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भोर पहर

भोर पहर  उतरती है धूप गमले में लहराती  किलकती पत्तियों पर  लगता है उतरा है जीवन  किसी की रगों के भीतर  और खिल-खिल गया है  पंखुड़ियों पर

भट्टा परसौल के नागरिकों के नाम

यह कोई कविता नहीं  ये तो उनकी आंखों से टपके  कतरे हैं लहू के  गोलियों से छलनी हुए जो लोग  बटोर कर लाया हूं अभी पड़े थे उनकी पुस्तैनी  ज़मीन पर  कंचों  की तरह, लावारिस 
वह जो आई थी 
नयी बहू, इसी लगन पाख में 
सत्ता ने रौंद डाला 
उसके सपनों की हसीन बस्ती 
कहा, अतिक्रमण है, रौंदो इन्हें
उसने कहा- मेरा सपना है 
सिन्दूर है मेरी मांग का 
और उम्र की कुछ-एक मुस्कराती पंखुडियां 
रहने दो इसे 
मगर तब तक चिपक चुका था  
 उसके माथे पर 
विदेशी कंपनियों का विज्ञापन 
उसकी हथेली पर 
रखा जा चुका था मुआवजा 
हो चुका था अधिग्रहण 
उसकी कोख का 

वहीं पर हमारे पुरखे भी 
पाथा करते थे उपले 
जहां गांव की सब बूढ़ी औरतें 
लगाती रहीं ताउम्र 
कंडियों के ढेर 
कंडियां और कुछ नहीं होतीं 
रोटी के सिवा 
जो गढ़ी जाती हैं 
तिनके तिनके से 

गांव भर के सपने  
फूंक दिए गए बटोर कर 
उन्हीं कंडियों  में 
रख हो गयीं सब रोटियां 


वे जो भागे हैं घर छोड़ 
जीते हैं सहमे सहमे 
उन सबसे कहो 
जमा दें अपने पांव 
सटाकर अपने घर की दीवारों से 
बना लो अपने किले 
जिसे न ढहा सके सत्ता का दमन 
अन्यथा एक दिन 
वे पहुंचेंगे उन सूने स्थानों पर भी 
जहां छुपी हैं तुम्हारी धडकनें....

अपने-अपने जंतर-मंतर

अन्नाहजारेकेबादअबयोगगुरुबाबारामदेवकीयोजनाहैकिवेचारजूनकोकालाधनमुद्देकोलेकरजंतर-मंतरपरआमरणअनशनकरेंगे।उनकादावाहैकिअन्नाहजारेअपनीपूरीटीमकेसाथइसअनशनमेंतोरहेंगेही, देश-विदेशसेउनकेकईसमर्थकभीइसमेंहिस्सालेंगे।होसकताहैकिबाबारामदेवकालेधनकेमुद्देपरजनतामेंएकस्थायी-अस्थायीआवेगभरनेमेंसफलरहें।मगर, सवालसिर्फजनतामेंकुछ-एकदिनकेलिएउग्रताजगानेकानहीं, बल्किउसेअंजामतकपहुंचानेकाहै।भ्रष्टाचारइसदेश

राहुल गांधी से कहो क्या चाहिए

सुबहकेग्यारहबजरहेथेऔरबैंकमेंकाफीभीड़थी।लोगआपसमेंधक्का-मुक्कीकररहेथे।काउंटरखुलेथेऔरकामकाजकरीब-करीबनहींहोरहाथा।एककाउंटरपरएककर्मचारीलोगोंकोपैसेबांटरहाथाऔरदूसराबैठाभीड़सेहंसी-ठहाकाकररहाथा।यहमेरेगृहजनपदगोंडाजिलेकेएककस्बेमेंस्थितग्रामीणबैंककादृश्यथा, जहांमैंअपनेदादाजीकेसाथबैंकसेपैसानिकालनेगया