रविवार, 18 दिसंबर 2011

मैं कहता हूँ

मैं कहता हूँ वो बातें 
उस भाषा में 
जो अम्मा औ बाबुजी को 
सहज समझ में आती हों 
क्योंकि वे दोनों अनपढ़ हैं 
और मुझे लगता है 
जो वे समझेंगे 
मेरे देश का बच्चा-बच्चा समझेगा 
क्योंकि वे सब अनपढ़ हैं 
अम्मा औ बाबू की नाईं
वे भी खांटी देसी हैं 
दिल्ली के शह और मुसाहिब 
उनके लिए विदेसी हैं 

मेरी माँ बोली है मुझसे 
तुम इनकी आवाज़ बनो 
सुर भर दो नीरव जीवन में 
ऐसा सुन्दर साज़ बनो 
इनके जल-जंगल-ज़मीन की रक्षा करना 
तोपों से, बंदूकों से तुम 
कभी न डरना 

घर में एक ही लाठी थी 
वो बाबू को दे आया हूँ 
अपनी कलम दवात महज़  
अपने झोले में लाया हूँ 
एक-एक बच्चे की बातें 
मैं कान लगाकर सुनता हूँ 
अक्षर-अक्षर रोता हूँ 
तिल-तिल कर हर दिन मरता हूँ 

अलविदा अदम..!



