गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

कालिख पोंछने का साहस किसमे है? 
जब २-जी घोटाला मामला सामने आया था, उसी दौरान मैंने वरिष्ठ वकील प्रशांत का इंटरव्यू  लिया था. बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि देश में स्थितियां बेहद निराशाजनक हैं. आज देश में एक बड़े जनांदोलन की ज़रूरत है. इसके लिए कोई गाँधी या जयप्रकाश नारायण चाहिए जो इसकी अगुआई करे. जब मैंने पूछा कि इस अगुआई की उम्मीद आपसे की जा सकती है? इस पर  उन्होंने कहा था- मैं इस काबिल नहीं हूँ. इसके लिए जनता के बीच का कोई आदमी मुफीद होगा, जिसकी विश्वसनीयता  हो,  मसलन- अन्ना हजारे या फिर स्वामी अग्निवेश.  
उस इंटरव्यू के करीब पांच महीने बाद आज अन्ना हजारे राष्ट्रव्यापी समर्थन के साथ आमरण अनशन पर बैठे हैं और भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना लोगों की आँखों में भर रहे हैं. उनके साथ सैकड़ों और लोगों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी है.  देश भर में जगह जगह उनके समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं.
क्या वह बदलाव बदलाव का दौर, जिसकी हमें दशकों से दरकार है, अब आएगा? लोग भ्रष्टाचार कि गंध से घुट रहे हैं. जितने रकम की आम जन सिर्फ कल्पना कर सकते हैं, उतनी रकम छुटभैये नेता एक डकार में हजम कर जाते हैं. क्या जनता इस अवसर को भुनाएगी. या फिर सरकार अन्ना हजारे, अग्निवेश आदि कि बात मानेगी, और यहीं से बदलाव की शुरुआत होगी? 
मजे की बात तो यह है, कि इस मुद्दे पर देश भर के नेताओ ने अपने अपने अंदाज में राजनीतिक पाखंड शुरू कर दिया है. वे किसी भी ईमानदार प्रयास को सराहने की बजाय प्रयास करने वाले को ही अपमानित करेंगे.   अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि अन्ना को अनशन के लिए उकसाया गया है. जयंती नटराजन का कहना है कि  अन्ना हजारे का अनशन जल्दबाजी में उठाया गया कदम है. हालाँकि, हर कोई जनता है कि दो महीने तक लगातार प्रधानमंत्री को पत्र लिखा गया और उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. ऐसा धरने के दौरान अरविन्द केजरीवाल और स्वामी अग्निवेश न कहा भी. वीरप्पा मोइली का कहना है कि सरकार के मंत्रियों के समूह के ज़रिये इस बारे में प्रक्रिया चल रही है. कपिल सिब्बल कि भूमिका ठीक वैसी है, जैसी पूरे २-जी प्रकरण में रही है. वे बातचीत भी  करेंगे, इंकार भी करेंगे. वे क्या करेंगे कोई नहीं जानेगा. वे एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो पूरे भारत को निरा मुर्ख समझते हैं. उनकी बातें इस बात की गवाह हैं. वे ऐसा समझते हैं कि वे दुनिया में एक अकेले ईमानदार, योग्य और समझदार हैं. 
बीजेपी कह रही है कि अन्ना हजारे को अनशन पर नहीं बैठना चाहिए. मनमोहन सिंह कि तरफ से अनशन पर निराशा जताई जा चुकी है. मौजूदा सत्ता की चाभी अपने खूंट में बांधे रखने वाली सोनिया और  भावी "भारत भाग्य विधाता" राहुल गाँधी अब तक खामोश हैं. 
उधर, अनशन-स्थल पर पहुंचे ओम प्रकाश चौटाला, उमा भारती, मदन लाल खुराना और मोहन सिंह को वहां से वापस भेज दिया गया. उनकी सहानुभूति को न तो जनता ने स्वीकार किया, न ही अन्ना हजारे ने. हजारे का कहना था- यदि वे आना चाहें तो आयें और जनता के बीच बैठें और सुनें. वे मंच पर नहीं आ सकते. राजनेताओं से खतरा है . हम इसका राजनीतिकरण नहीं होने देंगे. यह घटना लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण से बेहद सुखद है. सड़े हुए पानी को उलचा जाना ज़रूरी है, वरना रोग फैलेगा.  नेताओं का नकार, उनकी आँखें खोलने में मददगार साबित होगा.
हालाँकि, जो लोग वहां जा रहे हैं, उनमे से कोई भी अन्ना का खुला समर्थन नहीं कर रहा. सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों को छोड़कर कोई नहीं कह रहा की भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कानून बने. राजनीति की कोठरी में सबका दामन काला हो चुका है. और क्योंकि इन्हीं ने मिल जुलकर यह कालिमा फैलाई है, इसलिए उसे मिटा पाने का साहस इनमे नहीं है. वरना इस बात से कोई क्यों असहमत होगा कि देश में स्वच्छ प्रशासन और पारदर्शिता हो. असल मसला यही कि अपने चेहरे की कालिख पोंछने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा है. उसके बचाव में जितने तर्क चाहिए, वे कपिल सिब्बल से मिल जाएँगे. उन्हें ए राजा को सत्यानिष्ट हरिश्चंद्र साबित करने में कोई शर्मो-संकोच नहीं होता. 

कोई टिप्पणी नहीं: