बुधवार, 17 अगस्त 2011

हिंदी ब्लॉगिंग के बढ़ते तेवर और संभावनाएं



पढ़े-लिखे और खास कर इंटरनेट साक्षर लोगों के लिए ब्लॉग या ब्लॉगिंग शब्द नये नहीं है। लोगों का सिर्फ इनसे परिचय हो चुका है, बल्कि तमाम लोग नियमित रूप से ब्लॉग लिख रहे हैं। यह देख कर मैं अचंभित रह गया कि कई पहुंचे हुए संतों और नागाओं के ब्लॉग हैं जिनपर नियमित रूप से उनके आश्रमों या उनसे जुड़ी गतिविधियों को अपडेट किया जाता है। छोटे बच्चों के लिए ब्लॉग हैं तो महिलाओं के ब्लॉग हैं जो पुरजोर ढंग से महिला मुद्दों को उठाते हैं। दलितों, वंचितों और आदिवासियों के मुद्दों की भी पैरोकारी करने वाले ब्लॉग देख कर काफी सुखद एहसास होता है। लेकिन इसी बीच लोग बार-बार यह सवाल करते हैं कि वैकल्पिक मीडिया के रूप में ब्लॉगिंग की बात निकली तो कितनी दूर जाएगी?
जवाब सकारात्मक है। फरवरी 2011 तक पूरी दुनियां में 15 करोड़ 60 लाख नागरिकों के ब्लॉग अस्तित्व में चुके हैं। भारत में भी अंग्रेजी के अलावा लगभग सभी भारतीय भारतीय भाषाओं में ब्लॉग लिखे जा रहे हैं जिनमें हिंदी सबसे ऊपर है। हिंदी में करीब  30 हजार ब्लॉगर हैं, जिनमें से चार हजार के करीब नियमित ब्लॉग लेखक हैं। हिंदी में पहला ब्लॉग 2003 में शुरू हुआ था। इस तरह हिंदी ब्लॉगिंग ने आठ सालों का सफर पूरा कर लिया है। ब्लॉगिंग की शुरुआत 1999 से होती है, जब पीटर मर्होट्ज नेवी ब्लॉगज् से निजी साइट शुरू की। यानि कि ब्लॉगिंग की समूची उम्र ही मात्र बारह साल की है।
इसमें हिंदी ब्लॉगिंग की जो दशा और दिशा है, वह उम्मीद जगाने वाली है। हिंदी ब्लॉगिंग के जानेमाने चेहरे अनूप शुक्ल, जो कि फुरसतिया ब्लॉग चलाते हैं, का कहना है किरोज करीब पचास लोग ब्लॉगिंग से जुड़ रहे हैं। अभिव्यक्ति के इस सिलसिले में कबाड़ से लेकर कंचन तक मौजूद है। भविष्य बहुत अच्छा है।ज् भविष्य इसलिए भी अच्छा है कि मीडिया संस्थानों की भांति ब्लॉगरों के पास कोई संपादकीय टीम नहीं है। फिर भी बीस से तीस फीसदी सामग्री काफी उम्दा होती है। जहां तक स्तरीयता की बात है तो वह प्रकाशन संस्थानों में बहुत बार लड़खड़ाती नजर आती है। वे टनों कचरा छाप सकते हैं तो आम आदमी की भीड़ में यह बहुत हद तक संभव है। चूंकि, ब्लॉगिंग में  ज्यादा संख्या में आम आदमी है, इसलिए हम सबसे गंभीर साहित्य और लेखन की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन लेखकों-पत्रकारों द्वारा लिखे जा रहे बड़ी संख्या में ऐसे ब्लॉग हैं जो कई बार समाचारपत्रों-पत्रिकाओं से गंभीर सामग्री मुहैया कराते हैं। शायद यही कारण है कि आज हर बड़े हिंदी समाचारपत्र में ब्लॉग का एक कॉलम मौजूद है। लेखक, पत्रकार, अध्यापक आदि पेशेवर लोगों के अलावा आम आदमी की भागीदारी ब्लॉगिंग की वास्तविक ताकत है। यह जितनी ही बढ़ती जाएगी, हिंदी ब्लॉगिंग उतनी ही समृद्ध होती जाएगी।
कहने की जरूरत नहीं कि बीसवीं सदी मानव समाज के लिए विभिन्न उपलब्धियों की सदी रही है। इस एक सदी में ज्ञान, तकनीक आदि से संबंधित कई-कई क्रांतियां घटित हुई हैं। हम जिस युग में रह रहे हैं वह अब तक की उदारतम विश्वव्यस्था है। हालांकि, इसकी हजार खामियां हैं, परंतु यह अपने सर्वोत्तम रूप में है। ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, दर्शन आदि के साथ बाजार का सर्वव्यापी होना इस युग की सबसे बड़ी परिघटना है। यदि कहें कि बाजारवादी व्यवस्था का प्रसार तकनीक के कंधे पर चढ़ कर ही हुआ है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। बाजार और तकनीक एक दूसरे के पूरक साबित हुए है। फैलते हुए तकनीक के बाजार ने इस उदारीकरण को हम आप तक पहुंचाया है। ब्लॉगिंग विधा सूचना-संचार का सबसे नया माध्यम है।