कृष्णकांत
आज सुबह होते ही एक दुखद खबर आयी कि अदम जी नहीं रहे। वे कुछ समय से बीमार चल रहे थे। यह आशंका पहले से थी कि कहीं कुछ अनहोनी हो जाये, क्योंकि वे काफी बीमार थे। जीवन भर साथ रही तंगहाली अंत तक उनके साथ रही। थोड़ी थुक्का-फजीहत के बाद जब तक मदद के लिए कुछ हाथ उठे, अदम जी का दाना-पानी इस जहां से उठ गया। शायद इस खुद्दार शायर को किसी का रहमो-करम मंजूर नहीं था। मौत के लम्हात से भी तल्खतर है जिंदगी.. लिखने वाले शायर ने आखिरश जिंदगी को अलविदा कह दिया। शायदभुखमरी की धूप में कुम्हला गयी अस्मत की बेल' अब और उनसे देखी नहीं जा रहा थी। गोंडा जिले का यह चौंसठ वर्षीय खांटी देसी शायर उस धरती को तो सूना कर ही गया, हिंदी गजल भी शायद अधूरी रह गयी। उनसे कुछ और की उम्मीद थी। उनके तेवर का बिना किसी अंजाम तक पहुंचे शांत हो जाना जाने क्यों रह-रह कर कचोट रहा है। उनसे मेरी जो कुछ-एक मुलाकातें हैं, आज रह-रह कर ताजा हो रही हैं।
पहली बार एक मुशायरे में उनसे मुलाकात तब हुई थी। तब मेरी उम्र सत्रह साल की थी। गोंडा जिले के पसका क्षेत्र में, जहां बराह भगवान का मंदिर है, पूस महीने की पूर्णमासी को मेला लगता है। यहां पर सरजू और घाघरा का संगम है। शूकर क्षेत्र अथवा शूकर खेत नाम से मशहूर इस स्थान को तुलसीदास से जोड़ा जाता है। कुछ लोग इसे उनका जन्मस्थान बताते हैं, कुछ उनका गुरुस्थान। इस मेले में हर साल एक मुशायरा होता है। हम सब मंच पर पहुंचे तो संचालक ने सबका परिचय कराया। मुशायरा अदम जी की सदारत में हो रहा था। मैंने अब तक सिर्फ  नाम सुन रखा था कि कोई अदम गोंडवी हैं, जो बहुत अच्छे शायर हैं। हालांकि, परस्पुर में जहां उनका घर है, उसी के बगल उनका गांव- आटा था। लेकिन तब तो हमें उनकी ऊंचाई का गुमान था और ही उस इलाके के लोगों को।
मैंने देखा- खादी का कुरता, धोती, कंधे पर गमछा, चमौधा जूता- एकदम सामान्य देहाती आदमी। गांव के किसी बाबा या ताऊ जसा। अब तक मुङो उनकी रचना चमारों की गली के बारे में पता चल गया था और मेरे बड़े भाई ने मुङो बता दिया था कि अदम जी अपने यहां के बहुत बड़े रचनाकार हैं। जब तक मुशायरा चलता रहा, मैं बैठा उन्हें देखता रहा। मुशायरा खत्म होने के बाद जब हम लोग इकट्ठे हुए तो उन्होंने मेरा नाम और परिचय पूछा। फिर कहा- मेहनत करो। अच्छा कर रहे हो। मैं निहाल हो गया। मैंने अवधी में एक सामान्य सी रचना पढ़ी थी, लेकिन उनकी तारीफ के बाद मुझे वाकई खुशी हुई।
आज  मुझे बहुत तकलीफ हो रही है, कि अदम जी जसे शायर को उनके समय ने नजरअंदाज किया। वे ऐसे मंचों पर मुशायरा पढ़ते थे, जो एकदम सामान्य  गंवई लोगों का था, जिनमें अधिकांश अनपढ़ हैं। जो पढ़े लिखे भी हैं वे उर्दू शायरी से निरे नावाकिफ हैं। तब मेरे भी समझ में उनकी शायरी नहीं आती थी। जब मैं पढ़ाई के लिए इलाहाबाद गया, तो वहां उनसे और उनकी शायरी से परिचय हुआ। गोंडा के लोग अदम जी को जितना आंकते थे, वे उससे बहुत बड़े आदमी ठहरे। दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी गजल के सबसे बड़े हस्ताक्षर। उसके बाद दो बार उनसे मेरी छोटी-छोटी मुलाकातें हुईं, मगर कोई बातचीत नहीं हो सकी।
अदम जी का पूरा नाम रामनाथ सिंह था। अदम गोंडवी नाम से वे लिखते थे। इसी नाम से उनकी प्रसिद्धि है। आज अदम गोंडवी नाम का व्यक्ति हमारे बीच नहीं है, मगर शायर अदम गोंडवी जिंदा हैं। उनकी शायरी में गोंडा जिले के लोगों की पीड़ा और वहां का पूरा समाज दर्ज है। उनकी शायरी में उस भूमि के लोगों आवाज झलकती है- ‘जो उलझकर रह गयी है फाइलों के जाल में, गांव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में" अदम जी दुष्यंत की परंपरा के शायर थे। उन्हें गांव के गरीबों-मजलूमों के पक्ष में खड़े होकर उन्होंने लिखा- ‘घर में ठंढे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है, बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है। तो राजनीति के क्षरण पर उन्होंने लिखा- ‘देखना सुनना सच कहना जिन्हें भाता नहीं, कुर्सियों पर फिर वही बापू के बंदर गये।' उन्होंने अपनी समझ से इसका समाधान भी सुझा दिया था किजनता के पास एक ही चारा है बगावत.. आज गोंडा की धरती बगावत के लिए अपना इकलौता रहनुमा खो चुकी है।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

