शनिवार, 28 मई 2011

भट्टा परसौल के नागरिकों के नाम

  
यह कोई कविता नहीं 
ये तो उनकी आंखों से टपके 
कतरे हैं लहू के 
गोलियों से छलनी हुए जो लोग 
बटोर कर लाया हूं अभी
पड़े थे उनकी पुस्तैनी  ज़मीन पर 
कंचों  की तरह, लावारिस 

वह जो आई थी 
नयी बहू, इसी लगन पाख में 
सत्ता ने रौंद डाला 
उसके सपनों की हसीन बस्ती 
कहा, अतिक्रमण है, रौंदो इन्हें
उसने कहा- मेरा सपना है 
सिन्दूर है मेरी मांग का 
और उम्र की कुछ-एक मुस्कराती पंखुडियां 
रहने दो इसे 
मगर तब तक चिपक चुका था  
 उसके माथे पर 
विदेशी कंपनियों का विज्ञापन 
उसकी हथेली पर 
रखा जा चुका था मुआवजा 
हो चुका था अधिग्रहण 
उसकी कोख का 
        
वहीं पर हमारे पुरखे भी 
पाथा करते थे उपले 
जहां गांव की सब बूढ़ी औरतें 
लगाती रहीं ताउम्र 
कंडियों के ढेर 
कंडियां और कुछ नहीं होतीं 
रोटी के सिवा 
जो गढ़ी जाती हैं 
तिनके तिनके से 

गांव भर के सपने  
फूंक दिए गए बटोर कर 
उन्हीं कंडियों  में 
रख हो गयीं सब रोटियां 


वे जो भागे हैं घर छोड़ 
जीते हैं सहमे सहमे 
उन सबसे कहो 
जमा दें अपने पांव 
सटाकर अपने घर की दीवारों से 
बना लो अपने किले 
जिसे न ढहा सके सत्ता का दमन 
अन्यथा एक दिन 
वे पहुंचेंगे उन सूने स्थानों पर भी 
जहां छुपी हैं तुम्हारी धडकनें....

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