सोमवार, 4 अप्रैल 2011

ग़ज़ल-

अगर तुम मेरे दिल को दिल समझते
तो हम फूलों सा खिलते और महकते
तेरे आँचल का जो आकाश मिलता
तो हम हर सांस उगते और ढलते
तुम्हें आवाज़ देने की वजह है
अकेले थक गया हूँ चलते चलते
तू इतनी बात सुन ले मेरे हमदम
नहीं कटते हैं अब जीवन के रस्ते
तुम्हें लगता मैं टूटा नहीं हूँ
कहो अब और किस तरह बिखरते
मेरे ख्वाबों का लश्कर चाहता है
कि तुम हरदम मेरे पहलू में रहते
तुम्हे मकसद बनाकर पूजता हूँ
बताओ और तुमको क्या समझते
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