रविवार, 12 जून 2011

सवाल व्यवस्था परिवर्तन का है



  बुधवार को राजघाट पर अन्ना के समर्थन में एकत्र हुई, भजनों पर झूमती जनता को देखकर दिग्विजय सिंह कह सकते हैं कि यह नचनियों और गवैयों का जमावड़ा है, लेकिन यह बात दिग्विजय सिंह सहित हर पार्टी का नेता जानता है कि तो वे नाचने-गाने वाले लोग हैं और ही वे कोई ऐसा काम कर रहे हैं जिसे उच्छृंखल कह कर आंखें मूंद ली जाये। वे जानते हैं कि स्थितियां आंख मूंदने वाली नहीं, नींद उड़ाने वाली हैं। वरना, रामलीला मैदान में आधी रात को सोते हुए लोगों पर पुलिसिया कार्रवाई की जाती। सरकार के लोग यह पूछ सकते हैं कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव कौन होते हैं यह बताने वाले कि सरकार कैसे काम करे, लेकिन क्या जंतर-मंतर, रामलीला मैदान और राजघाट पर उमड़ी जनता के लिए भी वे ऐसा ही बोल सकते हैं? क्या वे बूढ़े-बच्चे और महिलाएं, जो हाथों में तिरंगा लेकर  ‘भारत माता की जयज् का नारा लगाते हुए धूप-छांव की परवाह किए बिना चले रहे हैं, वे भी अवांछित लोग हैं? क्या लगातार भ्रष्टाचार से आक्रोशित जनता का सड़क पर उतरना अवांछनीय है? इसका जवाब सापेक्षिक है। सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी उसे गैर-जरूरी कह सकती है, लेकिन जनता की निगाह में वह अनिवार्य है। जनता अगर सरकार चुन सकती है तो उससे हिसाब भी मांग सकती है। चुनी हुई सरकार को निरंकुश नहीं होने दिया जा सकता। जनता ने किसी को प्रतिनिधि इसलिए नहीं चुना है कि वह उसके हक में हो रहे अन्याय पर आंखें मूंदे रहे।
जो परिदृश्य सामने है उसे लेकर नेताओं की घबराहट स्वाभाविक है। क्योंकि जहां नेताओं की सभाओं में नारे लगाने वालों का प्राय: टोटा रहता है, वहीं बाबा रामदेव के आह्वान पर 50 हजार लोग आसानी से जुट सकते हैं। यह रामदेव की लोकप्रियता हो हो, पर सरकार की नाकामी जरूर है। सरकार की साठ साल की मुसलसल नाकामी पर जनता ने ही अन्ना हजारे को यह मौका दिया है कि वे राजघाट से दूसरी आजादी की घोषणा कर रहे हैं।
बुधवार को राजघाट पर अनशन कर रहे अन्ना और उनके समर्थकों ने पांच जून की रात रामदेव की अनशन सभा पर पुलिसिया की कार्रवाई की घोर निंदा की। उनका सवाल, जिससे असहमत होने का कोई कारण नहीं दिखता, कि शांतिपूर्ण जनसभा पर आधी रात को लाठी चलाने का क्या औचित्य था? अगर सरकार इसे जरूरी समझती है तो लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं है। एकत्र होना और शांतिपूर्ण जनसभाएं करना तो नागरिकों का अधिकार है, जब तक की इससे राष्ट्र को कोई खतरा हो। आश्चर्यजनक है कि सरकार सत्तारूढ़ पार्टी पर आये खतरे को देश पर आया खतरा प्रचारित करने की हिमाकत करती है। जो कि 1975 में भी हो चुका है। लगता है कांग्रेस पार्टी 1975 के सबक भूल गयी। बुधवार को एकदिवसीय अनशन के दौरान जब अन्ना हजारे ने दूसरी आजादी की घोषणा कर रहे थे तो साफ दिख रहा था कि वे और उनके सहयोगी गुस्से में हैं और चिंतित भी। वरिष्ठ वकील शांतिभूषण ने कहा कि यह अनशन लोकतंत्र को बचाने की कोशिश है। अन्ना के सहयोगी अरविंद केजरीवाल का कहना है कि असल उद्देश्य तो व्यवस्था में परिवर्तन लाना है। यह एक ऐसा सवाल है जिस पर जनता उनके साथ जा खड़ी होती है और वे नागरिक समाज के प्रतिनिधि बन बैठते हैं। यह प्रतिनिधित्व उन्हें सरकार की अकर्यमण्ता और भ्रष्टचारियों कि अतिसक्रियता ने दिया है। दिग्विजय सिंह या कपिल सिब्बल का यह सवाल निहायत गैर-जरूरी है कि हम जनता तो जनता के प्रतिनिधि हैं। आपको किसने चुना जो हम आपकी बात मानें? यह नब्ज को पकड़ कर उपाय खोजने की बजाय पैर पर कुल्हाड़ी मारने जसा है। यह समझने की जरूरत है कि अन्ना हजारे की दूसरी आजादी की घोषणा करने के पीछे जनसमर्थन से उपजा हौसला काम कर रहा है। जंतर-मंतर से राजघाट तक उमड़ रहे लोग ही अपने आप में  जनता का बयान है कि असल सवाल व्यवस्था में परिवर्तन का है।

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