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October, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जाते हुए सूरज को देखते हुए

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जाते हुए सूरज को देखना  देखना है  खुद को गुज़रते हुए  अपने ही सर पे पांव रख कर  इसी तरह तो गुज़रा हूँ कई कई बार  मौत पर सवार होकर लाचार  हर बार  रोता जार-जार  हर बार जीती है मौत  और हारा हूँ मैं  जाते हुए सूरज की तरह 

साहिल पे

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साहिल पे खड़े होकर  उफक देखते हुए  वह अक्सर लिखा करती है  पानी की सतह पे  कोई  कविता  कभी कभी मेरी हथेली पर भी 
अक्सर ही समंदर  मुझे लगता है अपनी हथेली सा  जिसमे हरदम देखती रहती है वह  अपना चेहरा  साहिल पे खड़े होकर  उफक देखते हुए