शुक्रवार, 27 मई 2011

अपने-अपने जंतर-मंतर



अन्ना हजारे के बाद अब योगगुरु बाबा रामदेव की योजना है कि वे चार जून को काला धन मुद्दे को लेकर जंतर-मंतर पर आमरण अनशन करेंगे। उनका दावा है कि अन्ना हजारे अपनी पूरी टीम के साथ इस अनशन में तो रहेंगे ही, देश-विदेश से उनके कई समर्थक भी इसमें हिस्सा लेंगे। हो सकता है कि बाबा रामदेव काले धन के मुद्दे पर जनता में एक स्थायी-अस्थायी आवेग भरने में सफल रहें। मगर, सवाल सिर्फ जनता में कुछ-एक दिन के लिए उग्रता जगाने का नहीं, बल्कि उसे अंजाम तक पहुंचाने का है। भ्रष्टाचार इस देश में आज पैदा हुआ कोई नया सवाल नहीं है। वह 60 सालों में तमाम जीपें और तोपें निगल चुका है। अब दरकार इस बात की है नागरिक समाज का जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद होता है, वह खुद कितना विश्वसनीय है और उसके पास भ्रष्टाचार से निपटने का कोई कार्यक्रम है कि नही? अन्ना हजारे के आंदोलन की तात्कालिक सफलता का कारण यह रहा कि उनकी अपनी छवि संदेह से परे है। उनका अतीत और उनकी प्रतिबद्धता लोगों को आकर्षित करती है। दूसरे, उनके पास एक मजबूत टीम है जो लंबे समय से आंदोलन की पूरी रूपरेखा तैयार कर रही थी। उनका अपना एक तैयार कार्यक्रम था जो देश के सामने पेश किया जा चुका था और उस पर संज्ञान लिए जाने की बात भी लोगों के बीच पहुंच चुकी थी। अन्ना हजारे के आंदोलन के पहले एक मुफीद पृष्ठभूमि तैयार हुई थी जिसका फायदा मिला।
इसके उलट बाबा रामदेव की घोषणा का वैसा असर नहीं दिख रहा। इसके कई कारण हो सकते हैं। बाबा रामदेव की पार्टी बनाकर देशभर में उम्मीदवार उतारने की महत्वाकांक्षा लोगों के निगाह में उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है जो उनके आंदोलन की विश्वसनीयता को क्षीण करेगी, क्योंकि भारत की जनता को राजनीति और राजनेताओं के सिवा हर चीज पर विश्वास है। वह हत्या के आरोपी किसी बाबा को आंख मूंद कर भगवान मानती है, लेकिन नेता से कोई उम्मीद नहीं रखती।
अब यह देखने की बात है कि बाबा रामदेव यदि राजनीतिज्ञ की छवि के साथ भ्रष्टाचार से लड़ने के उतरते हैं तो जनता पर उसका क्या असर पड़ता है? आखिर भ्रष्टाचार कोई फूंक कर उड़ा देने वाली वस्तु नहीं है। वह ऐसा ताकतवर भूत है जो साठ साल से लोकतंत्र के इस बागीचे में लोहिया और जयप्रकाश जसे नेताओं के आगे थोड़ा विचलित चाहे हुआ हो, परंतु अभी तक स्वच्छंद विचरण कर रहा है।
यह सही है कि बाबा रामदेव के पहले से लाखों समर्थक हैं जो उनके जीवनरक्षा के साथ देशभक्ति की दीक्षा कई सालों से ले रहे हैं, इसलिए अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन, सवाल यह है कि अगर रामदेव के समर्थन में अन्ना हजारे की तुलना में ज्यादा भीड़ जुटती है तो भी क्या गारंटी है कि वे भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में कोई सफल अध्याय जोड़ेंगे ही? सिवाव इसके कि वे अन्ना हजारे के नेतृत्व में चल रही लड़ाई को और कमजोर ही करेंगे। ऐसा इसलिए तब यह लड़ाई द्विध्रुवीय या बहुध्रुवीय होगी। भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सबके अपने-अपने जंतर-मंतरभ्रष्टाचार की एकताज् को डिगा नहीं सकेंगे।
दूसरा एक पक्ष यह भी है कि काले धन के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय लगातार संज्ञान ले रहा है और हसन अली के मामले में सरकार को डांट भी पड़ चुकी है कि वह कार्रवाई को और तेज क्यों नहीं करती। ऐसे में जो मामला सुप्रीम कोर्ट में हो उसे लेकर अनशन की प्रासंगिकता कम समझ में आने वाली है। क्या ऐसे मामलों को लेकर आंदोलन छेड़ा जाना चाहिए? बाबा रामदेव को न्यायालय पर भरोसा जताते हुए कुछ महीने रुकना चाहिए था। उनके आमरण अनशन के कार्यक्रम के पीछे हो सकता है कि उनकी सदिच्छा हो, लेकिन अनशन के लिए उन्होंने जो समय चुना है, वह मुफीद नहीं है। बेहतर होता कि वे अन्ना हजारे के साथ लोकपाल बिल की सफलता का प्रयास करते। मुझ जसे ज्यादातर लोगों को तो यही लगता है कि अगले चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने की महत्वाकांक्षा बाबा रामदेव को जंतर-मंतर तक खींच रही है।

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