नयी सदी तक आते-आते वैश्विक कैनवास पर यह अवधारणा अब स्थापित हो चुकी है कि बोलने की आजादी, जानने का अधिकार, सूचनाएं पाने के अधिकार आदि हमारे मौलिक अधिकारों की श्रेणी में आते हैं। उदारवाद का विस्तार हमें यहां तक ले आया है कि जो चीज नष्ट नहीं हुई, वह वैश्विक पहचान पा सकती है। यह बात हिंदी भाषा और हिंदी ब्लॉगिंग पर भी लागू होती है।
यह मानने के कई कारण हैं कि कि आने वाले समय में हिंदी ब्लॉगिंग का भविष्य उज्जवल है। अगर हम हिंदी में लिखे जा रहे ब्लॉगों पर निगाह दौड़ाएं तो स्थिति काफी सुखद है। कई लोगों ने मुख्य धारा के मीडिया का विकल्प ब्लॉग के रूप में चुना है, इसलिए ब्लॉगिंग को एक क्रांति के बतौर देखना चाहिए। पत्र-पत्रिकाओं में समाज-संस्कृति आदि के लिए जगह लगातार सिकुड़ती ही जा रही है, इस लिहाज से ब्लॉगिंग साहित्यिक-सांस्कृतिक मंच के रूप में उभरा है। यह सिर्फ कहने की बात नहीं है। कई वेबसाइट और पोर्टल ऐसे हैं जो इस दिशा में काफी अच्छा काम कर रहे हैं।
दूसरी ओर यूनीकोड का आना भी हिंदी के वरदान साबित हो रहा है। यह हिंदी के  प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। यूनिकोड का सबसे बड़ा फायदा यह मिला है कि सऊदी अरब और अमेरिका में बैठे लोग भी भट्टा पारसौल या पूर्वाचल की लोकल खबरें अखबारों के पोर्टल पर देख पा रहे हैं। यानी कि अब दूर देश में बैठा व्यक्ति सिर्फ अंग्रेजी पर निर्भर नहीं रह गया।
ब्लॉगिंग को बुद्धिजीवियों के बीच नये वर्तमान परिवेश में अभिव्यक्ति के एक मंच के तौर पर देखा जा रहा है। हाल ही में हिंदी ब्लॉगिंग पर दिल्ली में हुए एक सेमिनार में चर्चित ब्लॉग नुक्कड़ के लेखक अविनाश वाचस्पति का कहना था किकि अगले एक दशक में आप देखेंगे कि हिंदी ब्लॉगिंग सबसे शक्तिशाली विधा बन गयी है। जिस प्रकार मोबाइल फोन सभी तकनीकों से युक्त हो गया है उसी तरह हिंदी ब्लॉगिंग सभी तरह के संचार की वाहक बन जाएगी। मीडियाकर्मियों और हिंदी ब्लॉगरों का समन्वय अवश्य ही इस क्षेत्र में सकारात्मक क्रांति लाएगा। ज्
हिंदी में आज ऐसे ब्लॉग मौजूद हैं जो सिफ सामान्य तकनीकी जानकारियां उपलब्ध कराते हैं, बल्कि प्लेटो, अरस्तू, सुकरात, मार्क्, माओ और गांधी के जीवन दर्शन और विचारों से आपको परिचित कराते हैं। मसलन, ओमप्रकाश कश्यप का आखरमाला ब्लॉग। इस पर जाकर आप दुनिया के सभी बड़े विचारकों के बारे में जान पढ़ सकते हैं। हालांकि, कहीं-कहीं ब्लॉगों की भाषा आदि को लेकर शिकायतें भी हैं। कई जगह लेखन बहुत ही सामान्य स्तर का है। लेकिन इन सबके बीच कई ऐसे ब्लॉग उपलब्ध हैं, जहां सामाजिक सरोकार और तीखे स्वरों की मौजूदगी है। साहित्य और संस्कृति का ऐसा पक्ष जो पत्र या पत्रिकाओं में अब संभव नहीं रह गया है, उसे ब्लॉगर अपने यहां जगह दे रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में तमाम ब्लॉगों पर घूम-घाम कर यह निष्कर्ष निकाला कि सभी गंभीर ब्लॉग लेखक ब्लॉगिंग को वैकल्पिक मीडिया के रूप में देखते हैं।




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