सोमवार, 18 अप्रैल 2011


             साइबर युग और सूचना गरीब
21वीं सदी का उत्तरार्ध राजनीतिक और आर्थिक तौर पर नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण का दौर रहा है। इसी कालक्रम में दुनिया के ज्यादातर देशों को औपनिवेशिक शासन से मुक्ति मिली। अब तक विश्व भर में आत्मनिर्भरता, स्वशासन और विकास पहली प्राथमिकता बन गये थे। इन लक्ष्यों के प्राप्त करने में जो कुछ बुनियादी समस्याएं थीं, सूचना असंतुलन उनमें से एक है।
वैश्विक सूचना असंतुलन को एक सांस्कृतिक खतरे के रूप में देखा गया। सूचना समितियों पर पश्चिमी देशों के कब्जे से  छद्म-उपनिवेशवाद, अस्थिरता और सांस्कृतिक प्रदूषण का खतरा पैदा हुआ। इससे तीसरी दुनिया यानि एशियाई और अफ्रीकी देशों में सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से संकटकालीन स्थितियों का आभास होने लगा। इसके मद्देनजर तीसरी दुनिया के देशों ने मांग की कि मौजूदा सूचना असंतुलन को दूर किया जाए।
सूचना असंतुलन मुख्यत: संसाधनों के लिहाज से पिछड़ेपन का खामियाजा था। जिन देशों के पास उन्नत तकनीक और संसाधन थे, समूचे सूचना संसार पर उन्हीं का कब्जा था। अमेरिका की एसोसिएटेड प्रेस और यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल, फ्रांस की एजेंसी फ्रांस प्रेस, ब्रिटेन की रायटर्स और रूस की इतरतास जसी समितियों पूरे सूचना जगत पर काबिज थीं। तीसरी दुनिया के देशों को महसूस हुआ कि सूचना व्यवस्था पर काबिज अमीर देश सूचनाओं को अपने हित में इस्तेमाल करते हैं। अमेरिकी जसे देश, जो संचार तकनीक में आगे थे, उन्होंने सूचनाओं का भरपूर लाभ उठाया। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के तहत 1946 में सूचना केस्वतंत्र प्रवाहज् की जो अवधारणा स्थापित हुई थी, वह एकपक्षीय होकर रह गई।
1970 के दशक में दुनिया भर में, खासकर तीसरी दुनिया के देशों में यह बहस छिड़ी कि मौजूदा विश्व-व्यवस्था में सूचना-संचार की स्थिति निहायत पक्षपातपूर्ण और एकांगी है। अब तक पूरे विश्व में जिन चार सूचना एजेंसियों का कब्जा थावे चारों यूरोप और अमेंरिका की एजेंसियां थीं। तीसरी दुनिया के देशों ने आरोप लगाया कि ये एजेंसियां सूचना के प्रवाह को प्रभावित करती हैं। समूचा सूचना तंत्र वैश्विक हित में काम करने के बजाय अमेरिकी और यूरोपीय हित में काम कर रहा है। सूचना व्यवस्था की यह परिघटना अंतत: इस अंजाम पर पहुंची कि यूनेस्को की ओर से 1978 में सीन मैकब्राइड की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया। इस आयोग में पत्रकार बी जी वर्गीज भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। 1979 में मैकब्राइड आयोग की रिपोर्ट आई और 1980 में यूनेस्को द्वारा इसे स्वीकार कर लिया गया।
