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बाबूजी की याद में

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अक्सरहां ही कागज़ पर 
शब्द शब्द इक इक चुन चुन कर  मैं जैसे गेहूं बोता हूं   फसलों में जीवन भरता हूं  हरी हरी गेहूं की दुद्धा बालियां  महकती रहती हैं सांसों में  और पसीने की कुछ बूदें मिट्टी में घुलती रहती हैं... 
याद आता है बाबूजी  कैसे खेतों में खटते थे  थक जाते थे फिर भी  हल के पीछे पीछे चलते थे  भीगी देह गमकती थी  मोती टप-टप-टप झरते थे  जब फसलें हंसने लगती थीं   हरियाई फसलों के बीच  कई घंटों बैठे रहते थे  वे कहते थे खेतों में  रोटी की महक घुली रहती है  खेतों में हो फसल भली तो  तन में सांस बची रहती है  सोचता हूं कि बाबूजी ने  उसी खेत में जा करके ख़ुदकुशी किस गरज की होगी? 

लड़ो चुनाव

जनता बोली पीड़ा सुन लो   नेता बोले लड़ो चुनाव  जनता बोली काम करो कुछ   नेता बोले लड़ो चुनाव  जनता बोली मत लूटो अब
नेता बोले लड़ो चुनाव  जनता बोली भूख लगी है  नेता बोले लड़ो चुनाव  जनता बोली मेरा हिस्सा?  नेता बोले लड़ो चुनाव  जनता बोली लोकतंत्र है  नेता बोले लड़ो चुनाव  जनता बोली तुम हो सेवक हो  नेता बोले लड़ो चुनाव  जनता बोली हक़ दो साहब  नेता बोले लड़ो चुनाव  जनता बोली अनाचार है  नेता बोले लड़ो चुनाव 
पांच साल के बाद लौटकर  नेता जी ने हाथ जोड़कर  कहा, साथियों करो चुनाव  और हुआ वाकई चुनाव  ताज छिना, टोपी भी उतारी  जनता बोली- लड़ो चुनाव!

हिंदी ब्लॉगिंग के बढ़ते तेवर और संभावनाएं

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पढ़े-लिखेऔरखासकरइंटरनेटसाक्षरलोगोंकेलिएब्लॉगयाब्लॉगिंगशब्दनयेनहींहै।लोगोंकासिर्फइनसेपरिचयहोचुकाहै, बल्कितमामलोगनियमितरूपसेब्लॉगलिखरहेहैं।यहदेखकरमैंअचंभितरहगयाकि कईपहुंचेहुएसंतोंऔरनागाओंकेब्लॉगहैंजिनपरनियमितरूपसेउनकेआश्रमोंयाउनसेजुड़ीगतिविधियोंकोअपडेटकियाजाताहै।छोटेबच्चोंकेलिएब्लॉगहैंतोमहिलाओंकेब्लॉगहैंजोपुरजोरढंगसेमहिलामुद्दोंकोउठातेहैं।दलितों, वंचितोंऔरआदिवासियोंकेमुद्दोंकी