, आपका नायकत्‍व सिद्ध होने की सूरत ताज आपके सर पर अनायास ही सज सकता है। राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि इस देश्‍ा को अपने गांधी या जयप्रकाश जैसे साहसी नेता की जरूरत है। क्‍या राहुल गांधी यह विकल्‍प दे सकते हैं?
 

 

1 टिप्पणी:

DHEERAJ ने कहा…

गाँधी और जय प्रकाश को पुनः इस धरती पर उतरने से पहले ये सोचिये की क्या ये नेता भारत के भविष्य के खतरों को भाप पाए थे यादी ऐसा होता तो आज यह देश साम्प्रदायिकता और जातिवादी ज्वर की गिरफ्त में न होता,यह कह कह कर मैं उनके योगदान को कम नहीं करना चाहता पर,पर एक ओर जहाँ गाँधी का रामराज्य पूरा नहीं हुआ तो वही जय प्रकश की पहल कालांतर में जातिवादी उभार व मंडल-कमंडल के रूप में सामने आई, सिंघासन तो खली हुआ पर जनता के लिए नहीं सिर्फ युवराज बदले तो फिर क्या फर्क पड़ता है चाहे वह राहुल हो या अखिलेश !
मेरा मत है की अब जो पहल हो वह पूर्णतया यथार्थवादी व निर्णायक हो, सामाजिक प्रयोग न हों