आयोग ने विश्व सूचना व्यवस्था का अध्ययन करविश्व एक आवाज अनेकज् नाम से अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि मौजूदा सूचना-व्यवस्था एकांगी है। जिसे सूचना का स्वतंत्र और निर्वाध प्रवाह कहा जा रहा है, वह वास्तव में एकतरफा है। इस असुंतलन के मूल में आर्थिकी है। धनी देशों का सूचना तंत्र पर वर्चस्व है, जो इसका अपने हित में इस्तेमाल करते हैं। इस संतुलन को दूर करने के लिए आयोग ने नई विश्व सूचना व्यवस्था की सिफारिश की और सूचना केस्वतंत्र प्रवाहज् की जगहसंतुलित प्रवाहज् की बात कही। इस दिशा में गुटनिरपेक्ष देशों ने सामूहिक प्रयास भी किए और गुटनिरपेक्ष ऐजेंसीपूलज् की स्थापना भी की। परंतु तीसरी दुनिया के देश पश्चिमी वर्चस्व को तोड़ने में एक तरह नाकामयाब रहे। देखा जाए तो आज भी स्थितियां करीब-करीब वैसी ही हैं। यह इसी बात से समझा जा सकता है कि भारत में इमरजेंसी से लेकर बाबरी मस्जिद कांड तक सबसे ज्यादा विश्वसनीय माध्यम बीबीसी रहा है।
इसी दौरान सूचना असंतुलन और नई विश्व सूचना व्यवस्था की बहस के साथसूचना- गरीबज् औरसूचना-अमीरज् शब्दावलियों का प्रयोग चलन में आया।सूचना- गरीबज् यानि जो सूचनाओं से वंचित है औरसूचना-अमीरज् यानि जो सूचनाएं जिन्हें आसानी से उपलब्ध हैं। सदी के अंत में सूचना गरीब बनाम सूचना अमीर की बहस फिर परवान चढ़ी, जब हम साइबर युग की दहलीज पर खड़े थे। जून 1998 में डेली टेलीग्राफ ने लिखा-  ‘‘सूचना-गरीबज् औरसूचना-अमीरज् गरीब और अमीर के बीच का नया वर्गीकरण है। यदि आप लोगों को अज्ञानी बनाये रखते हैं तो वे  वह करते हैं, जो उनसे कहा जाता है।ज्ज्
जुलाई 1999 में गार्जियन ने लिखा- ‘‘यदि आप अखबार पढ़ रहे हैं तो आप सूचना अमीर हैं। आप नॉलेज क्लास से संबंध रखते हैं, जो इस उद्देश्य के लिए अखबार खदीद सकता है और इंटरनेट की समृद्ध सूचनाओं को उपयोग कर पाने में सक्षम है। ज्ज्
ऐसा माना जाता है कि नई सदी के साथ दुनिया सिमट गई और मार्शल मैक्लूूहान की ग्लोबल विलेज की भविष्यवाणी साकार होती दिखी।  वास्तव में मीडिया जसी संस्था की खोज मानवीय उपलब्धियों का एक नायाब अध्याय है। लेकिन यह उपलब्धि सबके लिए एक जसी लाभकारी या उपयोगी साबित नहीं हुई।
समाजों में मौजूद वर्गभेद सूचना के क्षेत्र में भी हावी होता चला गया और आज की  सूचना क्रांति की उपयोगिता अनुपयोगिता पूरी तरह आपकी आर्थिकी पर  निर्भर करती है। सूचना क्रांति की लाभ हानि का सवाल भी हमसे उसी तरह जुड़ा है, जसे मुफ्त शिक्षा देने वाला प्राइमरी स्कूल और हजारों रुपये फीस पर शिक्षा मुहैया कराने वाले कॉन्वेन्ट स्कूल। सूचना पाने का अधिकार आपकी  वंचना या समृद्धि के सापेक्ष है। क्या यह सुनिश्चित  किया जा सकता है कि सूचना-विस्फोट का लाभ देश के हर नागरिक को मिले? हमारे देश में आज भी गांवों के अधिकांश बच्चे देश के प्रधानमंत्री का नाम नहीं जानते। जुलियन असांजे की सूचना बांटने और उसकेसकारात्मक उपयोगज् का दर्शन तो बहुत दूर की बात है।