द डर्टी पिक्चर मतलब एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट


अमित सिंह

सिल्क कहती हैं कि किसी भी फिल्म को चलाने के लिए उसमें सबसे जरूरी तीन चीजें होती हैं एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट। फिल्म डर्टी पिक्चर में यही चीज है। यह फिल्म साउथ की फिल्मों में अपने हुस्न का जला दिखाकर स्टार बनी सिल्क स्मिता की कहानी कहती है। हालांकि अपने हुस्न का जला दिखाकर स्टार बननेोलों में सिल्क अकेला नाम नहीें थीं और भी अभिनेतियां मसलन नायलोन नलिनी और पालिस्टर पदमिनी आदि ने भी इस दौर में अपनी कामुक अदाओं और अंग प्रदर्शन के जरिये दर्शकों को दीाना बना दिया था। यह फिल्म उस दौर के सिनेमा पर बात करती है और इसी बहाने या कहें सिल्क के बहाने पुरूष प्रधान समाज पर गहरा व्यंग करती है। पुरुष प्रधान समाज महिला की बोल्डनेस से भयभीत हो जाता है। पुरुष बोल्ड हो तो इसे अगुण नहीं माना जाता है, लेकिन यह बात महिला पर लागू नहीं होती। पर यहां तो किस्सा ही दूसरा है। सुपरस्टार सिल्क और बोल्डनेस एक-दूसरे के पर्यायाची हैं। और हां उनकी यही बात उनकी बिखरी जिंद्गी एं रहस्मय अंत की कारण भी बन जाती है। फिल्मों में सफलता पाने के लिए सिल्क अच्छा-बुरा नहीं सोचती है। ह मादकता का ऐसा तूफान हैं, जहां जाती है बंडर आ जाता है। ह इतनी बोल्ड थी कि जो प्रेमी उससे शादी करनेोला है उससे उसके बाप की उम्र पूछती है। उसके अंदर ऐसी बहुत सी बातें थी जिसे समाज स्ीकार्य तो करता है पर सिर्फ रात में। दिन के उजाले में इसे अश्लील माना जाता है।

कहानी- द डर्टी पिक्चर 80 के दशक की महिला रेशमा(द्यिा बालन) की कहानी है जो अपने अभिनेत्री बनने के सपने के साथ म्रास आ जाती हैं। शुरुआत में उसे कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है मगर जल्द ही बड़े परदे पर बिकने का ज्ञिान उनके समझ में आ जाता है। ह सिल्क बन छा जाती है। मगर उनकी निजी जिंद्गी चौपट होने लगती है। रील पर कामयाब हीरोइन रीयल लाइफ में बुरी तरह से नाकामयाब हो जाती है। ह सिर्फ सच्चा प्यार पाना चाहती हैं, लेकिन उनकी छ िके चलते लोग उन्हें बिस्तर पर तो ले जाना चाहते हैं, लेकिन घर नहीं। इस बीच उनके जीन में सुपर स्टार सूर्या (नसीरुद्दीन शाह) और उनका छोटा भाई रमा- स्क्रिप्ट राइटर  (तुषार कपूर ) आता है, मगर सच्चा प्यार न मिलने से सिल्क एकदम टूट जाती है और उसका करियर भी ढलान पर आने लगता है। अंत में निर्देशक (इब्राहीम) इमरान हाशमी के रूप में उन्हें सच्चा प्यार जरुर मिलता है मगर तब तक देर हो जाती है और सिल्क सबको अलदिा कह जाती है।
धिा बालन ने सिल्क के बिदांस रैये और दर्द एं प्यार की तड़प का जानदार अभिनय किया है। पूरी फिल्म में ह छायी हुई है। तीनो पुरूष किरदार धिा के सामने फीके पड गए हैं। नसीर और इमरान ने अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया है और तुषार के पास करने के लिए कुछ खास है नहीं। फिल्म का निर्देशन जोरदार है, लेकिन सबसे बढिया काम फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर रजत अरोड़ा का है। उन्होंने ऐसी बढिया स्क्रिप्ट और जानदार डायलग लिखे हैं जो दर्शकों को अंत तक फिल्म से बांधे रखते हैं। खासकर बेस्ट सपरेटिंग एक्टर का आर्ड जीतने पर सिल्क द्वारा बोला गया डॉयलाग। अपने बोल्ड डायलग और सेक्सी सीन्स के चलते फिल्म को ए सर्टीफिकेट दिया गया है और यही बात उन दर्शकों की कसौटी पर बिल्कुल फिट नहीं बैठेगी जो साफ सुथरी और फैमिली फिल्मों के शौकीन हैं। बाकी फिल्म धमाकेदार है