सोमवार, 18 अप्रैल 2011

बाघ नहीं, जंगल बचाओ


कल्पना कीजिए कि धरती किसी ऐसे प्रजाति के जीव-जंतुओं से भर जाए, जो मानव जीवन के लिए कठिन परिस्थितियां खड़ी कर दें, तो क्या होगा? क्या मनुष्य धरती से पलायन कर जाएगा? या उन जीवों द्वारा उसका विनाश हो जाएगा? या परिस्थितियां ही ऐसी बन जाएं कि मानव खुद--खुद खत्म हो जाए। प्रकृति का मौजूदा चक्र यदि टूटता है तो प्राय: वह विनाशकारी होता है। कोई शक नहीं कि प्रकृति में मानव के बढ़ते दखल का ही परिणाम है कि पर्यावरण से तमाम जीव-जंतु विलुप्त हो रहे हैं। इसी बीच एक सुखद खबर सुनने को मिली है।
दिल्ली में बाघ संरक्षण पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आंकड़ों में कहा गया है कि देश में बाघों की कुल संख्या 1706 हो गई है, जो कि 2006 की गणना में 1411 थी। कुल मिलाकर बाघों की संख्या में 30 फीसद की बढ़ोत्तरी बताई जा रही है। दक्षिण भारत के कुछ स्थानों पर मसलन- केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों में और असम के काजीरंगा में बाघों की संख्या में बढ़त हुई है। कर्नाटक में सबसे ज्यादा 320 बाघ हैं। हालांकि, माना जा रहा है कि यह बढ़ोत्तरी इसलिए भी हो सकती है कि पश्चिम बंगाल के सुंदर वन और नक्सली प्रभाव वाले स्थानों को पहली बार इस गणना में शामिल किया गया है। सुंदर वन में 70 बाघ पाए गए हैं। इसे 2006 की गणना में सुंदरवन के बाघों को नहीं गिना गया था।
हालांकि, दो दशक पहले भारत में बाघों की संख्या तीन हजार से अधिक थी, जो कि 2006 में मात्र 1411 रह गई। बाघों की इस तरह घटती संख्या पर सरकार ने चिंता जाहिर करते हुए बाघों को बचाने का अभियान चलाया। मौजूदा गणना में हुई बढ़त को कुछ लोग इस अभियान का परिणाम मान रहे हैं। टाइगर स्टेट के रूप में जाने जाने वाले मध्य प्रदेश में बाघों की औसत संख्या अब 257 ही रह गई है।
बाघों पर पिछले 35 सालों से काम कर रहे बाल्मिीकि थापर का कहना है कि कुछ नए स्थानों को गणना में शामिल किया गया है। इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि बाघों की संख्या बढ़ी है। एक दो जगह जहां पहले गिनती नहीं हुई थी, वहां भी गिनती कर ली गई है, इससे संख्या में इजाफा दर्ज हुआ है। बाल्मिीकि थापर का यह भी कहना है कि पांच साल पहले सरकार ने बाघों को बचाने के उद्देश्य से 50 हजार करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी थी, जो अभी तक लागू नहीं हो सकी है।
बाघों की संख्या को लेकर खासी खलबली तब मची, जब 2008 में सरिस्का अभ्यारण्य में एक भी बाघ की निशानी नहीं मिली। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता पर सरकार को निर्देश दिया  था कि वह बाघों के संरक्षण के लिए एक टास्क फोर्स का गठन करे। सरकार ने इस मामले को तवज्जो दी और पर्यावरणविद सुनीता नारायण की अध्यक्षता में टास्क फोर्स का गठन किया गया और उसने सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें इस अभियान में स्थानीय लोगों को जोड़ने, जंगलों की पुख्ता सुरक्षा और पर्यावरण जागरूकता फैलाने जसे सुझाव शामिल हैं।
बताया जाता है कि करीब एक सदी पहले भारत में बाघों की संख्या करीब एक लाख थी। बाघों को बचाने के प्रयास क्या किए जा रहे हैं, यह प्रश्न नहीं है। प्रश्न तो यह है कि वे कौन से कारण हैं कि हमारे पर्यावरण से महत्वपूर्ण घटक गायब होते जा रहे हैं। गौरैया, गिद्ध, बाघ सहित जंतुओं की  कितनी ही ऐसी प्रजातियां हैं जो या तो विलुप्त हो चुकी हैं या होने की कगार पर हैं।
मान लिया कि सरकार तमाम प्रयासों से बाघों का संरक्षण करे और उनकी प्रजननिकी को येन-केन बढ़ा ले जाये, तो भी यह सवाल अनुत्तरित है कि जो पर्यावरण चक्र टूट रहा है, उसकी भरपाई कैसे होगी? पूरा पारिस्थितिकी तंत्र छिन्न-भिन्न होने की स्थिति में क्या किया जा सकेगा? जंगल का अपना एक समाज होता है, जहां पाए जाने वाले जीव जंतु एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। जंगलों को तेजी से नष्ट किया जा रहा है। ऐसे में अगर बाघ बचा भी लिए गए तो उनके रहने की जगह कहा होगी? असली चुनौती बाघ नहीं, उस पूरे तंत्र को बचाना है, जहां बाघों को जीवन के अनुकूल जगह मिल सके। हमें कैंसर की बीमारी में दर्द की दवा खाने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।

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