विकीलीक्स पर जुलियन असांजे के कारनामों के बाद हम एक ऐसे पड़ाव पर पहुंचे, जहां अभेद्य समङो जाने वाले किले एक माउस क्लिक से भेदे जा सकते हैं। साइबर वर्ल्ड क्या भूमिका अदा कर रहा है यह हम सबने देखा, जब फेसबुक का सहार लेकर मिस्र की जनता तहरीर चौक पर एकत्र हुई और अंजाम मिस्र में एक नए युग की शुरुआत के रूप में सामने आया। असांजे ने जिसहैक्टिविजमज् की शुरुआत की, ‘जानने के अधिकारज् और सूचना के सकारात्मक इस्तेमाल का हवाला देकर उसका बचाव किया। आश्चर्य नहीं, कि दुनिया भर में उसे समर्थन भी हासिल हुआ। यानि सूचना के अधिकार को सार्वभौमिक अधिकार मानने की मजबूरी हमारे सामने मौजूद है। लेकिन दूसरी तरफ इस सार्वभौमिकता का दायरा सिमटकर व्यक्ति या समाज की आर्थिकी पर टिक जाता है।
 जिस समय जुलियन असांजे तमाम देशों  के गुप्त कारनामे दुनिया के सामने खोलकर कर रख देता है, उसी समय यह सोचने की जरूरत है कि इस खबर-विस्फोट की सूचना कितने लोगों तक पहुंच रही है? हमारे गांवों से लेकर मझोले शहरों तक कितने ऐसे युवा हैं, जिन्होंने कभी जुलियन असांजे, या विकीलीक्स का नाम सुना हो, उन्होंने आज तक इस बारे में कुछ सुना हो कि हमारी संसद में खरीद-फरोख्त के जरिये  सरकार बनी। आज भारत की कितनी ऐसी जनता है जो हर वह सूचना पा रही है, जो उस तक पहु़ंचनी ही चाहिए? क्या सूचना-गरीब और सूचना अमीर की खाईं हम पाट सके हैं?
भारत में कम से कम वे लोग तो सूचनाओं से निश्चित तौर पर वंचित हैं, जो अभी तक निरक्षर हैं। इसके अलावा हमारी 65 प्रतिशत साक्षरता भी हस्ताक्षर कर सकने तक ही सीमित है।
सूचना का अधिकार कानून पर यह सवाल खड़ा होता है कि क्या सूचना के अधिकार का अर्थ एक दरख्वास्त देकर दफ्तर से सूचना पा लेना भर है। यह देश अथवा तंत्र कैसे चलता है, क्या यह जानना हर नागरिग का अधिकार नहीं?
इस लिहाज से देखें तो हमारी अधिकांश जनता की पहुंच सूचना माध्यमों तक नहीं है। जनमाध्यमों का मकसद व्यवसायिकता के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाने के कारण समाचारपत्रों या चैनलों का लक्ष्य शहरी मध्यवर्ग है, कि ग्रामीण जनता। गावों की ओर माध्यमों के प्रसार की कोशिश के बावजूद हालात कमोबेश वैसे ही हैं। भारतीय सूचना-तंत्र अभी करीब-करीब महानगरों तक ही है, जो अब कस्बों की ओर पदार्पण करने लगा है। इंटरनेट तो पूरी तरह शहरों तक ही सीमित है। 2010 के अंत तक भारत में इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या करीब दो करोड़ और ब्राडबैंड कनेक्शनों की संख्या करीब एक लाख है। इस संख्या का अधिकांश देश के आठ बड़े शहरों में है।
सवाल यह नहीं है कि जनमाध्यमों की उपलब्धता कितनी प्रतिशत जनता तक है, बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि उसका लाभ कितने लोग उठा पा रहे हैं। अर्जुन सेन गुप्त आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 20 रोज कमाने वाली 77 प्रतिशत जनता कौन से जनमाध्यम करती होगी? क्या उनका आकलन करते समय इंटरनेट, कंप्यूटर, अखबार या मैगजीन आदि को  भी प्राथमिक जरूरतों में गिना नहीं जाना चाहिए? अगर यह नहीं हो सकता, तो सूचना का कैसा अधिकार हमने पाया है?





कोई टिप्पणी नहीं: