सोमवार, 18 अप्रैल 2011

कहां खो गया ईमानदारी का आकाश-कुसुम?

                                          
26 नवंबर, 1949 को भारतीय संविधान की संविधान सभा द्वारा स्वीकृति के समय अपने समापन भाषण  में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘‘यदि लोग, जो चुनकर आयेंगे, योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हुए तो वे दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देंगे। यदि उनमें इन गुणों का अभाव हुआ तो संविधान देश की कोई मदद नहीं कर सकता। आखिरकार, एक मशीन की तरह संविधान भी निर्जीव है। इसमें प्राणों का संचार उन व्यक्तिओं के द्वारा होता है, जो इस पर नियंत्रण करते हैं। भारत को इस समय ऐसे लोगों की जरूरत है जो ईमानदार हों तथा देश के हित को सवरेपरि रखें।
आज उस परिस्थिति से हम कितने आगे सके हैं? क्या उस मशीनरी में 60 सालों में प्राणों का संचार हो पाया है, जिसकी आशा राजेंद्र प्रसाद सहित अन्य संविधान निर्माताओं को थी? क्या हम उसे सर्वोत्तम बना पाये? क्या प्रस्तावित जन लोकपाल बिल के बारे में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की उपरोक्त बातें सही नहीं बैठती हैं? क्या संविधान के बारे में उनकी आशंकाएं आगामी जन लोकपाल बिल पर लागू होंगी, जब यह अपने अंतिम स्वरूप में हमारे सामने होगा? यदि लोकपाल कोई वैसा ही व्यक्ति हुआ, जो उसे उसके मूर्त-अमूर्त उद्देश्यों तक पहुंचाने की इच्छाशक्ति रखता हो, तो क्या होगा? यदि लोकपाल कपिल सिब्बल जसा व्यक्ति हो, जिसे 2-जी आदि में कुछ गलत दिखता हो, तो यह कानून क्या करेगा? यदि लोकपाल कोई दिग्विजय जसा व्यक्ति हुआ, जो हर महत्वपूर्ण मुद्दे के दौरान एक दूसरा मुद्दा उछालने में दिलचस्पी रखता हो तो इस कानून का क्या होगा?
संविधान के अंगीकार किए जाने के दौरान ही डॉ. अंबेडकर ने भी भाषण करते हुए कहा था कि ‘‘मैं महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकलें तो निश्चित रूप से संविधान भी खराब सिद्ध होगा। संविधान पर अमल केवल संविधान के स्वरूप पर निर्भर नहीं करता। कौन कह सकता है कि आने वाले समय में भारतीय राजनीतिक दलों का व्यवहार कैसा होगा?
डॉ. राजेंद्र प्रसाद और अंबेडकर के बयानात बीते साठ सालों में सच साबित हो चुके हैं। संविधान की उपयोगिता के बारे में उनकी भावी आशंकाएं मूर्तरूप में हमारे सामने हैं। वे नेतागण आज हमारे बीच होते तो देखकर उनकी आत्मा चीखती कि जिसे विश्व के बेहतरीन संविधानों में से एक मानकर गर्व किया जाता है, उसका कैसा-कैसा उपयोग हो सकता है? क्योंकि उन्होंने संविधान निर्मित करते समय यह तो कतई नहीं सोचा होगा कि कभी विश्वास प्रस्ताव जीतने के रुपयों से भरा बैग निर्णायक होगा। यदि लोकपाल बिल सही रूप में ही गया तो क्या गारंटी है कि भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्ति को सजा मिल ही जाएगी? उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती आदि पर सीबीआई की मौसमी सक्रियता इस बात का अच्छा उदाहरण है।
लोकपाल बिल के लिए बनी संयुक्त समिति में शामिल अन्ना हजारे और नागरिक समाज के अन्य प्रतिनिधियों के खिलाफ तमाम वाक्यपटु उतर आए हैं। अमर सिंह अपने चिर-परिचित अंदाज में एक सीडी के साथ नमूदार हो गए हैं तो दिग्विजय सिंह भी मैदान में हैं। अन्ना हजारे से लेकर बाबा रामदेव और शांति भूषण तक निशाने पर हैं। क्या इन बयानों का कोई आधार है या फिर यह सब भ्रष्टाचार के खिलाफ उठे आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश है?
हमें इस बात की तह तक जाने की जरूरत है कि जब नेता-अभिनेता और जनता सब यह स्वीकार कर रहे हैं कि देश में भ्रष्टाचार अभूतपूर्व स्थिति में पहुंत चुका है तो एक सख्त कानून बना देने में क्या समस्या है? समस्या उसीयोग्यता,  ‘ईमानदारी औरचरित्र की है, जिसकी दरकार डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, अंबेडकर आदि को संविधान के निर्माण के समय थी। आज भी देश को आगे ले जाने के लिए हमें योग्य, ईमानदार और चरित्रवान लोगों की जरूरत है। क्या ईमानदारी कोई आकाश-कुसुम है, जिसके बारे में हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं? या फिर यह एक सुसाध्य वस्तु है जो कहीं खो गई है और 121 करोड़ हिंदुस्तानी मिलकर उसे ढूंढ रहे हैं?

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