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मुक्ति का सपना

रोज़ बदलता है दर्द का चेहरा  रोज़ बदल जाते हैं रस्ते  कायनात भी  रोज़ बदलती है रंग  चाँद बदल लेता है अपना जिस्म  और मैं  रोज़ मैं जनम लेता हूँ  अपनी सार्थकता के लिए  नए नए रूपों में 
बदलता है पल-पल सब कुछ नहीं बदलता तो बस  मुक्ति का सपना 


कुछ पुराने दिन

चित्र
यादहैडब्ल्यू! इलाहाबादकीसड़कोंकेसपने जिनकोहमढोयाकिये शहरकेइसछोरसेउसछोरतक खड़खड़ियासाइकिलसे तमामसपनेतोबीनेथेहमने फुटपाथसे कुछकिताबघरसे कुछयूनिवर्सिटीकीलॉनसे औरउन्हेंआकारदियाथा तुममेरेएकमात्रहमसफररहे उसजीवनके
प्रयागकीउनसड़कोंपर हमरोजपैदाहोतेथे मुट्ठीमेंअपनाकलभींचे औरउनमेंभरतेथेसुर-ताल कभीपुरानीबेसुरीहारमोनियमसे तोकभीमेजकीथापसे वेसबसपने वेसारेपल जिंदाहैंमेरेभीतर जोजियेथेतुम्हारेसाथ गीतों