रविवार, 18 दिसंबर 2011

मैं कहता हूँ

मैं कहता हूँ वो बातें 
उस भाषा में 
जो अम्मा औ बाबुजी को 
सहज समझ में आती हों 
क्योंकि वे दोनों अनपढ़ हैं 
और मुझे लगता है 
जो वे समझेंगे 
मेरे देश का बच्चा-बच्चा समझेगा 
क्योंकि वे सब अनपढ़ हैं 
अम्मा औ बाबू की नाईं
वे भी खांटी देसी हैं 
दिल्ली के शह और मुसाहिब 
उनके लिए विदेसी हैं 

मेरी माँ बोली है मुझसे 
तुम इनकी आवाज़ बनो 
सुर भर दो नीरव जीवन में 
ऐसा सुन्दर साज़ बनो 
इनके जल-जंगल-ज़मीन की रक्षा करना 
तोपों से, बंदूकों से तुम 
कभी न डरना 

घर में एक ही लाठी थी 
वो बाबू को दे आया हूँ 
अपनी कलम दवात महज़  
अपने झोले में लाया हूँ 
एक-एक बच्चे की बातें 
मैं कान लगाकर सुनता हूँ 
अक्षर-अक्षर रोता हूँ 
तिल-तिल कर हर दिन मरता हूँ 

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